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एक प्रवासी का अभियानः ‘क्लीन इंदौर’

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न्यूयार्क में रहने वाली एक 17 साल की प्रवासी भारतीय ने भारत में सफाई अभियान चला कर एक आदर्श प्रस्तुत किया है.

कृष्णा कोठारी कई मायनों में खास किशोरी हैं. उन्होंने पिता के शहर इंदौर को साफ और सुंदर बनाने का अभियान चला रखा है. वे इस अभियान के लिए खास अंतराल पर नियमित रूप से भारत आती हैं.

यह सब कैसे शुरू हुआ, इस सवाल पर कृष्णा बताती हैं कि वे जब भी भारत आती थी, बीमार पड़ जाती थी. कई कई दिन बिस्तर से बाहर नहीं निकल पाती थीं.

मन में ये सवाल आया कि आखिर भारत आने पर ही उनके साथ ऐसा क्यों होता है. क्योंकि वे कोरिया और जापान भी जाती रहती हैं, पर वहां वे कभी बीमार नहीं पड़ीं.

कचरा और बदबू

कृष्णा जब 11 साल की थी तब वे भारत ताजमहल देखने आई थीं. वे बताती हैं कि तब ताज बेहद खूबसूरत था, आस पास साफ-सफाई थी, हवा ताजी थी.

दूसरी जो बात उनके जेहन में अब तक बसी है, वह है बाहर निकलते समय गंदगी और बदबू से सामना.

कृष्णा बताती हैं, “बाहर निकलते ही बदबू का एक भभका नाक में घुसता था. यहां-वहां सड़ी-गली सब्जियां, कहीं कोने में मरे हुए कुत्ते, कूड़ों का ढेर पड़ा होता था.”

वे आगे कहती हैं, “पूरी दुनिया से लोग ताजमहल देखने आते हैं, मगर उस खूबसूरत अहसास से रूबरू होने से पहले ही उन्हें गंदगी और बदबू भरी जगहों से गुजरना पड़ता है.”

कृष्णा बताती हैं, “इंदौर में रहने वाले मेरे रिश्तेदार, कजिन, दोस्तों के लिए ये रोजमर्रा की बातें हैं. वे कुछ भी खाकर छिलके, रैपर सड़क पर फेंक देते हैं. उन्हें बुरा नहीं लगता. क्योंकि उनके पिता ने यही किया था, दादा ने भी यही किया था. यह सब उनके सिस्टम में घुल मिल चुका है. मुझे उनकी सोच पर अफसोस होता है.”

कम उम्र आड़े आई

इंदौर की साफ-सफाई से संबंधित प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले उन्हें भरोसा नहीं था कि वे यहां के लोगों के रहन सहन के तरीके में बदलाव ला पाएंगी. कृष्णा ने इसे बड़ी चुनौती माना.

अपने अभियान के दौरान कृष्णा को एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा.

कृष्णा बताती हैं, “अधिकांश अधिकारी, बुजुर्ग, या वयस्क मेरे ‘क्लीन इंदौर’ प्रोजेक्ट को गंभीरता से नहीं लेते थे. मुझसे बात करने की उनके पास एक ही वजह थी, कि मैं न्यूयॉर्क से आई हूं. उन्हें समझाना बहुत कठिन लगा. इसीलिए अपने प्रोजेक्ट के लिए मैंने छात्रों को चुना.”

कृष्णा ने अपने प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए सोशल मीडिया पर भी अभियान चला रखा है. उन्होंने एक फेसबुक पेज बनाया है, ‘क्लीन इंदौर’.

वीडियो प्रस्तुति

“मेयर समारोह में वादा करते हैं कि वे कुछ करेंगे मगर अफसोस कि ऐसा कुछ नहीं होता. इसे ठेठ भारतीय अंदाज़ कह सकते हैं. यहां लोग वादे तो बहुत करते हैं, मगर उन्हें पूरा नहीं करते. यह सबसे गंभीर समस्या है.”

कृष्णा, ‘क्लीन इंदौर’ की संचालक

वे पिछले तीन गर्मियों से प्रोजेक्ट की वीडियो प्रस्तुति देने के लिए नियमित इंदौर आ रही हैं. यह प्रस्तुति वे यहां स्कूलों में छात्रों को देती हैं.

उन्होंने बताया, “अपनी वीडियो प्रस्तुति के जरिए मैं दो बातें बताती हूं. पहली, लोगों को गंदगी के खतरों के बारे में आगाह करती हूं. और, दूसरे देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए क्या किया है, उसकी जानकारी देती हूं.”

उनके पास एक ऐप्लीकेशन भी है जिसमें यह सुविधा है कि जो इस अभियान के मेंबर हैं वे इंदौर की अलग अलग जगहों से रिपोर्ट कर सकते हैं.

कृष्णा बताती हैं, “इससे फायदा यह होता है कि हम ऑनलाइन यह देख सकते हैं कि इंदौर शहर का कौन सा इलाका गंदा है. और कौन साफ है.”

कृष्णा जब अपने प्रोजेक्ट को लेकर स्कूलों में बात करने गईं तो पहले तीन चार स्कूलों में तो उनके प्रोजेक्ट को मजाक समझा गया.

हालांकि अब उनका अभियान इतना लोकप्रिय हो चुका है कि उन्हें ढेर सारे फेसबुक मैसेज मिल रहे हैं. छात्र मैसेज में पूछते हैं कि क्या वे खुद वीडियो तैयार कर सकते हैं. ताकि खुद प्रेजेंटेशन दे सकें.

कृष्णा को गर्व है कि उन्होंने पहल की. क्योंकि अब अपने शहर को साफ रखने के लिए इंदौर के छात्र भी आगे आ रहे हैं.

सरकारी स्कूल के बच्चे ज्यादा उत्साहित

कृष्णा जब अपना प्रोजेक्ट लेकर सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में गईं तो उन्हें अलग-अलग प्रतिक्रिया मिली.

वे बताती हैं, “सरकारी स्कूलों के ज्यादातर बच्चे झुग्गी झोंपड़ियों से आते हैं. वे मेरे अभियान के प्रति ज्यादा उत्साहित हैं. वे सच में कुछ करना चाहते हैं. उनके सवालों के सामने मेरा लैपटॉप भी छोटा पड़ जाता है.”

दूसरी ओर विशाल ऑडिटोरियम, मूवी थियेटर, मूवी प्रोजेक्टर वाले प्राईवेट स्कूलों का रवैया इस मामले में ठंडा रहा.

कोठारी कहती हैं कि प्रोजेक्ट आज इस मुकाम पर पहुंच गया है कि पुरस्कार वितरण समारोह में मेयर आते हैं. एक सरकारी अधिकारी का इस अभियान में शामिल होना खास है.

वे बताती हैं, “प्रोजेक्ट इस मुकाम तक पहुंच गया, जादू-सा लगता है. मगर एक समस्या है. मेयर समारोह में वादा करते हैं कि वे कुछ करेंगे, बदलाव लाएंगे, मगर अफसोस ऐसा कुछ नहीं होता. इसे ठेठ भारतीय अंदाज कह सकते हैं. यहां लोग वादे तो बहुत करते हैं, मगर उसे पूरा नहीं करते. मुझे लगता है यह समस्या सबसे गंभीर समस्या है.”

Source : BBC Hindi

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=2738

Posted by on Aug 27 2013. Filed under आधी आबादी. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

1 Comment for “एक प्रवासी का अभियानः ‘क्लीन इंदौर’”

  1. deependra kanwat

    Ye h sacha bhart nirman….

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