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देश के सभी इंजीनियर; उठिए, आपको कम आंकने की हम हिम्मत कैसे कर रहे हैं?

All The Engineers Of The Country Get Up

All The Engineers Of The Country Get Up

 

जब संकरी सुरंग से ट्रेन गुजरती है, अंधेरा बढ़ने लगता है। लेकिन आप घबराकर बाहर कूद नहीं जाते। इंजीनियर पर भरोसा कर, शांत बैठे रहते हैं।

-कोरी टेन बूम

इस बार का कॉलम भावना प्रधान किंतु तथ्यों और तर्को से हटकर नहीं।

प्रिय इंजीनियर,

आखिर कितना सहेंगे आप? क्यों? और किससे? हर साल आपको खारिज करने वाली रिपोर्ट आती है। सिरे से। शुक्रवार 31 जनवरी 2014 को यानी यह कॉलम लिखे जाते समय ऐसी ही रिपोर्ट फिर आ गई। धक्क रह जाते हैं इंजीनियरिंग के कायल, हमारी तरह के साधारण भारतीय। हर बार कोसा जाता है। विश्वास ही नहीं होता। कोसने वालों को आप पर। हमें, कोसने वालों पर। इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स के लिए कहा जाता है कि वे ‘एम्प्लॉएबल’ ही नहीं हैं। यानी काबिल नहीं हैं। नौकरी के लिए। काम के लिए। कॅरिअर के लिए। कैसे कोई ऐसा कह सकता है? विश्व का कोई भी काम इंजीनियरिंग के बिना तो हो ही नहीं सकता। फिर आपकी जरूरत ही नहीं है। ऐसा कैसे हो सकता है?

रिपोर्ट में कई तरह की बातें हैं। चूंकि तथ्यात्मक ही होंगी – इसलिए माननी पड़ेंगी। अन्यथा हमारे जैसों के लिए तो ये तथ्य अपमानजनक ही हैं। क्योंकि बचपन से हमें, परिवार में, बताया गया था कि दुनिया में जो कुछ भी है, वह ‘इंजीनियरिंग’ ही है। क्योंकि संसार में हर चीज़ किसी न किसी ‘डिज़ाइन’ से बनती है। और डिज़ाइन ही इंजीनियरिंग है। डिज़ाइन बनेगी तो ही विमान बनेगा। इंजीनियर सर्किट, डायग्राम बनाएंगे तो ही मशीनें बनेंगी। चुनाव हों या जनगणना, गिनती एकदम सही तभी होगी, सटीक तभी होगी, जब कोई इंजीनियर गणित को भौतिक आकार देगा। बिजली, पानी, सड़क – बिपासा – हो या सोशल मीडिया पर इन सभी अव्यवस्थाओं पर खुलकर कहने की सुविधा – सभी में इंजीनियरिंग है।

फिर भी आपके लिए अब जगह ही नहीं है?

पिछले वर्ष पत्रकार अनुमेहा चतुर्वेदी ने अच्छी जानकारी जुटाई थी कि इंजीनियर के लिए दस साल में कैसे सब कुछ बदल गया। इन्फर्मेशन टेक्नोलॉजी – आईटी सेक्टर – की उछाल से हजारों इंजीनियरिंग कॉलेज खड़े कर दिए गए। बुरा लगता है उस शब्द को पढ़कर, किंतु हमेशा कहा जाता है – कुकुरमुत्ते की तरह उग आए कॉलेज। और फिर आपके लिए हेय दृष्टि के साथ कहा जाता है – योग्य नहीं हैं। या तो नौकरी मिलेगी ही नहीं या आपकी टेक्निकल योग्यता से कहीं नीचे आपको कोई काम करने पर विवश होना पड़ेगा। 15 लाख से ज्यादा इंजीनियर हमारे देश से ग्रेजुएट हो रहे हैं। बताया जाता है कि यह संख्या इतनी अधिक है कि चीन और अमेरिका मिलकर भी इतने इंजीनियर नहीं बनाते। इसलिए नौकरी कौन देगा?

यह किंतु केवल एक तथ्य है। वास्तव में जितना काम हमारे देश में हो रहा है – उतना कहीं और नहीं। ख़ासकर यह कि जितना लोगों को लगाकर हमारे यहां काम करने-करवाने की संस्कृति है – उतनी कहीं नहीं।

तो आपकी गलती क्या हैचूक कहां हो रही है?

आप ही की गलती है। चूक आपसे भी हो रही है, आपके कॉलेज और प्रोफेसर से भी हो रही है। कंपनियों से भी हो रही है।

गलती सबसे बड़ी तो यह है कि आपमें इंजीनियरिंग का वो जुनून नहीं दिखता। आप नहीं मानेंगे। किंतु सच है। ऐसा नहीं होता तो कोई बड़ी डिज़ाइन हिंदुस्तान से क्यों नहीं दुनिया में फैल रही? न हमने कोई चमत्कारिक पुल तैयार किया है, न कोई बुलेट ट्रेन, न कोई एयरक्राफ्ट, न कोई किचन अप्लायंस। जो चीन, यूरोप, अमेरिका ने आंखें फाड़कर देखा हो। बॉम्बे हाई को बसाने वाले इंजीनियरों के दीवाने समूह अब कल की बात ही तो बनकर रह गए हैं।

तारापुर, थुम्बा और रावतभाटा के जुझारू इंजीनियर बस वहीं के बनकर रह गए – वैसे नए सामने नहीं आ रहे। विश्वेश्वरैया के देश में इंजीनियर ‘अनएम्प्लॉएबल’ कहलाते जाएं – इससे बड़ा आपत्तिजनक क्या हो सकता है? पूरी सिलिकॉन वैली को दमकाने वाले हमारे कम्प्यूटर इंजीनियर, सॉफ्टवेयर इंजीनियर क्या कई बिलियन डॉलर अमेरिका के लिए जुटाकर – खत्म हो गए? टाटा कन्सल्टेंसी सर्विस, इन्फोसिस, कॉग्निजेंट और विप्रो – या टेक महिंद्रा के सत्य से आगे हमारे युवा कहीं जाना ही नहीं चाहते? क्या वे कुछ नया नहीं करना चाहते? इतना टैलेंट होकर भी वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? जी, हां, आपके ‘टैलेंट’ पर किसी को संदेह नहीं – ‘एम्प्लॉएबल’ होने पर है! तो ऐसा क्यों? यह तो और भी बुरा है।

इसके मूल में आपकी ही गलती है। आप इंजीनियरिंग को जीना शुरू कर दीजिए। इलेक्ट्रॉनिक एंड इन्स्ट्रूमेंटेशन में हैं तो इन दो शब्दों का समूचा सर्किट आपके दिल-दिमाग़ और रूह में चौबीसों घंटे होना चाहिए। बदलता हुआ। हमेशा नया होता। ‘इम्प्रूवमेंट’ शब्द अपने जीवन से निकालकर फेंक दीजिए। ‘चेंज’ शब्द को अपनाइए। धूल जैसी तुच्छ चीज़ भी दूसरी बार उड़ने पर ‘इम्प्रूव’ होकर ही उड़ती है। यानी, इम्प्रूवमेंट एक स्वाभाविक प्रक्रिया है – होने दीजिए। इंजीनियर तो ‘चेंज’ के लिए ही बने हैं।

आपको यह क्रोध आ रहा होगा कि यह बातें केवल कहने में अच्छी लगती हैं। जीवन का खुरदुरा धरातल तो ‘प्लेसमेंट’ के ऊबड़-खाबड़, गहरे गड्ढों में ढह जाता है। यही आपकी भूल है। प्लेसमेंट क्या है? आपको लग रहा है कि आपकी गरज है। कंपनी की भी गरज है। फिफ्टी-फिफ्टी। आपका कॉलेज, आपका इन्स्टीट्यूशन, आपके प्रोफेसर, आपके प्रिंसिपल, डायरेक्टर कंपनियों को जता नहीं पा रहे हैं कि टैलेंट उनके पास है।

प्लेसमेंट के लिए अपने आपको कोसना भी बंद कीजिए। आईआईटी से तो बड़े नहीं हैं न आप? 2012 की मुंबई बैच के 1१89 में से 1060 को ही प्लेसमेंट मिला था। क्या एक आईआईटियन ‘अनएम्प्लॉएबल’ हो सकता है? कतई नहीं। किंतु हुआ। आईआईटी की गलती। डायरेक्टर की गलती। मानने वाला चाहिए।

इंजीनियर जब तक अपनी इंजीनियरिंग को नीचा मानते रहेंगे – तब तक बाहर के लोग उन्हें ऊंचा क्यों मानेंगे? आप अपने संघर्ष को यदि महत्व देते तो एमबीए करने के लिए इतनी जल्दबाजी, इतना जोश, इतनी छटपटाहट कभी न दिखाते। बीई के आगे एमबीए लगे बगैर आप स्वयं मान बैठे हैं कि आपकी वास्तविक डिग्री कमज़ोर है। क्यों?

आईटी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर यदि हजारों पद कम कर रहे हैं – तो क्या आप की सारी पढ़ाई व्यर्थ चली गई? ऐसा नहीं है – आपको इंजीनियरिंग के सम्मान को वापस लाना होगा। अपने प्रोफेसर को कहिए – वो कुछ जज़्बा जगाएं। प्रिंसिपल-डायरेक्टर से कहिए – व्यक्तिगत रूप से समूचे विश्व को लिखें कि ‘मेरे संस्थान के इंजीनियर जुनूनी हैं – जीते हैं इंजीनियरिंग। गूगल जैसे हैं। माइक्रोसॉफ्ट जैसे हैं। और वे यदि नहीं मानते तो हटिए – मेरिसा मेयर्स जैसे हैं- याहू की क्रांतिकारी सीईओ का कथन प्रसिद्ध है – मैं गूगल की पहली महिला इंजीनियर थी।’

इंजीनियर, नए सिरे से उमड़ते-घुमड़ते जोश-ओ-खरोश से उठेंगे – यह असंभव है। किंतु उठना ही होगा। उन्हें झकझोर कर उठाना होगा। नौकरी क्या है – इंजीनियरिंग तो लिओनादरे द विंची से समझिए। उन्होंने कहा था – मनुष्य के पैर जिस पर वो खड़ा होता है इंजीनियरिंग का ‘मास्टरपीस’ ही तो है – जिसमें आर्ट मिला हुआ है।

देश के इंजीनियर, तोड़ डालिए हर उस धारणा को जो आपको कमज़ोर बता रही है। कुछ कर गुजरिए – क्योंकि आप ही कर सकते हैं।

याद कीजिए पुरानी कहावत कि विज्ञान वह खोज पाता है- जो पहले से मौजूद था। जबकि इंजीनियरिंग वह बनाती है जो कभी मौजूद नहीं था। आप भी कल तक मौजूद नहीं थे। बनाइए।

कल्पेश याग्निक

(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)

Posted by on Feb 1 2014. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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