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Almost Virgin: Secret Diary of a Single working girl in Delhi hot story true life

Almost Virgin: Secret Diary of a Single working girl in Delhi hot story true life

Almost Virgin: Secret Diary of a Single working girl in Delhi hot story true life

आर्टिकल की भाषा के लिए खेद हे पर आज के समाज की यही सच हे ! इस लिए हम मूल आर्टिकल  पब्लिश कर रहे हे 

Almost Virgin: Secret Diary of a Single working girl in Delhi hot story true life

ये मेरी कहानी है। एक लड़की की कहानी। दिल्ली की एक लड़की कहानी। उस लड़की की कहानी जिसकी जिंदगी जीने की अपनी टर्म्स एंड कंडीशंस हैं। जो चाहती है कि घूरती निगाहें उसे सिर्फ **** भर न समझें। उसकी पहचान किसी बायलोजिकल व्यवस्था के लिए नहीं हो। और जो चाहती है कि हर जगह सेक्स को तलाशते घटिया लोगों का जवाब उन्हीं के तरीके से दिया जाए…एकदम सॉलिड कमीनेपन के साथ…और हां, अगर में कुछ ज्यादा ही ओपननेस के साथ बात कर रही हूं तो डोंट थिंग रोंग… मैं कोई ऐसी-वैसी उस टाइप की लड़की नहीं हूं…आपसे कुछ शेयर करना चाहती हूं तो इसलिए कि यस-यस…नो…नो…के डायलेमा में फंसी हजारों लड़कियों में डिसीजन लेने की डेयरिंग आ सके…. वे उन कंडीशंस से निपटने की हिम्मत पैदा कर सकें जो लड़कियां होने के कारण कदम-कदम पर फेस करती हैं।

सो, नॉउ बिगिन विद द वेरी बिगनिंग…

वंस अपोन अ टाइम, जब मैं बैंकिंग सेक्टर में काम करती थी। अब किस बैंक में थी, हू केयर दिस…हर जगह का हाल एक सा ही है। अब आपको पब्लिक सेक्‍टर बैंकों पर ज्यादा प्यार आ रहा है तो जान लीजिए वो जमाने हवा हुए जब सरकारी बैंक सती-सावित्री टाइप हुआ करते थे। वहां एकदम भाई साब और बहनजी टाइप लोग काम करते थे। अब तो सब जगह किसी भी बिजनेस डील की शुरुआत कंधे के नीचे देखने से ही होती है…कमर के नीचे जाने की भरपूर उम्मीद के साथ…साले वासना के भूखे भेड़ियों, शिट् हो तुम लोगों पर तो…

ओके…ओके कम टू द पाइंट…

तो बात कहां थी। बात यहां थी कि क्लाइंट के पास जाने का मतलब ही होता है `लेन-देन` की बात…सॉरी इफ यू आर नॉट अंडरस्टैंड इंवर्टेड कामा इन `लेन-देन…` तो जान लीजिए ये स्टोरी आपके लिए नहीं है…..अच्छा समझ गए, मैं जानती हूं … आजकल शायद ही कोई है जो इसे न समझे…औऱ यदि सच में न समझे तो…तो वो अनाड़ी है जो इस कांपटिटिव वर्ल्ड में किसी काम का नहीं है बाबू…(मैंने अपनी एक आंख दबाई है आप इसे मेरे बिना लिखे ही समझ चुके होंगे…, मैं जानती हूं मेरी ये स्टोरी ऐसे ही इंटेलीजेंट लोगों के लिए है….)

तो, सीन नंबर वन…

उन दिनों वो मिलेनियर क्लाइंट गुडगांव में कहीं रहता था। जब मेरे बॉस ने मुझे उसके पास बिजनेस डील करने के लिए भेजा था। गुड़गांव में कहीं क्या सबसे पॉश एरिये में ही रहता था वो। गंजा सा, कोई 50 से 55 साल के बीच का कंपलीट कमीना, कंपलीट इसलिए क्योंकि कमीनापन उसकी पूरी पर्सनालिटी से टपक रहा था। हमारे मिलने के 15 मिनट के भीतर ही वो अपनी औकात पर उतर आया था। `मेरी पत्नी बाहर गई है आप आराम से बैठिए`…बार-बार मेरे पास आने की कोशिश कर रहा था। मुंह से मॉर्निंग ब्रेकफास्ट अंडाभुर्जी की जबर्दस्त स्मेल…और शायद एकाध पेग लगा कर भी बैठा हुआ था…ब्लडी स्वाइन।

`आप का परफ्यूम डीप किस है क्या, मैं भी यही यूज करता हूं…` लगातार कंधे पर हाथ रखने औऱ छूने की कोशिश करते उस ठरकी का बस चलता तो मुझे वहीं ड्राइंग रूम में….`बिजनेस तो आपको में इतना दे दूंगा कि आपको और किसी क्लाइंट के पास जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी….हमारी जरूरत का क्या होगा…` मैं ही क्या कोई भी लड़की होती तो इतनी देर में सब समझ जाती। लालच…करियर….बस, …टारगेट पूरा होने की ख्वाहिश…एक ही तो जिंदगी है….एक बार ही तो…पैर फिसलने के लिए काफी मसाला इकट्ठा हो चुका था।

सीन नंबर टू….

`सर, बिजनेस की बात करें…?` मैंने जैसे तैसे उसे कहा। वो तो जैसे किसी दूसरे ही बिजनेस के चक्कर में था। मेरा मन भी एक बार में ही टारगेट पूरा होने के लालच में उलझा था। ग्लैमरस जिंदगी…प्रमोशन…एक बार ही तो…वो सोफे पर मेरे बाजू में आकर बैठ गया। मैं समझ गई अब साला बचने का कोई चांस नहीं है। `सर, एक बार पेपर देख लीजिए…` आप चाहो तो हम सीधे साइन कर देंगे…मैं जब तक मन में ठान चुकी थी। इसकी तो लगानी ही लगानी है। `सर आप साइन कर दीजिए…` उसने कर दिए। वो मुझसे जल्दी में था। जब तक मैंने कागज मोड़कर बैग में रखे। वो अपने हाथ मेरे कंधे पर रख चुका था। बस, साले बहुत हो गया। काम हो चुका था। अब एक्शन का वक्त है। मैंने सबसे पहले उस पर अपना हथियार नंबर वन चलाया। सर, पीरियड चल रहे हैं। और यूरिन इंफेक्‍शन भी है सर प्लीज…उस पर मेरी बात का ज्यादा असर नहीं दिखा लगता था वो साला फुल मूड में था।

`डियर, प्लीज कम, अपना घर दिखाता हूं…` मैं समझ गई ब्रह्मास्त्र चलाने का टाइम आ गया है। साइन्ड पेपर बैग में पहले ही रख चुकी थी। धीरे से मैंने मोबाइल से ब्लैंक एसएमएस किया। ऐसी ही सिचुएशन के लिए अपने कलीग को क्लाइंट के घर के बाहर छोड़कर रखती थी। ब्लैंक एसएमएस मिलते ही उसका काम होता है क्लाइंट के घर पहुंच जाना। इधर, महाशय ने हाथ पकड़ कर घर दिखाने के बहाने मुझे उठाया ही था कि उधर, कॉल बेल बजने लगी, लगातार। उसने एक झटके से मेरा हाथ छोड़ा। मैंने उसकी तरफ देखा। उसका चेहरा सफेद हो रहा था….मैं समझ गई उसकी तो फट चुकी थी बॉस….पूरी तरह से फट चुकी थी।

सो, मोरल ऑफ द स्टोरी इज-

जब भी ऐसे क्लाइंट्स से मिलो अपना काम भी निकालो और उसकी फाड़ दो….फुलटू फाड़ दो। कैसे…मैंने आपको ऊपर बताया ही है…यूरिन इंफेक्शन….पीरियड….और तब भी न माने तो एक मिस्ड कॉल वाला ब्रह्मास्त्र…दरवाजे की घंटी….साले सेक्स के लालची बहुत फटी में रहते हैं कोई आ न जाए…और आने वाली बाहर गई पत्नी तो कतई न हो…तो अगली बार इसी तरह की एक और फाड़ू कहानी के साथ मिलती हूं….

Source : bhaskar.com

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=2592

Posted by on Aug 3 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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