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तो देश की 65 फीसदी आबादी है गरीब

पिछले साल योजना आयोग ने गरीबी रेखा के लिए जो मानदंड तय किए थे, उस पर काफी विवाद हुआ था।

योजना आयोग ने कहा था कि शहरों में प्रतिदिन 28.65 रुपये और गांवों में 22.42 रुपये से ज्यादा कमाने वाले लोग गरीबी रेखा से नीचे नहीं माने जा सकते हैं। अब नैशनल सैंपल सर्वे 2009-10 के आंकड़ों ने एक नई बहस पैदा की है। इसके मुताबिक अगर जीने के लिए जरूरी मासिक खर्च को आधार माना जाए तो शहरों में जो लोग रोज 66.10 रुपये से कम कमाते हैं, उन्हें गरीब माना जा सकता है। इसी तरह गांवों में प्रतिदिन 35.10 रुपये से कम कमाने वाला शख्स गरीब कहा जा सकता है।

एनएसएसओ 66वें राउंड के आंकड़ों के मुताबिक देश के गांवों में लोगों का औसत मासिक खर्च 1054 रुपये प्रति व्यक्ति और शहरों में 1984 रुपये प्रति व्यक्ति है। इस तरह से हम पाते हैं कि गांवों में रहने के लिए रोज 35.10 रुपये और शहरों में जीवन जीने के लिए रोज 66.10 रुपये जरूरी हैं। अगर इसको आधार माना जाए तो गांवों में रहने वाली 64.47 फीसदी आबादी और शहरों में रहने वाली 66.70 फीसदी आबादी इस एवरेज स्टैंडर्ड से नीचे है। इस तरह से तकरीबन कुल आबादी का 65 हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे होगा। हालांकि, जब सरकार गरीबी रेखा के बारे में अपने मानदंड पर फिर से विचार कर रही है, ऐसे में गरीबी रेखा की परिभाषा तय करने में यह औसत मासिक खर्च का आंकड़ा फायदेमंद साबित हो सकता है।

अगर राज्यों की बात करें तो सभी राज्यों की लगभग 60 फीसदी आबादी इस औसत मासिक खर्च से कम में गुजर बसर करती है।

 

Source : http://navbharattimes.indiatimes.com

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=990

Posted by on Apr 29 2012. Filed under खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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