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स्वार्थ निगल रहा है बचपन

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स्वार्थ निगल रहा है बचपन

 

बचपन सहज, सरल और स्वाभाविक होता है| यह सादगी, भोलेपन और भावना की त्रिवेणी है| बच्चे के लिए बचपन मुफ्त का उपहार है| यह एप्लीकेशन इस गैजेट में इनबिल्ट है| बालावस्था का दुसरा नाम आनंद है| यह एक असीमित आज़ादी है| बच्चे से बचपन का वही संबंध है जो शरीर का आत्मा से है| आत्मा उडी तो शरीर मिट्टी| बचपन अलग हुआ तो बच्चा बस एक यंत्र ही बचता है| भावनारहित आत्मारहित मशीन| ऐसा समझा जाता था कि कोई इसे प्रभावित नहीं कर सकता| लेकिन विज्ञान एवं तकनीकी इतना विकास कर चुकी है कि बहुत आसानी से बच्चे से बचपन का पृथक्करण‎ कर दे| इसे वर्तमान व्यवस्था की एक हानि या मनुष्य के स्वार्थ का एक नमूना कह सकते हैं|

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तीन हज़ार भारतीय बच्चे आतंकवाद में धकेले जा चुके हैं| खेलने की उम्र में इनके हाथों में बंदूक थमा दी गयी है| करीब अढाई हज़ार बालक-बालिकाएं नक्सलवाद ग्रसित क्षेत्रों में हिंसक गुटों में शामिल किये गए हैं| पांच सौ बच्चे कश्मीर और उत्तर-पूर्व के आतंकी संगठनों में शामिल किये जा चुके हैं| यह दावा किया है एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स ने| हम अपने बच्चों को स्कूलों में एडमिशन तो नहीं दिला पाए लेकिन इन्हें आतंकी विश्वविद्यालयों में जरुर दाखिला मिल गया है| प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार ये कडवा सच निगलती नही है| 2011 में संयुक्त राष्ट्र कमेटी समक्ष भारत सरकार ने  खंडन किया है कि भारत में कोई बाल आंतकी है| संयुक्त राष्ट्र की हिदायतों के अनुसार यह सरकार का कर्त्तव्य बनता है कि अठारह वर्ष से कम उम्र का कोई भी बच्चा हिंसक और सैन्य गतिविधि में शामिल न हो| रिपोर्ट में ऐसे चित्र भी प्रकाशित हैं जिनमें तत्कालीन गृह मंत्री प.चिदम्बरम और तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के समक्ष समर्पण कर रहे आतंकियों में किशोर बालक नज़र आ रहे हैं| नक्सलवाद ग्रसित इलाकों में बंदूक का भय दिखा कर हर घर से एक बच्चा हिंसक दलों में शामिल किया जा रहा है| यह बहुत आसानी से एक प्रथा का रूप ले सकता है| इनका बचपन तो छीना ही जा रहा है साथ में मस्तिष्क में ज़हर भी भरा जा रहा है अपने ही लोगो के खिलाफ| यह किसी भी सभ्य समाज में नहीं हो सकता| इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता जो भी हो लेकिन अपने देश में बच्चों की स्थिति तो संतोषजनक नही है|

इस समय भगवान बालगोपाल के देश में लगभग तीन लाख बाल-बालाएं सड़कों पर भीख मांग रहे हैं| कुछ विशेषज्ञों के अनुसाए ये आंकड़ा दस लाख भी हो सकता है| कोई बालक स्वयं भीख मांगने का शौक नहीं रखता|| अपने मां या पिता के साथ ज़रूर नज़र आ जाता है| सच ये है कि भीख मांगना एक उद्योग का रूप ले चूका है| सरकारी आंकड़ा है कि प्रत्येक वर्ष 44000 बच्चे खो जाते हैं| माफिया बच्चे अपहृत करते हैं| फिर मां बाप से कभी नहीं मिल पाते| सारा जीवन सड़क पर गंदे नाले के पास ही कटता है| बड़े बड़े गैंग इसमें शामिल हैं| बहुत बढ़ी संभावना है कि अपहृत बच्चा पेशेवर भिखारी बना दिया जाये| अंगभंग कर दिया जाता है| तेज़ाब डालकर जलाया जाता है| भूखा रखकर और पीटकर तड़पाया जाता है| बच्चा जितनी निर्मम अवस्था में होगा भीख उतनी ज्यादा मिलती है| देशभर में ये माफिया एक साल में सत्तर लाख डॉलर का व्यापार इन बच्चों से करा रहे हैं| माफिया बाकायदा बच्चों को ट्रेनिंग देते हैं| भिखारी बच्चों से कुछ भी पूछा जाये जवाब रटा रटाया ही मिलता है| हमें रेलगाड़ियों में, मंदिरों के बाहर, दर्शनीय स्थलों पर, शौपिंग माल्स के बाहर जो भी बच्चे नज़र आतें हैं वे इन्हीं गैंग के शिकार हैं| बच्चों को दर्द देकर रुलाया जाता है| खाली पेट में ऊंचा गवाया जाता है| नाच कर दिखाते हैं| ताकि मेहरबान खुश हो सके और पैसा बच्चे की तरफ उछाले| लेकिन ये पहुंचता माफियाओं के पास है| अपनी संस्कृति में दान का बहुत महत्व है| ज़रूरतमंद को दान देना चाहिए| यहाँ तक देखने में आता है कि भीख पाकर कई भीक्षू कुछ पैसे मंदिर के दानपात्र में डालेंगे| भारतीय दान करना बहुत पुण्य का काम समझतें हैं| माफियाओं ने यह बात पकड़ ली है| भीक्षू को खाना खिलाएंगे वो नहीं खायेगा| बस एक दो रुपये ही मिल जाए तो बहुत है| ये भीख क्यों मांग रहे हैं? हम कभी नहीं सोचते| भावुक ज़रूर हो जाते हैं| भीख देने के पीछे मंतव्य सहायता करने का है| लेकिन क्या हम भीख देकर सहायता कर रहे हैं या बच्चे को और दलदल में भेज रहे हैं| भीख देकर बच्चे का नुक्सान ही कर रहे हैं| सहायता तो तब हो अगर बच्चे का पुनर्वास करवाया जाये| माफिया के चंगुल से छुडाया जाये| बच्चे एक भीख मांगने वाली मशीन की तरह काम करते हैं| सड़कों पर भूखे घूमते हैं| टारगेट सेट करके दिया जाता है| चाइल्ड इंडिया फाउंडेशन के अनुसार हर साल डेढ़ हज़ार बच्चे अगवा कर सऊदी अरब भेजे जाते हैं| हज के दौरान भीख मांगने के लिए| दीवाली पर और बच्चे ज्यादा हर्षोल्लास के माहौल में होते हैं| लेकिन आदमी के लालच के शिकार ये बच्चे इस समय और ज्यादा अमानवीय स्थिति में ओवरटाइम लगा टारगेट पूरा कर रहे होते हैं| ठीक वैसे ही जैसे किसी फैक्ट्री में कर्मचारी ओवरटाइम करते हैं|
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बाल तस्करी बाल अपराधों का समूह है| राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार हर आठ मिनट में एक बच्चा गुमशुदा सूची में आ जाता है| जिसमें से चालीस प्रतिशत कभी लौट कर नही आ पाते| कुछ संस्थायों की मानें तो केवल पचास प्रतिशत मामलों में रिपोर्टिंग हो पाती है| ये अपहरण या तो भीख माफियाओं नही तो बाल तस्करों का काम होता है| ये बाल तस्कर अगर इन्हें अरब देशों में बेच दें तो लाखो रुपये मिलते हैं और बच्चे ऊंठ की दौड़ों में ऊंठ की पीठ पर सवार होते हैं| ऊंठों को शराब पीलाकर दौड़ाया जाता है| बच्चे कभी भी इनके पैरों में जा गिरते हैं| बच्चे वैसे स्मगल किये जाते हैं जैसे कोई सामान या ड्रग्स हों| बाल तस्करी बहुत संगठित व्यापार है| समाचार पत्र बताते हैं राष्ट्रभर में आठ सौ से ज्यादा गैंग बाल तस्करों के हैं| पांच हज़ार लोग सीधे इस व्यापार से जुडें हैं| इन अपहृत बच्चों के अंग निकाल कर बेचे जाते हैं| वैश्यावृति की भेंट चढ़ जाते हैं|  बाल मजदूरी में फ़ेंक दिए जाते हैं| समूहों के समूह बच्चों के पकडे जाते हैं| कभी किसी स्टेशन से पन्द्रह बच्चे पकडे जाते हैं| कभी किसी घर में क़ैद मिल जाते हैं| इनकी कीमत पांच किलो चावल से लेकर लाखों रुपये तक है| यह लाख तो बस माफियाओं के हाथ ही आतें हैं| बंधुआ मजदूरी करवाई जाती है| यह बच्चे अवैध कारखानों में मशीनों  की तरह काम करते हैं| कोई पैसा भी नहीं दिया जाता| यह बच्चे फूटबाल खेलते नहीं है| फूटबाल सिलते हैं| खेलते तो आदमी हैं| पटाखे बजाते नहीं है| अंधेर कोठडी में छुपा कर पटाखों में मसाला भरते हैं| इन बच्चों को कोई पुचकारता नहीं है| कंधे पे उठा कर कोई मेला दिखाने नही ले जाता| खेलना पढ़ना तो दूर की बात है| खाना भी इतना दिया जाता है कि ज़िंदा रह सकें| जानवरों से बदतर स्थिति है|  किसी भी छोटे बड़े ढाबे होटल में तंदूर में सीन्खें मारते नज़र आएंगे नहीं तो बर्तन मांझते|

अपने बच्चों की इतनी बूरी स्थिती का कोई कारण भी तो होगा| पिछले कुछ दशकों में अपने यहां बाजारीकरण बहुत तेज़ी से हुआ है| यह पाप भी इन्ही दिनों सबसे ज्यादा बढ़ा है| उपभोक्तावाद ज़ोरों पर है| कोई उत्पादन कर रहे हो तो सबसे सस्ता होना चाहिए नहीं तो खत्म हो जाओगे| मजदूरी सस्ती होगी तो ही प्रोडक्ट सस्ता होगा| सस्ती मजदूरी पाने के लिए बालश्रम इन राक्षसों के लिए वरदान साबित हो रहा है| बालश्रम सस्ता ही नहीं एकदम मुफ्त है| स्वचालित रोबोट जैसे काम कर सकते हैं लेकिन रोबोट जितने महंगे भी नही| तो क्यों न बाल तस्करी हो?  आज अगर आपको पानी भी पीना हो तो जेब में हाथ होना चाहिए| पढ़ाई, इलाज से लेकर भक्ति तक सब रुपये के बिना नज़र भी नहीं आता| आज अच्छा ख़ासा पैसा कमाए बिना जीवन आसान तो नहीं होने वाला| जिस व्यवस्था में पैसा मूल में है, आदमी तो पैसे की तरफ दौड़ेगा ही| पैसे के लिए साला कुछ भी करेगा| क्योंकि नहीं किया तो मरेगा| बस यहीं पैसा कमाने के सबसे सरल उपायों में है बाल तस्करी| हमें सुनाया जाता है कि कुछ सौ साल पहले तक हम असभ्य थे| उस असभ्यता में बच्चों को भूखा रख कर मशीनों की तरह काम तो नहीं लिया जाता था| उनके अंग निकालकर बेचे तो नहीं जाते थे| आज बच्चों का शोषण कर हम सभ्य और विकसित देश बन जायेंगे| इस व्यापर में कैपिटल भी नहीं चाहिए| बस एक पांच रुपये की चोकलेट दिखाओ और फिर लाखो पाओ| बच्चा तो नासमझ है लेकिन इस पूंजीवाद और व्यवसायीकरण ने अच्छे भले आदमी को राक्षस बना डाला| मां बाप भी तो क्या करें| गरीबी भी तो बेतहाशा है| अपने सामने अपने दिल के टुकड़े को सूखता सडता नहीं देख पाते| दिल के टुकड़े को दिल पर पत्थर रख कर किसी योग्य आदमी को बेच डालते हैं कि बेचारे को खाना तो खिलायेगा| अपने यंहा खिचडी व्यवस्था है| भारतीय व्यवस्था को तो भूल ही जाओ| क्या हम इस पूंजीवाद, उपभोक्तावाद और समाजवाद की खिचड़ी से बाहर निकलकर उस भारतीय व्यवस्था को समझ पायेंगे जिसने हमें सोने की चिड़िया बनाया| कोई बच्चा भूखा भी नहीं मरता| लेकिन कुपोषण का शिकार होकर कोई बीमारी से ही मृत्यु होती है| जब हम अपने बच्चों को बचपन नहीं दे पा रहे तो जवानी की उम्मीद क्यों रखते हैं|

 

सुधार करना है तो पहले इस व्यवसायीकरण का सुधार होना चाहिए| जहां जीने मरने के पैसे तो न लगें| ऐसी व्यवस्था अपने यंहा रही भी है| कानून भी बाल तस्करी को रोकने के लिए बने हैं| बाल मंत्रालय है| विभिन्न विभाग हैं| बहुत संस्थाएं इस क्षेत्र में काम कर रहीं हैं| बहुत सी चाइल्ड हेल्पलाइन हैं| बाल तस्करी आदि के खिलाफ लड़ना आसान नहीं है| क्योंकि बच्चे बहुत आसान टारगेट हैं| NCPCR द्वारा 2006 में बालश्रम कानून में किये गए बदलाव से अब 14 वर्ष से अधिक आयु के बच्चे भी ढाबे, होटलों आदि में काम नहीं कर सकते| इमारतों के निर्माण कार्यों के लिए काम करने वाले मजदूर माता पिता के बच्चे कभी पढ़ नहीं पाते| वो चार महीने कहीं काम करते हैं और छह महीने कहीं| निर्माण स्थल पर ही इनके बच्चों के लिए अस्थायी पाठशालाएं उपलब्ध करवायीं जाएं| बाल भिक्षूओं पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए| कुछ राज्यों में इस पर काम किया गया है| लेकिन पहले पुनर्वास शुरू किया जाये| तो ही बालभिक्षू प्रतिबंधित कानून कारगर हो पायेगा| यह बच्चे खुद चलकर तो पाठशालाओं में नहीं जाने वाले| क्यों न पाठशालों में ऐसे कर्मचारी नियुक्त हों जो स्कूल के आसपास के क्षेत्रों में पक्का करें कि कोई बच्चा ऐसा तो नहीं जो स्कूल नहीं आ पा रहा| छापे मारकर बच्चों को बालपुनर्वास केन्द्रों में भेजा जाता है| लेकिन माफियाओं और अभिभावकों को कुछ नहीं कहा जाता है| चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 आदि बहुत नगरों में लगभग दशक पहले से भी चल रहे हैं| अंतर्राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर भी हैं| फ़ोन मात्र कर देना ही समस्या का हल नही है| जब कोई बालभिक्षू दिखे तो पैसे देकर उसे कोई लाभ नहीं होने वाला है| उस क्षेत्र के पुनर्वास केन्द्रों से संपर्क कर सकते हैं| गैर सरकारी संस्थायों को बता सकते हैं| जितना ज्यादा हो सके बच्चे से बात की जानी चाहिए| यह बच्चे हमें कहीं भी दिख सकते हैं| बस तब हम अपनी आंखें न बंद करें| अभी भी समय ही सवेंदनशील और जागरूक होने का| कम से कम बच्चों का बचपन तो न लूटने दें|

लेखक : अनुराग भारद्वाज

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Posted by on May 29 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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