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बोफोर्स दलाली कांड

बोफोर्स दलाली कांड

यह भारत का एक ऐसा घोटाला था, जिसने 1980 के बाद के दशक में बहुत तहलका मचाया था और राजीव गाँधी की सरकार भी मुख्यतः इसी घोटाले के कारण गिरी थी। यह उस समय का सबसे बड़ा घोटाला भी था, जिसके रिकाॅर्ड को अब नये-नये विराट घोटालों ने तोड़ दिया है।

 

भारत ने अपनी थल सेना के लिए 410 तोपें 285 लाख डालर (लगभग 1500 करोड़ रुपये) में खरीदने का एक समझौता स्वीडन की कम्पनी बोफोर्स के साथ 24 मार्च 1986 को किया था। ये तोपें बहुत अच्छी थीं और कारगिल के युद्ध में इनका काफी अच्छा उपयोग भी हुआ। उस समय भारत सरकार की यह नीति थी और अभी भी है कि रक्षा सौदों में कोई दलाली किसी को नहीं दी जाएगी और सीधे निर्माता कम्पनियों से खरीदारी की जाएगी। लेकिन इस सौदे के लगभग 1 साल बाद स्वीडन के सरकारी रेडियो ने यह समाचार देकर सनसनी फैला दी कि इस सौदे के लिए बोफोर्स कम्पनी ने 12 लाख डालर (लगभग 64 करोड़ रुपये) दलाली के रूप में दिये हैं। यह रकम उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी थी।

 

प्रारम्भ में तत्कालीन सरकार, जिसके प्रधानमंत्री राजीव गाँधी थे, ने इस समाचार को दबा दिया, लेकिन ‘द हिन्दू’ अखबार के एक पत्रकार एन. राम ने इस पर कहानी छाप डाली। सरकार ने उस अखबार पर भी दबाब डाला, जिससे उसने इस मामले पर आगे कुछ भी छापना बन्द कर दिया, लेकिन फिर यह कहानी पर इंडियन एक्सप्रैस के सम्पादक और उनकी टीम ने गहराई से छानबीन की और तब इसका पूरा कच्चा चिट्ठा देश के सामने आया। इसके अनुसार यह दलाली इटली के एक व्यापारी ओटावियो क्वात्रोकी तथा कुछ प्रमुख भारतीय राजनीतिज्ञों को दी गयी थी। इसका इशारा सीधे राजीव गाँधी की ओर था, क्योंकि क्वात्रोकी रिश्ते में राजीव गाँधी का साढ़ू लगता था।

 

यहाँ यह बता देना अप्रांसगिक न होगा कि इन्दिरा गाँधी सोनिया के रिश्तेदारों को कोई भाव नहीं देती थीं, लेकिन जैसे ही उनकी हत्या हुई और राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने, वैसे ही सोनिया और उनके इटालवी रिश्तेदारों की बन आयी और वे भारत की अनेक व्यापारिक कम्पनियों और भारत सरकार के बीच दलाली करने लगे। क्वात्रोकी इनमें प्रमुख था।

 

बोफोर्स सौदे में दलाली की बात उजागर होने पर राजीव गाँधी की बहुत बदनामी हुई, हालांकि वे बार-बार इस मामले पर पर्दा डालने की कोशिश करते थे। उनके बयान बार-बार बदलते थे, जैसे पहले कहा कि इस सौदे में किसी को कोई दलाली नहीं दी गयी है। जब यह झूठ खुला तो कहने लगे कि किसी भारतीय को कोई दलाली नहीं दी गयी है। लेकिन तभी विन चड्ढा और हिन्दुजाओं के नाम सामने आ गये, तो राजीव गाँधी कहने लगे कि कम से कम मेरे परिवार का कोई व्यक्ति इसमें शामिल नहीं है। जब इसकी पर्तें उधड़ने लगीं, तो उनका बयान फिर बदल गया और कहा कि कम से कम मैंने दलाली नहीं खायी है। परन्तु यह बात भी सामने आ गयी कि दलाली का एक बड़ा हिस्सा स्विटरलैंड के एक बदनाम बैंक में ‘लोटस’ नाम के खाते में जमा हुआ था। अंग्रेजी शब्द ‘लोटस’ और संस्कृत शब्द ‘राजीव’ दोनों का अर्थ कमल होता है। इससे लोगों को यह विश्वास हो गया कि दलाली राजीव गाँधी ने खुद खायी है।

 

उस समय प्रख्यात वकील राम जेठमलानी एक महीने तक रोज ही इस मामले पर 10 सवाल पूछते रहे, जिनका कोई जबाब कभी किसी ने नहीं दिया। लेकिन राजीव गाँधी की बहुत बदनामी हुई और बच्चे तक ‘गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है’ के नारे लगाया करते थे। उन दिनों राजीव गाँधी की विश्वसनीयता इतनी गिर गयी थी कि वे शाम को टी.वी. पर कुछ बोलते थे, तो दूसरे दिन लोग यह जानने के लिए ��खबार पढ़ते थे कि हमारे प्रधानमंत्री जी कितना झूठ बोल गये।

 

यहाँ यह बताना जरूरी है कि राजीव गाँधी के मंत्रिमंडल में विश्वनाथ प्रताप सिंह वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री रहे थे और उनके ही समय तोपों का सौदा हुआ था। लेकिन दलाली देने-लेने की भनक उनको भी नहीं लगी और इसी बात पर उन्होंने राजीव गाँधी का मंत्रिमंडल छोड़ दिया और जनता दल में शामिल हो गये। बाद में वे इसी बोफोर्स दलाली कांड का फायदा उठाकर प्रधानमंत्री भी बने, हालांकि वे भी बुरी तरह असफल रहे।

 


राजीव गाँधी की सरकार और बाद की कांग्रेसी सरकारों ने सी.बी.आई का घोर दुरुपयोग इस मामले पर लीपापोती करने और दोषियों को बचाने के लिए किया। यही कारण है कि इस मामले के पूरे कागज कभी देश को नहीं मिले और अपर्याप्त सबूतों के अभाव में क्वात्रोकी, विन चड्ढा, हिन्दुजा और अन्य सभी आरोपी बेदाग छूट गये। इतना ही नहीं सी.बी.आई. के ढीलेपन के कारण क्वात्रोकी न केवल सारे मामलों में बच गया, बल्कि भारत से भी बाहर भाग गया या उसे भगा दिया गया। इतना ही नहीं उसके जाम किये गये वे बैंक खाते भी खुल गये, जिनमें दलाली की रकम जमा थी, और वह सारी रकम निकाल ले गया।

 

अन्त में एक बात और। कुछ लोगों ने इस मामले में राजीव गाँधी के बाल सखा अमिताभ बच्चन और उनके परिवार को खामखाँ घसीटने की कोशिश की। वे 1984 के चुनावों में हेमवती नन्दन बहुगुणा जैसे घाघ राजनेता को बुरी तरह हराकर इलाहाबाद से लोकसभा में आये थे। लेकिन जब उन्होंने यहाँ फैली हुई गन्दगी को देखा, तो समझ गये कि राजनीति के अँगने में उनका कोई काम नहीं है और लोकसभा से इस्तीफा देकर चले गये।

 

लेखक : विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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Posted by on Sep 9 2012. Filed under इतिहास, मेरी बात, सच. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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