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हिंदू धर्म के रक्षक बनकर आए स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती और उनका आर्य समाज

भारतीय पुनर्जागरण, सुधार तथा समाज को नई दिशा प्रदान करने की दृष्टि से स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती का स्‍थान अतुलनीय है। स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती ने वेदों को आधार स्‍तंभ बनाकर भारतीय समाज को पुनर्गठित करने का प्रयास किया।AryaSamaj

 स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती का रुपांतरण

स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती का जन्‍म सन 1824 ई में हआ था। उनका धार्मिक तौर पर रुपांतरण उस समय हुआ जबकि 14 वर्ष की आयु में शिवरात्रि के दिन एक चूहे को शिव की मूर्ति पर छलांग लगाते एवं प्रसाद खाते देखा। उन्‍होंने महसूस किया कि मूर्ति स्‍वयं में ईश्‍वर नहीं हो सकती है।

एक समाज सुधारक के रूप में स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती
अंग्रेजों का भारत पर साम्राज्‍य स्‍थापित हो चुका था। यातायात के साधन, संचार, छापेखाने और समाचारपत्र का अभाव था। अंग्रेजी शिक्षा से बड़े पैमाने पर लिपिक वर्ग का निर्माण हो रहा था। भारत औपनिवेशिक उत्‍पीड़न से उत्‍पन्‍न अनेक प्रकार की बुराइयों जैसे- छूआछूत, भारतीयों का बहु संख्‍या में ईसाई धर्म में धर्मांतरण, महिलाओं का गिरता स्‍तर, पर्दा प्रथा, बाल विवाह, निरक्षरता, गरीबी आदि से त्रस्‍त था।  इसके अतिरिक्‍त भारतीय समाज पूरी तरह से पुरोहितों एवं ब्राह्मणों पर आश्रित था। इस सबसे दुखी दयानंद ने महसूस किया कि समाज में बहुत बड़े परिवर्तन की जरूरत है।

हिंदी को बनाया अपनी शिक्षाओं का आधार
स्‍वामी दयानंद ने समस्‍त हिंदुओं को वेदों के अंतर्गत एक करने की चेष्‍टा की। उन्‍होंने हिंदूवाद के बारे में अपने दृष्टिकोण से प्रवचन देना शुरू किया। उन्‍होंने अनेक विद्वानों के साथ वादि-विवाद किए। सन 1872 में ब्रह्म समाज के  नेताओं के साथ हुई एक गोष्‍ठी के फलस्‍वरूप उन्‍होंने अपने प्रवचन संस्‍कृत की बजाए हिंदी भाषा में देना शुरू किया। साथ ही उन्‍होंने हिंदी में स्‍कूलों एवं मासिक पत्रिकाओं की भी शुरुआत की। समस्‍त उत्‍तरी भारत में उनके इस विचार का स्‍वागत किया गया।

आर्य समाज की स्‍थापना
1875 में अपने बंबई दौरे के समय स्‍वामी दयानंद ने आर्य समाज की स्‍थापना का दूरगामी निर्णय लिया। आर्य समाज का उदृदेश्‍य उनके प्रवचनों का प्रचार कर हिंदुओं को वेद की ओर लौटो का संदेश देना और समाज में व्‍याप्‍त हो चुकी कुरीतियों को समाप्‍त करना था। इससे हिंदू धर्म और भारतीय राष्‍ट्रवाद के विकास पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। आर्य समाज के जरिए दयानंद सरस्‍वती समस्‍त हिंदुओं को एक सूत्र में बांधना चाहते थे।

आर्य समाज का मूल उद्देश्‍य:
* समाज में धार्मिक व सामाजिक सुधार लाना
* वैदिक धर्म की पुन: स्‍थापना
* हिंदुओं को संगठित करना ताकि इनका सुधारात्‍मक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ सके। ये एक दूसरे की सहायता कर सकें और सुधार के लिए हमेशा प्रयत्‍नशील रहें।

सत्‍यार्थ प्रकाश: स्‍वामी दयानंद के मूल विचार
दयानंद सरस्‍वती जी ने वेद, समाज, मनुष्‍य, धर्म, जीवन चर्या, शिक्षा आदि के संदर्भ में अपने विचारों को एक स्‍पष्‍टता प्रदान की थी। उनके ये विचार उनकी पुस्‍तक ‘सत्‍यार्थ प्रकाश’ में मौजूद है।

सर्वप्रथम उनके इन विचारों को 28 नियम बनाकर आर्य समाज की शाखा ने प्रस्‍तुत किया, परंतु 24 जुलाई 1877 इसमें संशोधन किया गया, जो आर्य समाज के लिए चिरस्‍मरणीय दिवस साबित हुआ। इस दिन लाहौर में आर्य समाज का नवीनीकरण कर उसे पुन: स्‍थापित किया गया। नियमों की संख्‍या को 28 से घटाकर 10 कर दिया गया। ऐसा प्रतीत होता था कि आर्य समाज का नया विधान बनाया गया हो। आर्य समाज के ये मूलभूत सिद्धांत 24 जुलाई 1877 को पारित कर दिया गया। इस प्रकार स्‍वामी जी के विचार आर्य समाज का मूल सिद्धांत बन गया…

आर्य समाज के 10 मूलभूत सिद्धांत:
1) सच्‍चे ज्ञान की प्राप्ति। सच्‍चे ज्ञान का मूल स्रोत परमात्‍मा है।

2) परमेश्‍वर ही परम सत्‍य है, परम ज्ञान है, परमानंद है। वह निराकार है, सर्वशक्तिमान है, यथार्थ है, दयालु है, अजन्‍मा है, अनंत है, अपरिवर्तनीय है, अनादि है, अद्वितीय है। सबका सहायक और स्‍वामी है। सर्वव्‍यापी और सबकी अंतरआत्‍मा में निवास करता है। परमात्‍मा चिरस्‍मरणीय एवं संदेह से परे है। वह सारे विश्‍व का सृष्टिकर्ता है। केवल वही पूजने योग्‍य है।

3) वेद समस्‍त ज्ञान के भंडार हैं। समस्‍त आर्यसमाजियों के लिए वेदों का पुन: अध्‍ययन व उसका प्रचार करना अनिवार्य है। वेदों को सुनना और सुनाना उनका मुख्‍य कर्तव्‍य हैं।
स्‍वामी दयानंद के सिद्धांतवाद में परमेश्‍वर के बाद वेदो का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। उनका मानना है कि हमें धर्म ग्रंथों में लिखी हुई उन सभी बतों को अमान्‍य कर देना चाहिए जो वेदों के उपदेशों से भिन्‍न हैं। वेद परमेश्‍वर द्वारा उच्‍चरित शब्‍द हैं, जिन्‍हें ऋषियों द्वारा समस्‍त मानव जाति को प्रवचन कराया गया है। वेद मानव निर्मित नहीं हैं।

4) सच्‍चाई को हमें सदैव स्‍वीकार कना चाहिए एवं असत्‍य को सदैव ठुकराना चाहिए। किसी विचारधारा को केवल समय के अनुकूल मानकर मान्‍यता प्रदान करना उचित नहीं है। असत्‍य विचारों का बहिष्‍कार करने में हमें जरा भी संकोच नहीं करना चाहिए।

5) मनुष्‍य को सही एवं गलत की विवेचना करने के उपरांत धर्म के अनुसार ही अपने कर्म करना चाहिए। सही कार्य कीजिए और गलत कार्य से दूर रहिए।

6) भौतिक, सामाजिक एवं अध्‍यात्मिक रूप से समस्‍त विश्‍व की भलाई ही आर्य समाज का मुख्‍य उदृदेश्‍य है।

7) समस्‍त प्राणियों के साथ हमारे आचरण का आधार प्रेम व सदभावना होना चाहिए न कि घृणा, दुर्भावना या असहनशीलता। प्रेम एवं सदभावना पर आधारित समाज के निर्माण से पृथ्‍वी पर ही स्‍वर्ग की अनुभूति होगी, यही वैदिक समाजवाद है।

8) समस्‍त कार्य अज्ञानता की समाप्ति व ज्ञान की प्राप्ति के लिए करने चाहिए। निरक्षरता, अज्ञानता एवं अंधविश्‍वास समस्‍त बुराईयों की जड़ है। ज्ञान द्वारा सर्वव्‍यापी कल्‍याण एवं आनंद की प्राप्ति होती है।

9) किसी भी व्‍यक्ति को स्‍वयं अपनी उन्‍नति से संतुष्‍ट नहीं होना चाहिए, बल्कि समस्‍त मानव जाति की भलाई में ही स्‍वयं की भलाई की अनुभूति करनी चाहिए।

10) समस्‍त मानव जाति की भलाई के लिए निर्धारित किए गए सामाजिक नियमों का पालना करना प्रत्‍येक व्‍यक्ति के लिए अनिवार्य है। इसके बावजूद प्रत्‍येक व्‍यक्ति को अपने कल्‍याण के लिए कार्य करने की स्‍वतंत्रता है।

आर्य समाज आंदोलन एवं समाज सुधार
आर्य समाज ने उत्‍तरी भारत में बालक व बालिकाओं के लिए बड़ी संख्‍या में शिक्षण संस्‍थान खोले। सन 1883 में लाहौर में डीएवी(दयानंद ऐंग्‍लो वैदिक वि़द्यालय) की स्‍थापना से इसकी शुरुआत हुई।

अनेक गुरुकुलों की स्‍थापना और अनाथालय खोलने के कारण हिंदुओं को ईसाई धर्म में धर्मांतरित होने से रोका गया। 1923 में जब मालाबार के मोपलाओं द्वारा जबरदस्‍ती हिंदुओं को इस्‍लाम धर्म अपनाने के लिए विवश किया गया तो केवल आर्य समाज ने ही इसका प्रतिरोध किया और इस्‍लाम में दीक्षित हिंदुओं को पुन: हिंदू धर्म में शामिल किया।

महात्‍मा गांधी द्वारा अछूतों के उद्धार का काम अपने हाथ में लिए जाने से पहले वह आर्य समाज ही था जिसने दलितों को बराबरी का दर्जा दिलाने हेतु प्रयास किया। आर्य समाज ने हिंदुओं के बीच फैले अंधविश्‍वासों को दूर करने एवं उन्‍हें धर्म की बुनियादी शिक्षा देने के लिए अथक प्रयास किया।

हिंदू धर्म पर आई विपदा को आर्य समाज ने किया विफल
हिंदू धर्म कोई किताबी धर्म नहीं है। इसका विकास स्‍वत: हुआ। वर्णाश्रम व्‍यवस्‍था के कारण किसी भी नए व्‍यक्ति या समूह को सम्मिलित कर उसे पचाने की अदभुत क्षमता हिंदू धर्म में है। इसके बावजूद हिंदू धर्म को अपनी शाश्‍वत पहचान को बनाए रखने के लिए तीन बार गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पहली बार, जैन व बौद्ध धर्म से, दूसरी बार इस्‍लाम से और तीसरी बार ईसाईयत से।

अंग्रेजों के शासन काल में हिंदुत्‍व पर जो तीसरी बड़ी विपदा आई, उसे विफल करने में आर्य समाज की महत्‍वपूर्ण भूमिका रही। हिंदुओं के बहुसंख्‍या में ईसाई धर्म में शामिल होने पर आर्य समाज ने वेद की ओर लौटो का नारा और सुधारात्‍मक प्रयास से एक तरह से रोक लगा दिया। हिंदुतव की अविकल धारा को बनाए रखने में आर्य समाज ने महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा की।

आर्य समाज और महिलाओं का उद्धार
आधुनिक काल में महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने में स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती का योगदाल महत्‍वपूर्ण है। उन्‍होंने ‘योनियों’ की बराबरी के पक्ष का समर्थन किया।

महिलाओं को वेद पाठन की अनुमति: उन्‍होंने महिलाओं को वेदों के अध्‍ययन की अनुमति प्रदान की, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम माना गया। महिलाओं को गायत्री मंत्र के उच्‍चारण की भी अनुमति प्रदान की गई जबकि परंपरा उन्‍हें यह अधिकार नहीं देता था। स्‍वामी दयानंद ने यह स्‍थापित किया कि अकेले ऋग्‍वेद में ही 200 मंत्र महिला ऋषियों द्वारा दिए गए हैं, फिर महिलाओं को वेद पाठन से वंचित करना कहां से उचित है।

बाल विवाह का निषेध: स्‍वामी जी ने बाल विवाह के विरुद्ध एक धर्मयुद्ध की जैसे घोषणा की कर दी। स्‍वामी दयानंद जी ने आदेश दिया कि किसी भी कन्‍या का विवाह 16 वर्ष की आयु से पूर्व एवं लड़के का विवाह 25 वर्ष की आयु से पूर्व नहीं करना चाहिए। इसके लिए उन्‍हें उस समय तक प्रचलित शास्‍त्रीय निषेधाज्ञा का सामना करना पड़ा।

उस समय तक प्रचलित था कि कन्‍या का विवाह उसके मासिक धर्म शुरू होने से पूर्व कर देना चाहिए। इसके लिए अंधविश्‍वास था कि जो भी लड़की अपने पिता के घर में रजस्‍वला हो जाएगी, उसके पिता व भाई को नरक जाना पड़ेगा। दयानंद जी ने इस धारणा को निर्मूल कर दिया। उन्‍होंने तर्क दिया कि एक जैविक व प्राकृतिक प्रक्रिया के लिए किसी व्‍यक्ति को नरक में क्‍यों जाना होगा।

एक विवाह के पक्षधर: स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती ने उस समय के बहुविवाह प्रथा पर करारा प्रहार किया। उन्‍होंने स्‍पष्‍ट रूप में यह कहा कि पुरुष एवं स्‍त्री को केवल एक विवाह ही करना चाहिए। किसी युवा विधवा महिला के लिए उन्‍होंने पुनर्विवाह की अपेक्षा ‘नियोग’ प्रथा का समर्थन किया। उन्‍होंने नियोगा का समर्थन करते हुए कहा कि युवा विधवा महिला अपने दिवंगत पति के भाई या अन्‍य किसी आत्‍मीय स्‍वजन के साथ एक या दो संतान की प्राप्ति के लिए शारीरिक संबंध स्‍थापित कर सकती है। इसमें कोई बुराई नहीं है, परंतु बच्‍चे दो से अधिक नहीं होने चाहिए।

कन्‍या शिक्षा के प्रबल समर्थक: स्‍वामी जी कन्‍या शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उन्‍होंने महिला शिक्षा का प्रभावी ढंग से प्रचार किया। लड़के व लड़कियों के लिए विद्यालयों की स्‍थापना की गई। डीएवी इसका अनुपम उदाहरण है। इसके साथ ही आर्य समाज ने 1896 में जालंधर में प्रथम कन्‍या महाविद्यालय की भी स्‍थापना की थी।

आर्य समाज: हिंदुत्‍व का खड्ग बांह
स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती व उनका आर्य समाज हिंदुत्‍व का खड्ग बांह साबित हुआ। स्‍वामी जी के ‘वेद की ओर लौटो’ के विचार के कारण बड़ी संख्‍या में हिंदू मूर्ति पूजा को छोड़ वेद पठन-पाठन की ओर लौट पड़े।

बहुतों ने अपने धर से देवी-देवताओं की तस्‍वीरों को विदा किया, तो बहुतों ने पूर्वजों के लिए अपनाई जाने वाली श्राद्ध की पद्धति बंद कर दी, बहुतों ने पंडितों व पुरोहितों को अपने यहां बुलाना बंद कर दिया। जो विधिवत आर्य समाजी नहीं बन सके, उनका विश्‍वास भी शास्‍त्रों व पुराणों पर से हिल गया और वो भी वेद को हिंदू धर्म का मूल मानकर उसका अध्‍ययन करने लगे।

इस सबसे अलावा इस्‍लाम और ईसाइयत के हमले से हिंदुओं की रक्षा करने में जितनी मुसीबतें आर्य समाज ने झेली उतनी किसी और संस्‍था ने नहीं। सच पूछिए तो उत्‍तर भारत में हिंदुओं को जगाकर उन्‍हें प्रगतिशील बनाने का सारा श्रेय स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती और उनके आर्य समाज को ही जाता है।

नोट: प्रसिद्ध समाजशास्‍त्री प्रो मुजतबा हुसैन से पढ़ाई के दौरान हासिल अध्‍ययन नोट पर आधारित

आभार : संदीप देव।

Source : aadhiabadi.com

 

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Posted by on Jun 4 2013. Filed under हिन्दुत्व. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

2 Comments for “हिंदू धर्म के रक्षक बनकर आए स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती और उनका आर्य समाज”

  1. अनुराग भारद्वाज

    ससम्मान स्वामी जी, मूर्ति पूजा में कोई बुराई नही है| जितनी कलाएं विकसित हुई हैं सब मूर्ति पूजा के कारण हुई हैं| जैसे पेंटिंग, श्रृंगार, मूर्ति निर्माण, भूषा, संगीत आदि|
    सनातन धर्म समेत दुनिया के सब धर्म निर्गुण भगवान् को मानते हैं| अब कोई निर्गुण भगवान् को भजन तो सुना नहीं सकता| बड़ा भोला सा तर्क है निर्गुण भगवन, अल्लाह, God आदि के तो कान ही नहीं हैं| और वो इंसान की सुनकर मानने भी नहीं वाले| तो कभी संगीत विकसित नही होने वाला था| साकार, सगुण ईश्वर के कारण ही यह कलाएं विकसित हुईं| यहीं सनातन धर्म औरों से अलग है|
    स्वयं कोई कैसे भी कपडे पहन ले लेकिन अपने भगवान के लिए एकदम अव्वल दर्जे के कपडे ही चाहेगा| अकेले चित्र कलाएं या पेंटिंग विभिन्न प्रकारों में जैसे पत्थर पर, कपडे पर रंग से या धागे से, जेदोपाटीया आदि ऐसे ही नहीं विकसित हुई| सब भगवान् से प्रेम के कारण ही हुई| अगर मूर्तिपूजा न हो तो कोई विकास तो क्या बस बुर्का पहने अंधेर कोठरी में ही बैठे रह जाते|

  2. Navjeet Anand

    Arya Samaj ko mera sat sat naman. JAI HINDU JAI HINDI JAI HINDUSTAN.

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