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कांग्रेस और मुसलमान

कांग्रेस और मुसलमान

 

पिछले लेख( link) में मैं लिख चुका हूँ कि 1977 के चुनावों में पहली बार (और अभी तक आखिरी बार) ऐसा हुआ था जब मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट नहीं दिया था। वास्तव में देश का विभाजन होते समय पाकिस्तान केवल मुसलमानों के लिए बनाया गया था और उनका एक मात्र तर्क यही था कि वे हिन्दुओं के साथ नहीं रह सकते, इसलिए उन्हें अलग देश दिया जाय। कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने काफी विरोध के बाद भी इस माँग को यह सोचकर मान लिया कि यदि देश का एक हिस्सा दे देने के बाद हिन्दू-मुसलमानों का सदियों पुराना संघर्ष समाप्त हो जाये, तो ठीक ही रहेगा।
उस समय न्याय का तकाजा था कि देश के सभी मुसलमानों से कह दिया जाता कि भाइयो, अब तुम्हें अपने सपनों का देश मिल गया, इसलिए यहाँ से जाओ। इसी तरह पाकिस्तान में आने वाले भागों से मुसलमानों के अलावा अन्य सभी धर्मों के अनुयायियों को भारत में आने के लिए कह दिया जाना चाहिए था। वास्तव में मुहम्मद अली जिन्ना इसके लिए बिल्कुल तैयार थे। परन्तु हमारे मूर्खात्मा गाँधी तो यह सिद्ध करने पर तुले हुए थे कि मुसलमानों के साथ-साथ सभी धर्मों के लोग इस देश में शान्ति से रह सकते हैं। इसलिए उन्होंने आबादी की अदला-बदली के विचार को सिरे से ही खारिज कर दिया।
इसमें पोंगा पंडित नेहरू की एक धूर्तता भी थी। वे यह जानते थे कि देश की आजादी और विभाजन में उनकी जो भूमिका रही है उससे हिन्दुओं का अधिकांश भाग उन्हें घृणा की हद तक नापसन्द करता है। इसलिए वे मुस्लिमों के बड़े भाग को अपना वोट बैंक बनाने के लिए देश में ही रोके रखना चाहते थे। नेहरू की यह चाल पूरी तरह सफल रही और मुसलमान बिना किसी अपवाद के हर बार संसदीय चुनावों में कांग्रेस को वोट देते रहे। उन वोटों के साथ हिन्दुओं के थोड़े से प्रतिबद्ध वोट मिलाकर कांग्रेस को काम चलाऊ बहुमत हर बार मिलता रहा। इनमें उन पूर्वी पाकिस्तानी या बंगलादेशी घुसपैठियों के वोट भी शामिल हो जाते थे, जो कांग्रेसी नेताओं ने अपने स्वार्थ के कारण असम, बिहार और देश के अन्य भागों में भारी संख्या में बसा रखे हैं।
लेकिन 1977 में यह प्रवृत्ति उलट गयी और उन चुनावों में मुसलमानों ने खुलकर कांग्रेस का विरोध किया और जनता पार्टी के पक्ष में अपना वोट डाला, जिसका परिणाम यह हुआ कि विंध्याचल के उत्तर में पड़ने वाले समूचे भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया। इस घटनाक्रम का विश्लेषण करते समय कई लोग यह कारण बताते हैं कि आपात्काल के विरोध में मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट नहीं दिया था। यह कारण पूरी तरह गलत है, क्योंकि मुसलमानों का लोकतंत्र में कोई विश्वास न तो कभी था और न आज है। वास्तव में वे खलीफाशाही या तानाशाही शासन में ही संतुष्ट रहते हैं। लोकतंत्र को तो वे एक मजबूरी के रूप में स्वीकार कर लेते हैं।
इतिहास में इसके अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। पहली बार तुर्की में कमाल पाशा ने लोकतांत्रिक पद्धति की स्थापना की थी और वहाँ के खलीफाशाही को समाप्त कर दिया था। इसके विरोध में पूरी दुनिया के मुसलमानों ने आन्दोलन किया था, जिनमें अविभाजित भारत के मुसलमान भी शामिल थे। यह आश्चर्य की बात है कि लोकतंत्र के समर्थक होते हुए भी हमारे मूर्खात्मा गाँधी और उनकी कांग्रेस पार्टी ने मुसलमानों के इस घोर साम्प्रदायिक आन्दोलन का खुलकर समर्थन किया था। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में कई बार सैनिक और तानाशाही शासन लगाया जा चुका है और यह आश्चर्य की बात नहीं है कि वैसे शासन में ही वहाँ की जनता सबसे अधिक खुश रहती है।
इसलिए यह कहना कि लोकतंत्र के प्रति प्यार के कार��� 1977 में मुसलमानों ने कांग्रेस के विरोध में मत दिया था, स्वयं को धोखा देना है। वास्तव में इसका असली कारण था- नसबंदी। यह संजय गाँधी के चार या पाँच सूत्री कार्यक्रम का अंग था और जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक भी था। इसके अन्तर्गत लाखों-करोड़ों लोगों की जबरन नसबंदी की गयी थी। हिन्दू जनता ने इस अत्याचार को सबसे अधिक झेला था। कुछ मात्रा में मुसलमानों की भी नसबंदी हुई। लेकिन दिल्ली के जामा मस्जिद के आस-पास के इलाके में जहाँ मुसलमानों की आबादी लगभग 90 प्रतिशत है, इस कार्य का हिंसक विरोध हुआ। एक बार पुलिस को गोली भी चलानी पड़ी, जिसमें कई मुसलमान मारे गये। तभी मुसलमानों में कांग्रेस के प्रति क्रोध उत्पन्न हो गया।
यह मुसलमानों की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जो कोई भी उनकी संख्या घटाने की बात करता है उसी को अपना दुश्मन मान लेते हैं। इस बात के इतिहास में एक-दो नहीं अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। आर्यसमाज के स्वामी श्रद्धानन्द ने हजारों मुसलमानों का शुद्धीकरण करके वापस हिन्दू धर्म में शामिल किया था। इस कारण से मुसलमानों ने उनको अपना दुश्मन मान लिया और एक धर्मांध मुसलमान अब्दुल रशीद ने उनकी हत्या कर डाली। आर्य समाज के कई अन्य प्रचारकों को भी इसी प्रकार अपने प्राण खोने पड़े थे। इसी मानसिकता के कारण 1977 में मुसलमानों ने कांग्रेस के विरोध में वोट डाले थे, क्योंकि कांग्रेस ने नसबंदी के द्वारा उनकी आबादी पर रोक लगाने की कोशिश की थी।
यह उल्लेखनीय है कि अपनी आबादी बढ़ाना मुसलमानों का धार्मिक कर्तव्य बताया गया है। चाहे वह जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन के द्वारा हो या अनेक बच्चे पैदा करने के द्वारा हो। यह दूसरा तरीका अधिक सुरक्षित माना जाता है। कुरान में लिखा भी है कि ‘औरतें तुम्हारी खेती हैं’, जिसका सीधा सा अर्थ यही है कि ‘उनमें बीज डालकर खूब बच्चे पैदा करो।’ इसलिए मुसलमान किसी भी देश, धर्म, जाति, रंग-रूप की महिलाओं के साथ निकाह करने को तैयार रहते हैं, बशर्ते वह बच्चे पैदा कर सकती हो। पारिवारिक संस्कारों का उनके लिए कोई महत्व नहीं है। इसके विपरीत वे कभी यह पसन्द नहीं करते कि कोई मुस्लिम महिला किसी अन्य धर्म के पुरुष के साथ विवाह करे। ऐसा करने की अनुमति केवल तभी मिलती है जब वह पुरुष मुसलमान हो जाये। अगर ऐसा नहीं होता, तो वे उस व्यक्ति के खून के प्यासे हो जाते हैं।
1980 के चुनावों में मुसलमान फिर कांग्रेस की ओर लौट आये और आज तक बने हुए हैं। इसका कारण यह है कि 1977 के चुनावों में मात खाने के बाद कांग्रेस ने फिर कभी नसबंदी और जनसंख्या नियंत्रण का नाम नहीं लिया। वास्तव में मुसलमान हर उस पार्टी को वोट दे सकते हैं जो उनके स्वार्थों को संतुष्ट करती हो। उत्तर प्रदेश में वे आज तक मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को इसलिए वोट देते हैं कि उन्होंने 1990 में राम मन्दिर आन्दोलन में निहत्थे रामभक्तों पर गोलियाँ बरसाई थीं।

 

लेखक : विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

link : http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/Khattha-Meetha

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Posted by on Jul 28 2012. Filed under इतिहास, मेरी बात, सच, हिन्दुत्व. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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