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बाबा मार्क्स के आंसू

उस दिन कब्रिस्तान के पास से गुजर रहा था तो लगा कोई कब्र में करवटें बदल रहा है ,कराह रहा है फिर रोने की सी आवाज सुनाई दी । तब मुझसे रहा नहीं गया मैं कब्र के पास पहुंचा और पूछा – अरे भाई कौन हो ,तुम्हें कब्र में भी  चैन नहीं । क्या नाम है तुम्हारा ? जब कुछ देर कोई आवाज नहीं आई तो मैंने फिर पूछा – अरे बताओं कौन हो क्या नाम है तुम्हारा ? शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं ? तब अंदर से जवाब आया –मेरा नाम है मार्क्स।

मैंने पूछा – कौन ,ग्रुचो मार्क्स।Karl Marx

मेरी बात सुनते ही अंदर से झल्लाती हुई आवाज आई – तुम दुनियावाले बहुत एहसान फरामोश  हो । मैंने सारी जिंदगी लाइब्ररियों में माथापच्ची करके  खपा दी और कम्युनिज्म का ऐसा दर्शन दिया जो इस दुनिया क्रांति लेकर आया.लेकिन तुम एहसान फरामोश लोग मुझे भूल गए और लेकिन  वो  हंसोड,नाटक नौंटकी करनेवाला ग्रुचो मार्क्स तुम्हें याद है।

मेरे तो अचरज का पारावार ही नहीं रहा। और मेरे मुंह से निकल गया –बाबा कार्ल मार्क्स आप । आपको कौन नहीं जानता। कभी आप मेरे आदर्श हुआ करते थे। मैं आपके व्यक्तित्व से भी बहुत प्रभावित था खासकर आपकी घनी  सफेद दाढी से  लेकिन  जब दुनियाभर में आपके कामरेड़ो की क्रूरतापूर्ण और मूर्खतापूर्ण  हरकतें देखी तो दिल करने लगा कि वह दाढी नोंच डालूं।  खैर यह तो पुरानी बात हो गई । बताइए आपकी आंखों  में आंसू क्यों हैं ? आपको किस बात का दुख है।

मार्क्स बहुत लंबी सांस लेकर बोले , जिनसे तुम दुखी हो उनसे मैं भी दुखी हूं।यानी कम्युनिस्ट पार्टियों और कामरेड़ो से । तंग आ गया हूं इनकी बेजां और  बेहूदी हरकतों से ।

तब मैंने जानना चाहा कि अचानक ऐसा क्या हो गया जो वे कामरेड़ो से इस कदर दुखी हैं।

गुस्से में तमतमाए हुए  बाबा मार्क्स बोले – अब तो हद हो गई । भारत की मार्क्सवादी पार्टी को ही लो । मैं जिंदगी भर  कहता रहा कि धर्म जनता की अफीम है इससे जनता को दूर रखो  और माकपा अब पार्टी के सम्मेलनों में जीसस  क्राइस्ट की तस्वीर लगाने लगे हैं। मार्क्सवादी नेता कहते हैं – जीसस क्राइस्ट ,मोह्म्मद पैगंबर और भगवान बुद्ध क्रांतिकारी थे । अरे भाई, अगर ये सब क्रांतिकारी थे तो उनके धर्म यानी पार्टीयां क्रांतिकारी पार्टी हुई। जब सैंकड़ों सालों से ये क्रांतिकारी पार्टियां मौजूद हैं तो क्रांति करने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की जरूरत ही क्या है। छोड़ दो पैगंबरो और मसीहाओं के  भरोसे दुनिया को।  इसलिए मैं कहता हूं रास्ते से भटक गई है कम्युनिस्ट पार्टियां।

मैंने उनका गुस्सा शांत करने के लिए कहा – बाबा मार्क्स ,ऐसा कुछ नहीं । डैमोक्रेटीक सेटअप में काम कर रहे हैं बेचारे । वोटरों को लुभाने के लिए ये दंद फंद तो करने ही पड़ते हैं। लोकतंत्र में तो वोटर ही माईबाप होता है । वही तो वोटों से मतपेटियां भर देता है।

इस पर बाबा मार्क्स और भी भड़क गए और बोले – यही तो मैं कहता हूं एक बार सिद्धांतों से भटकाव शुरू हुआ तो वह कभी खत्म नहीं होता। पहले भारत के कामरेड क्रांति का रास्ता छोडकर संसद के सूअरबाड़े में जा बैठे। वहां  लंबे लंबे भाषण झाड़ रहे हैं। अब चर्च में जाएंगे और भजन करेंगे – तेरा जीसस करेंगे बेड़ा पार उदासी मन काहे को डरे। फिर कालीमाता को क्रांतिमाता कह उसकी आरती उतारंगे। दुर्गासप्तशती गाते हुए दुर्गामाता  से विनति करेंगे –  हम पर क्रपा करो और पूंजीवाद रूपी महिषासुर का वध करो। दास कैपिटल के बजाय बाइबिल का  अखंड पाठ करेंगे। अब इसतरह से होगी क्रांति ? धन्य हो।यह अगर क्रांति है तो प्रतिक्रांति किसे कहेंगे।

यह सुनकर मुझे लगा कि बाबा मार्क्स की बातों में दम है। लेकिन मैं चाहता था कि वे ज्यादा दुखी न हो इसलिए उन्हें थोड़ा ढाढस बंधाने के लिए मैंने कहा- आपकी ये आशंकाएं निराधार हैं – मार्क्सवादियों का क्रांति के बारे में दिमाग बहुत साफ  है। बहुत ज्यादा पढ़े लिखे हैं हमारे देश के कामरेड । कभी कभी तो लगता है कि किताबों की दुनिया में रहते हैं  वही जीते मरते हैं। किताबें ही ओढ़ते बिछाते हैं। किताबों की दुनिया से कभी बाहर ही नहीं आना चाहते । इसलिए उनकी भाषा  लोगों समझ में नहीं आती। इसलिए  अब धार्मिक  मायथोलाजी का सहारा ले रहे हैं। शायद उसके जरीये कम्युनिज्म लोगों को समझ में आ जाए। आपने  केरल माकपा द्वारा लगाई गई वो पेटिंग देखी कि नहीं जिसका शीर्षक था – लास्ट सपर आफ कैपिटलिज्म : सीपीएम इज ओनली होप  – क्या खूब पेंटिग थी। एकदम झकास आइडिया। पूंजीवाद पर हल्ला बोल कि अब उसका अंत नजदीक है। विश्व पूंजीवाद के रहनुमा अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा भारत की पूंजीवादी पार्टीयों  कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के साथ आखिरी महाभोज कर रहे है । इसके बाद  तो उन्हें सूली चढ़ना ही है। पूंजीवाद आखिर कबतक खैर मनाएगा। पूंजीवाद के खत्म होने पर लोगों के सामने एकमात्र होप एकमात्र उम्मीद है सीपीएम। बडा बवाल हो रहा है इस पेंटिंग पर प्रेस में  । चर्चवाले अलग से परेशान हैं कामरेड हमारी मायथोलाजी पर कब्जा जमा रहे हैं। आपको इस कमाल की  पेंटिंग की दाद देनी पड़ेगी।

मुझे लगा था मेरी बात सुनकर मार्क्स खुशी से फूले नहीं समाएंगे। उनका दुख थोड़ा कम होगा लेकिन हुआ उल्टा ही। वो पहले की तरह  गुस्सा उगलते हुए बोले , कम्युनिस्ट होने की पहली शर्त यह है कि उसे आब्जेक्टीव तरीके से सोचना चाहिए सब्जेक्टीव तरीके से नहीं।

ये पेंटिंग तो सफेद झूठ है यह बात मन ही मन में हर कम्युनिस्ट जानता है। आज की दुनियां को देखकर तो लगता है कि मत्यु के पहले का महाभोज पूंजीवादी नहीं कम्युनिस्ट खा रहे हैं।सोवियत संघ,पूर्वी यूरोप ,बाल्कान में साम्यवादी साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया। दूसरी सबसे बड़ा कम्युनिस्ट देश चीन पूंजीवादी हो गया है बाजारू अर्थव्यवस्था के शरण में चला गया है। वहां बोर्ड कम्युनिज्म का लगा रखा है और  माल पूंजीवाद का बिक रहा है। यह तो साम्यवादी विचारधारा की जड़ों पर कुठाराघात  हुआ। अमेरिका को धूल चटा देनेवाला हो ची मिन्ह का  वियतनाम अब अमेरिका के सामने मदद के लिए कटोरा फैला रहा है। इसके बाद भी यदि कम्युनिस्टों को लगता है कि कम्युनिज्म नहीं पूंजीवाद खत्म हो रहा है तो वे मुंगेरीलाल के हसीन सपने देख रहे हैं। तुमने सोचा है कितने बुरे दिन आ गए हैं कि जिन्हें मैंने क्रांति का हिरावल दस्ता मना करता  था वे मजदूर तो कम्युनिज्म के नाम से ही दूर भाग रहे हैं। क्यों न भागें जो उन्हें कम्युनिज्म देने का वादा करता था उससे कहीं ज्यादा तो  शोषक पूंजीवाद ने दे दिया। अब तो यह भी अपील नहीं की जा सकती कि दुनिया के मजदूरों एक हो जाओं तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। क्योंकि पश्चिमी देशों में  कई पूंजीवादी व्यवस्थाओं ने उनका शोषण करने के बावजूद भी मालामाल कर दिया । वहां मजदूर पहले की तरह कड़का नहीं रहा। उसके पास खोने के लिए बहुत कुछ है फ्लैट है ,गाडी है ,टीवी ,फ्रीज है ,एसी है ,मोटी बीमा पालिसियां है। जब मनी हो और हनी हो तो  फिर भला वो क्रांति ,भ्रांति के चक्कर में क्यों पड़ेगा। वह तो पूंजीवाद के समृद्ध  नरक में ही खुश है।

यह सब कहते हुए बाबा मार्क्स का गला भर आया था। फिर वे भारत के कम्युनिस्टों की तरफ मुड़े बोले – उनके बारे में कुछ भी कहना बेकार है। लेकिन क्या करूं बात निकलती  है तो कहे बिना भी रहा नहीं जाता। पश्चिम बंगाल और केरल में शर्मनाक हार के बाद तो  भारत में कम्युनिज्म ही मत्युशैय्या पर पड़ा है। आखिरी सांसे गिन रहा है। फिर कुछ व्यंग्य करते हुए कहने लगे असल में उस कामरेड पेंटर को पेंटिंग कुछ ऐसी बनाना चाहिए थी कि बिग ब्रदर माकपा नेता प्रकाश कारत अपने वाममोर्चे की अन्य पार्टियों के छुटभैय्ये नेताओं के साथ आखिरी महाभोज ,लास्ट सपर खाने में मशगूल हैं क्योंकि  जनता अब इन्हें नहीं बख्शनेवाली है। इतनी नाकारा है कि प्रकाश कारत एंड कंपनी की वो तो गनीमत है कि भारत में लोकतंत्र है इसलिए जनता ने पशिचम बंगाल में  उन्हें चुनाव के जरिये उखाड़ फेका नहीं तो जनता को प्रतिक्रांति करनी पड़ती।

फिर लंबी सांस लेते हुए कहा, क्या लिखा है पेंटिग पर सीपीएम इज ओनली होप  मुझे लगता है उस पेंटर को शीर्षक देना चाहिए था –कम्यनिज्मस् लास्ट सपर -सीपीएम इज होपलैस । वैसे यह केवल माकपा की ही नहीं सारे कम्युनिस्टों की हकीकत है।

यह कहते हुए बाबा मार्क्स की आंखें नम हो गईं । बोले ,बस अब और मत छेडो मेरी दुखती रग को । इतना कहते हुए वे  फिर अपनी कब्र में सो गए कराहते हुए करवटें बदलते हुए।।

– सतीश पेडणेकर

Source : http://azadi.me/communism-marx-cpm

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=1887

Posted by on Apr 11 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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