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नेताओं के एजेंडे में नहीं है आम आदमी

 

Tavleen-Singh

 

कई विद्वानों का मानना है कि भारतवासी भारत में रहकर वैसी कामयाबी हासिल नहीं कर सकते, जो विदेशों में पहुंचते ही उनको नसीब हो जाती है। इस बार न्यूयॉर्क में मुझे इस बात की सच्चाई का गहरा एहसास हुआ। जिस दिन यहां पहुंची एक पारसी दोस्त की बेटी की शादी में कानक्टीकट जाना हुआ और रास्ते में पता चला कि गाड़ी का ड्राइवर देसी था।

उसके साथ बातें शुरू हुई, तो पता चला कि वह काम की तलाश में 20 वर्ष पहले आया था न्यूयॉर्क। उस तरक्की की तलाश में जिसकी उम्मीद देश में रहते हुए नहीं थी। न्यूयॉर्क में आने के बाद उसने टैक्सी चलाना शुरू किया और इतने पैसे कमा लिए कि अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में डालकर डॉक्टर और कंप्यूटर इंजीनियर बना सका।

शादी की दावत में पहुंची, तो कई और देशवासी मिले, जिन्होंने अमेरिका में बेइंतिहां कामयाबी हासिल कर रखी है। कुछ ऐसे थे, जिन्होंने कारोबार शुरू करके खूब पैसे कमाए, तो कुछ ने न्यूयॉर्क की बड़ी कंपनियों में नौकरियां करके खूब तरक्की की। बातों-बातों में किसी ने मुझे याद दिलाया कि ऐसी कई अमेरिकी कंपनियां हैं, जिनके सीईओ भारतीय मूल के हैं।

दो अमेरिकी राज्यों के गवर्नर भारतीय मूल के हैं। निक्की हेले साऊथ कैरोलीना की गवर्नर हैं और बॉबी जिंदल लुसियाना के। अमेरिका के अस्पतालों में अक्सर आपको भारतीय मूल के डॉक्टर मिल जाएंगे। यहां के विश्वविद्यालयों में भारतीय मूल के प्रोफेसर दिखेंगे। न्यूयॉर्क पहुंचने के अगले दिन मुझे खबर मिली कि इस वर्ष की मिस अमेरिका भी भारतीय मूल की सुंदरी बनी है। इतनी सांवली हैं आंध्र की नीना दावूलुरी कि अपने भारत महान में उसे कभी मिस इंडिया बनने का मौका ही नहीं मिलता, क्योंकि हम तो हद से ज्यादा गोरे रंग के दीवाने हैं।

स्वतंत्रता के 66 वर्षों बाद भी किसी भारतीय गांवों में अगर कोई गोरा अंग्रेज पहुंचता है, तो गांववाले उसे झुक-झुक कर सलाम करते हैं, मालूम नहीं क्यों। क्या इसलिए कि अंग्रेज-राज की यादें अब भी ताजा हैं? अपने देश में कुछ पुराने लोग ऐसे भी मिलेंगे, जो याद करते हैं, अंग्रेजों को यह कह कर कि उनके जमाने में शासन बड़ा अच्छा हुआ करता था और भ्रष्टाचार बहुत कम। मुझे तकलीफ होती है ऐसी बातें सुनकर, क्योंकि मुझे इन चीजों हमारी गुलामी की मानसिकता दिखाई देती है। मुझे भारत के पश्चिमीकरण से भी सख्त तकलीफ है, इसलिए कि मैं मानती हूं कि हमने पश्चिमी देशों से ज्यादातर गलत चीजें सीखी हैं।

हमारी जबान बदल गई है, लिबास धीरे-धीरे बदलता जा रहा है, सभ्यता बदल रही है और हर भारतीय शहर में दिखते हैं आज अमेरिकी किस्म के मॉल। इस तरह कि पश्चिमीकरण से मुझे कम ऐतराज होता, अगर हमने यह भी सीखा होता पश्चिम से कि किस तरह आम आदमी को ऐसे अवसर दिए जाएं, जिनसे वह खुद अपने जीवन में परिवर्तन लाने के काबिल बन सके।

मिसाल के तौर पर न्यूयॉर्क शहर में चमकते शीशे के मॉल अगर हैं, तो दुनिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालय और संग्रहालय भी हैं। ज्ञान, इतिहास और शिक्षा के इन केंद्रों से सबसे ज्यादा लाभ होता है उन लोगों को, जो गरीब होते हैं। इसलिए समझ में यह नहीं आता कि आम आदमी का मंत्र हर समय जपने वाले हमारे राजनेता क्यों नहीं अपने देश में इन चीजों पर ध्यान देते हैं।

न्यूयॉर्क में मैं यहां के आम लोगों की तरह हर जगह या तो पैदल जाती हूं या टैक्सी, बस या ट्रेन से। यह सेवाएं इतनी बेहतरीन हैं कि इस शहर के अमीर से अमीर लोग भी अपनी निजी गाड़ी रखना पसंद नहीं करते। सुबह जब घूमने निकलती हूं यहां के सुंदर, विशाल सेंट्रल पार्क में, तो दुख होता है इस बात को याद करके कि इस तरह की सार्वजनिक सुविधाएं कितनी कम हैं हमारे शहरों में आम आदमी के लिए। और हमारे राजनेता हैं कि उसको हर तरह की खैरात बांटने में लगे रहते हैं। उसे कभी सस्ता अनाज मिल जाता है, कभी लैपटॉप, कभी 100 दिन वार्षिक रोजगार और कभी भूमि का अधिकार।

ऐसा करके आधी शताब्दी गुजर गई है और स्वतंत्र भारत अब भी सबसे गरीब, बेहाल देशों में गिना जाता है। यहां के नागरिक विदेशों में पलायन करते रहे हैं, उस संपन्न जीवन की खोज में, जो आज भी भारत के आम आदमी के लिए सपना है।

 

तवलीन सिंह

 

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Posted by on Oct 5 2013. Filed under मेरी बात, सच. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

2 Comments for “नेताओं के एजेंडे में नहीं है आम आदमी”

  1. Rajiv Palta

    PATA NAHI YEH BAAT KAHA TAK HAI KI HUM GULAM THIK THE K AZAAD . EK BAAT KAHU YAHA TAK MUJHE LAGTA HAI AGLE 20 SALO ME INDIA MAI KUCH NAHI RAHEGA. MERA BAS CHALE TO MAI SABHI POLITICAL LEADERS KO BOMB SE UDA DU.AGAR MOKA MILA TO MAI JARUR KARUNGA.

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