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नकली पैर के साथ माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली अरूणिमा सिन्हा, पेश है खास मुलाकात…

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एक मित्र ने जयपुर से फोन करके कहा कि जिंदगी में सिर्फ क्रेजी लोग ही कुछ कर सकते हैं, जिन्हें हम लोग अक्सर मजाक उड़ाने के अंदाज में मेंटल कहते हैं और शाम को ही मुलाकात हो गई एक ऎसे ही मेंटल से, क्रेजी से, जिसे लोग वाकई कह रहे थे कि पागल हो गई हो क्या, मुझे भी लगा कि उनके फैसले करने की हिम्मत और जÊबा तो बिना पागलपन के हर्गिज हो ही नहीं सकता। बमुश्किल ऎसे पागल लोगों से मुलाकात हो पाती है। एक नकली पैर के साथ माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली अरूणिमा सिन्हा, पेश है खास मुलाकात…

अरूणिमा तुम तो इतना ऊपर चढ़ गई हो कि कहां से शुरू करें बात, एक पैर के साथ पूरा पहाड़ चढ़ गई और वो भी माउंट एवरेस्ट, पागल हो गई हो क्या।
(एक जोरदार सा ठहाका), आप सही कह रहे हैं, पहले लोग भी यही कह रहे थे, जिसने सुना वो एक ही बात बोला कि पागल हो गई हो क्या, पर ये पागल होने की बात एवरेस्ट चढ़ने के बाद नहीं हुई, इसके बारे में सोचने के साथ हुई। दिल्ली में एम्स हॉस्पिटल के बेड पर पड़े-पड़े बस बेचारी शब्द सुन रही थी। इस बेचारगी के साथ थे सहानुभूति के दो शब्द कि अब इस लड़की का क्या होगा, कैसे गुजारेगी ये अपनी जिंदगी। डॉक्टरों ने एक पैर काट दिया था और मैं बेड पर लेटे-लेटे इस बेचारगी से तंग आ गई थी, तो तय कर लिया कि इस बेचारगी को तोड़ना है, जिद कर ली कि पहाड़ पर चढ़ना है। कोई हंसा, किसी ने पागल कहा, किसी ने समझाइश दी, मगर मैंने तय कर लिया था कि पीछे नहीं हटूंगी।

जब तुमने बताया कि अस्पताल के बेड पर लेटी ये लड़की पहाड़ चढ़ना चाहती है तो क्या रिएक्शन था, घर वाले कैसे मान गए, क्या आसान रहा समझाना।
सबसे पहले मां को बताया था, मां ने समझाने की कोशिश की कि कैसे मुमकिन हो पाएगा, फिर भाई को बताया, भाई तैयार हो गया, पर बाकी लोगों का एक ही रिएक्शन था कि पागल हो गई हो क्या, अभी तो सीधे चल भी पाओगी या नहीं, इसका भी पता नहीं और तुम पहाड़ पर चढ़ने की बात कर रही हो, मगर भाई ने बहुत साथ दिया और हौसला बढ़ाया।

कैसे मुमकिन हो पाया ये सब, क्या आसान था ये सफर, किसने इस सफर को तुम्हारे लिए आसान बनाने में मदद की।
भाई तो सबसे पहले तैयार हुआ और उन्होंने हर कदम पर मेरी मदद की। फिर शुरू हुई मशक्कत बछेन्द्री पाल से मिलने के लिए, जब उनसे मुलाकात हुई, तो उन्होंने बहुत हौसला बढ़ाया और मुझमें विश्वास जाहिर किया। वो हरदम कहती रहती थीं कि तू मेरी शेरनी है, मुझे पता है तू कर लेगी। टाटा इंस्टिट्यूट ने पूरी मदद की, वरना मेरे पास पैसा कहां था।

टे्रन में लुटेरों ने तुम्हें लूटने की कोशिश की, फिर धक्का दे दिया और पटरी पर आती दूसरी गाड़ी की वजह से तुम्हारा पैर काटना पड़ा, उसके बाद माउंट एवरेस्ट चढ़ने की सोचना, कैसे मुमकिन हुआ, मुझे भी तुम पागल लगती हो।
हां, पागल तो हूं ही मैं। अस्पताल के बेड पर बेचारगी के बाद जिद पकड़ ली। पहाड़ इसलिए क्योंकि इसमें आप प्लेयर भी हो, स्पेक्टेटर भी हो और चीयरलीडर भी खुद ही हो, दूसरा पहाड़ पर गलती सुधारने का मौका नहीं मिलता, एक गलती होती है जिंदगी और मौत के बीच। मैं समझती हूं कि ऎसे काम के लिए जिद बहुत जरूरी है। फर्क आता है खुद के जुनून को बाहर निकालने से, उसे खोदना पड़ता है और खोजना भी पड़ता है खुद के भीतर, हरेक के भीतर एक एवरेस्ट होता है, बाहर के एवरेस्ट से पहले अंदर के एवरेस्ट पर फतह पाना होता है। सपना तो सभी देखते हैं, लेकिन ऎसा मुकाम हासिल करने के लिए ऎसा सपना देखना होता है जो आपको सोने ही ना दे, जागते-सोते हर पल बस सपना हो आपकी आंखों में। मेरे साथ भी कुछ ऎसा ही हुआ जब तय किया उसके बाद तो शायद सो ही नहीं पाई। हर वक्त आंखों में सिर्फ एवरेस्ट था।

कैसे चढ़ाई पूरी की, क्या मुश्किलें आईं, कभी लगा कि फैसला करके गलती कर ली।
मुश्किल सफर तो था ही, मौसम भी खतरनाक रहता है। हम कुल 6 लोग थे। कैम्प 4 से समिट तक पहुंच कर वापस आने में 26 घंटे लगे। पूरे ट्रैकिंग में एक हफ्ता लगा। रास्ते में कई लाशें दिखाई दीं, जो सफर पूरा नहीं कर पाने वालों की थीं। मेरा नकली पैर एक लाश पर पड़ा वो बांग्लादेशी था, जिसकी मौत ऑक्सीजन खत्म होने की वजह से हो गई थी, मैंने ऊपर वाले से माफी मांगी। मैंने तीन मार्च 2012 को टे्रनिंग शुरू की थी और हम 21 मई को सुबह 10 बजकर 55 मिनट पर वहां पहुंच गए। पर चोटी पर पहुंचने का अहसास ही अलग था, मैं खुशी के मारे चिल्ला रही थी, तब तो मुझे इस बात का पता नहीं था कि मैं पहली लड़की हूं जो नकली पैर की मदद से इस ऊंचाई तक पहुंची, उस वक्त मैं शायद कुछ और सोचना ही नहीं चाहती थी, बस बांहों में भरना चाहती थी दुनिया की सबसे ऊंची चोटी से आसमान को और अपने सपनों को।

वॉ लीबाल फेडरेशन ऑफ इंडिया ने पहले आपको किसी तरह का मुआवजा देने से इंकार किया था, फिर आपकी इस कामयाबी को रजिस्टर करने से इंकार किया, क्या इससे पता चलता है कि हम महिला एथलीट के साथ कैसा बर्ताव करते हैं।
अब क्या कह सकती हूं मैं इस बारे में। हमारे मुल्क में ऎसा ही होता है, अब भी कहां बहुत से लोगों को पता है। लेकिन मैंने बता दिया अपनी क्षमताओं को, ताकत और हौसले को और ये केवल एक खिलाड़ी ही कर सकता है। दुर्घटना से पहले मैंने नेशनल लेवल पर वॉलीबाल और फुटबाल खेला है। बस चाहती हूं कि अब नए, नौजवान खिलाडियों के साथ ऎसा ना हो।

स रकार का रवैया भी तो बहुत अच्छा नहीं रहा आपको लेकर, पहले 20 हजार रू . मुआवजा दिया, फिर दबाव के बाद दो लाख कर दिया और क्या मदद रही सरकार की।
अभी मुझे प्रधानमंत्री जी और सोनिया गांधी जी का बधाई संदेश मिला है।

मैं इस कामयाबी से पहले की बात कर रहा हूं?
अब उसे छोडिए, सरकार ने मदद की, उन्होंने एम्स में भर्ती कराया और इलाज करवाया। अब मुझे किसी से कोई शिकवा-शिकायत नहीं करनी। अब तो मैं चाहती हूं कि स्पोट्र्स एकेडमी खोलूं उन लोगों के लिए, जिन्हें दुनिया विकलांग समझती है। मुझे युवराज सिंह से बहुत प्रेरणा मिली, लगा कि एक आदमी कैंसर से लड़कर फिर से मैदान में पहुंच सकता है तो फिर कुछ भी नामुमकिन नहीं।
मु झे लगता है कि तुम्हें तो असल में उन लुटेरों का धन्यवाद करना चाहिए, जिन्होंने तुम्हें चलती ट्रेन से फेंक दिया और उसके बाद तुम्हारा जुनून जाग गया।
मैं तो सोचती हूं कि उन चोरों के पास इतना दिमाग और ताकत थी, तो काश वो उसे किसी अच्छे काम में लगाएं तो बहुत अच्छे मुकाम पर पहुंच पाएंगे, हमें अपनी ताकत को अच्छे काम के लिए लगाना चाहिए।

आ प उत्तर प्रदेश से हैं और उत्तर प्रदेश तो छोडिए पूरे मुल्क में लड़कियों, महिलाओं की हालत देखिए, क्या सोचती हो, उनके हालात बदलना मुमकिन है।
लड़कियों के लिए तो हालात बेहद खराब हैं। लड़कियों के ही नहीं गरीब आदमी, मिडिल क्लास के लिए बहुत मुश्किल है जिंदगी, लेकिन मैं कहती हूं कि हमें अपनी सोच बदलनी चाहिए। लड़कियों से बोलती हूं कि हार मत मानो, ये रोना-धोना बंद करो। ये मत कहो कि कोई मुझे सता रहा है, परेशान कर रहा है, मुकाबला करो, डटकर लड़ो। मेरी ये लड़ाई तो मिडिल क्लास लोगों के लिए ही है। हम ना शब्द तो अपनी जिंदगी से निकाल ही दें, फिर देखो दुनिया कैसे बदलती है।

अरूणिमा, बहुत-बहुत शुक्रिया और आगे की जिंदगी के लिए बहुत शुभकामनाएं, लेकिन अब एवरेस्ट के बाद किस ऊंचाई पर चढ़ोगी?
नहीं, नहीं शुभकामनाएं चाहिए, जिंदगी में अभी तो बहुत कुछ करना है, बहुत आगे बढ़ना है (हंसी, एक्साइटमेंट, गर्माहट बरकरार है)।

विजय त्रिवेदी
पत्रिका समूह से जुड़े हैं (अरूणिमा सिन्हा से साक्षात्कार…)

Source : पत्रिका

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=2327

Posted by on Jun 10 2013. Filed under खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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