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हिंदू को गाली देने का मतलब बुद्धिजीवी!

 

सेक्युलर और बुद्धिजीवी होने से आदमी की प्रतिष्ठा में चार चाँद लग जाते हैं। उसको लोग बाग आदर और श्रद्धा की दृष्टी से देखते हैं। यह अत्याधुनिक फैशन है. रोज़ रोज़ नए नए फैशन आते रहते हैं। यह भी नित्य आने वाले नए फैशन की तरह है. शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो समय के अनुरूप नया फैशन नहीं अपनाना चाहेगा। फैशन के अनुसार न चलनेवाला पिछड़ा कहलाता है। जब फैशन का रिवाज़ हो तो पिछड़ा कौन कहलाना चाहेगा ! वैसे तो बुद्धिजीवी होने का फैशन कोई नया नहीं है , लेकिन फैशन की दौड़ में कोई भी पिछड़ा कहलाना क्यों चाहेगा , जबकि खासतौर से बुद्धिजीवी और सेक्युलर होना होना सबसे आसान है। इस श्रेणी में मानवाधिकारवादियों को भी शामिल किया जा सकता है. सेक्युलर बुद्धिजीवी, मानवाधिकारवादी सब एक ही थैली के चाटते, बट्टे हैं। .

 

सेक्युलर, बुद्धिजीवी, मानवाधिकारवादी बनने के कुछ शर्तिया, अचूक, रामबाण सूत्र ( फॉर्मूले ) हैं जो कभी असफल नहीं होते हैं। इन फार्मूलों को हमारे बुद्धिजीवियों नें इजाद किया है। बुद्धिजीवी आसानी से पहचाने जा सकते हैं। हमारे बुद्धिजीवी कंधे पर झोला लटकाए, जींस की पैन्ट, खद्दर का कुरता पहने, बुद्धिजीवी होने का लबादा ओढ़े जगह जगह घूमते नज़र आ जाएंगे। इसलिए इनको झोलावाला भी कहा जाता है। अगर दाढ़ी हो और आंखों में चश्मा लगा हो तब तो यह इनके बुद्धिजीवी होने का पक्का सबूत है। इनके पास बुद्धि होना कोई ज़रूरी नहीं है। बस एक गुट में शामिल होना चाहिए।

 

किसी तथाकथित बुद्धिजीवी गुट में शामिल होने से बुद्धिजीवी होने का प्रमाणपत्र आसानी से मिल जाता है। गुटों का काम है लोगों को बुद्धिजीवी होने का प्रमाण पत्र देना। गुट में शामिल होने से बुद्धिजीवी बनाना बहुत ही आसान हो जाता है। बुद्धिजीवी होना फैशन में शुमार है। इसके तो बहुत ही फायदे हैं। इसमें सरकारी संरक्षण , जेएनयू जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में प्रोफेसरशिप मिल जाना , समाज में प्रतिष्ठा , टीवी चैनलों में विशेषज्ञ के तौर पर भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाना इत्यादि शामिल हैं।

 

बुद्धिजीवी समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। जैसे लोगों को ‘ सेक्युलर ‘ होने का प्रमाणपत्र बांटना, आतंकवादियों, माओवादियों के गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए कुतर्क गढ़ना , लोगों को भ्रमित करने के लिए नए नए शब्दजाल बुनना। इनमें से कुछ कश्मीर के अलगाववादियों, आतंकवादियों के पक्ष में भी गाहे बगाहे खड़े होते देखे गए हैं। अब आइये ‘ सेक्युलर ‘ होने के लिए इनके द्वारा ईजाद किये गए फार्मूलों पर पर विचार कर लें। आपको बस इतना करना है कि सेक्युलर बनने का सबसे आसान तरीका है, हिंदुओं को गाली देना , हिंदू परंपरा , सभ्यता और संस्कृति का अपमान करना इत्यादि।

 

दूसरे धर्मों की नाजायज़ मांगों के सामने पलक पांवड़े बिछाना , जैसे शाहबानो के केस में भारतीय संविधान में संशोधन करवाना , वन्दे मातरम् गाने का अनुरोध करने वालों को सांप्रदायिक कहना इत्यादि, इत्यादि। हमारे देश में मुसलामानों को एक विशेष दर्जा प्राप्त है क्योंकि उनका अपना एक सशक्त वोट बैंक, जिसको देखकर सभी सेक्युलर राजनितिक दलों के मुंह से लार टपकने लगती है। सेक्युलर कहलाने का इससे आसान तरीका क्या हो सकता है। फैशन का फैशन और आसानी की आसानी। हमारे बुद्धिजीवियों ने सेक्युलरिज़म को एक निहायत ही न��� मौलिक अंदाज़ में परिभाषित किया है।

 

हमारे बुद्धिजीवियों नें एक नई शब्दावली का निर्माण किया है , जिसको समझना अति आवश्यक है। नई-नई परिभाषाएं गढ़ी गई हैं। नए नए सांकेतिक शब्द ( code word ) गढ़े गए हैं। आइये इस पर भी एक नज़र डाल लें। माओवादी डिक्टेटरशिप के लिए इस्तेमाल किया जाने वाले ‘ कोड वर्ड ( code word ) हैं ‘ जनवादी , ‘ ‘ जन आंदोलन ‘ ‘ जन तंत्र ‘ । इसी प्रकार ‘ मानवाधिकार ‘ का मतलब है आतंकवादियों , अपराधियों और माओवादियों द्वारा निरीह और निरपराध आम आदमियों की हत्या करने का अधिकार। बिना कोड वर्ड समझे आप इन बुद्धिजीवियों की बातों को नहीं समझ सकते। है न कितना आसान सेक्युलर और बुद्धिजीवी बनना।

 

सेक्युलर, मानवाधिकारवादी, बुद्धीजीवियों में कुछ जाने माने चेहरे हैं। अरुंधती राय नें अबतक पर्याप्त ख्याति अर्जित कर ली हैं. मीडिया का एक वर्ग अरुंधती राय को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आज़ादी का महान पैरोकार, ध्वजवाहक बता रहा है. हो सकता है अरुंधती सबसे ऊपर उठकर अपने को आज़ादी और मानवाधिकारों का पैगम्बर के रूप में स्थापित करना चाहती हों. यह तो मुझे नहीं मालुम कि वे कितनी महान लेखिका हैं. इसका फैसला उनके ‘ दुर्बुद्धिजीवी ‘ समर्थकों को ही करने दिया जाना चाहिए. ऐसे लोगों के लिए मैं उचित शब्द की तलाश में था.

अंतत: काफी परिश्रम के बाद मैंने उपयुक्त शब्द का निर्माण कर ही लिया. यह है ‘ दुर्बुद्धिजीवी ‘. ये लोग अरुंधती को ‘ सेलेब्रिटी स्टेटस ‘ प्रदान करने पर आमादा हैं. इनको पहचानना कोई मुश्किल काम नहीं है. इनके कुतर्कों से इनको आसानी से पहचाना जा सकता है. अरुंधती राय चाहे और कुछ हों या न हों, उन्होने paid media के सहयोग से आज़ादी की अपनी ब्रैंड वैल्यू अवश्य बना ली है. अरुंधती छाप आज़ादी को समझने के लिए उसे पारिभाषित करना ज़रूरी है. उनकी राय में कश्मीर को भूखे नंगे हिंदुस्तान से कश्मीर को अलग करना ‘ आज़ादी ‘ है.

यह समझ में नहीं आता है भूखे नंगे हिंदुस्तान में रहने की उनकी क्या मज़बूरी है. जो देश उनको आदर्श लगता हो, जहां अभिव्यक्ति की आज़ादी हो एवं मानवाधिकारों का हनन न होता हो, वे वहाँ जाकर बसने को स्वतंत्र हैं. उन्हें किसने रोका है. कृपया भारत को बख्श दें. आखिर मकबूल फ़िदा हुसेन अपनी पसंदीदा जगह में मानवाधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेक्युलरिज्म का भरपूर रसास्वादन किया. अन्य बुद्धिजीवियों में कुलदीप नायर, गौतम नौलखा, तीस्ता सीतलवाड़ और इंग्लिश मीडिया से सम्बंधित कुछ अन्य चिरपरिचित नाम इसमें शामिल हैं।

 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे ज्यादा दुरूपयोग में आने वाला शब्द है. हमको समझाया जाता है कि भारत एक लोकतंत्र है. हमारा लोकतांत्रिक संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है. लेकिन क्या संविधान प्रदत्त यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देश के टुकडे टुकडे करने की आज़ादी भी देती है. क्या डरा धमका कर, नरसंहार करके कश्मीर घाटी से हिन्दू अल्पसंख्यकों का निष्कासन सुनिश्चित करने की, पत्थर मार कर लोगों को घायल करने की, पाकिस्तानी एजेंटों द्वारा जम्मू कश्मीर में हिंसात्मक आतंकवाद फैलाने की आज़ादी भी संविधान देता है. हमारे सेक्युलर बुद्धिजीवी, मानवाधिकारवादी का सम्बन्ध कश्मीर के अलगाववादियों से भी है.

 

पाकिस्तान की आई एस आई के पैसे से अमेरिका में कश्मीर पर सेमिनार आयोजित किये जाते हैं जिसमें ये बुद्धिजीवी शामिल होते हैं, इस सिलसिले में दिलीप पडगांवकर का नाम बरबस याद आता है. एक तरफ माओवादी हैं. ये लोग माओ के सिद्धांत में विश्वास करते हैं कि ‘ सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है ‘. इनका घोषित उद्देश्य है बन्दूक की हिंसा के सहारे लोकतंत्र का विनाश और उसके स्थान पर माओवादी तानाशाही की स्थापना करना. ये लोग अराजकता फैलाने के लिए, आदिवासियों, किसानों, गरीबों को मोहरा बनाकर / उनकी आड़ लेकर , सडकों, पुलों, स्कूलों, हास्पिटलों, रेलवे लाइनों, पावर हाउसों को बम से उड़ा देते हैं. एक पूरी की पूरी सी आर पी ऍफ़ यूनिट और सिविलियन बस यात्रियों को को बम से उड़ा दिया गया.

 

तालिबानी शैली में इन्स्पेक्टर फ्रैंसिस इन्दुवार का सिर धड से अलग कर दिया गया. ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस ट्रेन को पटरी से उतारकर लगभग 160 निर्दोष मासूम रेल यात्रियों को मौत के घाट उतार दिया गया. क्या भारत का संविधान इन जघन्य अपराधों को करने की आज़ादी देता है. मैं तो समझता हूँ भारत तो क्या दुनिया को कोई देश इस तरह की आज़ादी नहीं दे सकता है. अरुंधती ऐसे लोगों के समर्थन में खड़ी हैं. और तो और वह माओवादियों को ‘ बंदूकधारी गांधीवादी ‘ बताती हैं. गांधीवाद का ऐसा उपहास कल्पना से परे है. . ये लोग माओवादी, कश्मीर के आतंकवादियों के मानवाधिकारों के समर्थन में तो जार जार आंसू बहाते हैं लेकिन इस आतंक के शिकार निर्दोष मासूमों के अधिकारों के बारे में चुप्पी साध जाते हैं.

 

जब साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के डिब्बे मिटटी का तेल डालकर, बाहर से ताला लगाकर डिब्बे के अन्दर मौजूद हिन्दुओं को जला कर मार दिया जाता है तब शायद यह इन सेक्युलरवादियों, बुद्धिजीवियों, मानवाधिकारवादियों की निगाह में मानवतावादी कृत्य है. इस पर ये चुप्पी साध लेते हैं यह चुप्पी इनकी नीयत के बारे में चीख चीख कर चिल्लाती है. इनको दुर्बुद्धिजीवी नहीं तो क्या कहा जाय. अरुंधती का उद्देश्य केवल उल जलूल हरक़तें करके लोगों का ध्यान आकर्षित करके चर्चा में बने रहना मात्र नहीं है. एक तो अपने को बुद्दिजीवी, प्रगतिशील और सेक्युलर के तौर पर स्थापित करने का सबसे आसान तरीका है. मैं अपनी एक आशंका की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ. मेरी समझ में यह सब कुछ भारत का विघटन करने के एक अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र का हिस्सा लगता है. अरुंधती राय, पाकिस्तान परस्त सैय्यद अली शाह गिलानी, माओवादियों के समर्थक वरावरा राव और खालिस्तानियों का एक मंच पर इकठ्ठा होना बेमतलब नहीं है. इसके कुछ अन्तर्निहित उद्देश्य हैं. कुछ दिनों पूर्व चीन के एक ’ Strategist ’ ने लिखा था कि चीन भारत को कमजोर करने के लिए उसे कई छोटे छोटे हिस्सों में बांटना चाहता है. चीन भारत को अपना प्रतिद्वंदी समझता है.

 

इस रणनीति का ब्ल्यू प्रिंट शायद चीन में तैयार किया गया है. इस रणनीति के क्रियान्वयन में पाकिस्तान, ISI, माओवादी, कश्मीर की हुर्रियत के सैय्यद अली शाह गिलानी, अरुंधती राय और देश के कुछ अन्य ’ दुर्बुद्धिजीवी ’ शामिल लगते हैं. अभी हाल में प्रशान्त भूषन जैसे वकील भी बुद्धिजीवियों की कतार में शामिल होने का लोभ संवरण नहीं कर सके और उन्होंने कश्मीर में ‘ जनमत संग्रह ( प्लेबिसाईट ) की मांग कर डाली अमेरिका चुप चाप यह सब देख रहा है और उचित अवसर की प्रतीक्षा में है क्योकि वह भी भारत को प्रतिद्वंदी मानता है. यह सारी परिस्थिति अमेरिका के भी अनुकूल आती है. मैं समझता हूँ इस अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र के पीछे कहीं न कहीं अमेरिका की भी मौन स्वीकृति है. अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवादी देश मानने को तैयार नहीं है. अमेरिका भली भांति जानता है कि उसके द्वारा दी जाने वाली आर्थिक एवं सामरिक सहायता का उपयोग पाकिस्तान भारत में आतंक फैलाने के लिए करता है. फिर भी अभी हाल में अमेरिका नें पाकिस्तान को 2 bn डालर की सहायता की घोषणा की है. मैं जो बात समझता हूँ उसे हमारे कर्णधार बखूबी समझते होंगे।

लेखक  : डॉ. एस शंकर सिंह

blog : Abhipray

 

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Posted by on Mar 25 2013. Filed under हिन्दुत्व. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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