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तो कांग्रेस हिंदी विरोधी?

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यह दुर्भाग्यपूर्ण लेकिन हालिया घटनाओं से निकला हेडिंग है। बात भाजपा नेता राजनाथ सिंह की हिंदी पैरवी को मनीष तिवारी द्वारा मध्यकालीन बताने से ही अकेले नहीं निकली है। हिंदी आंदोलन के सुधी और वरिष्ठ पत्रकार डा. वेदप्रताप वैदिक ने यह जानकारी दे कर अपने को चौंकाया है कि हिंदी के लिए धरना दे रहे श्यामरूद्र पाठक को दिल्ली की तिहाड़ जेल में डाल  दिया गया है। पाठक हिंदी के जुनूनी सेनानी हैं। वे कोई 260 दिनों से दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय, सोनिया गांधी के 10, जनपथ के आसपास धरना दे रहे थे। वे वहां अकेले दिन भर बैठे रहते थे और सोनिया गांधी या राहुल गांधी कभी गुजरते थे तो खड़े हो कर हिंदी के लिए नारे लगाते थे। उन्हें पुलिस पकड़ तुगलक रोड थाने में दिन भर बैठाए रखती थी। यह सिलसिला चल रहा था। फिर 20-25 दिन पहले पाठक ने अनिश्चित अनशन शुरू किया। कांग्रेस और पुलिस को समझ नहीं आया तो उन्हें उठा कर तिहाड़ जेल में बंद कर दिया गया। और हम हिंदी वालों की यह आज की शर्मनाक हकीकत है कि किसी अखबार, एजेंसी ने श्यामरूद्र पाठक की गिरफ्तारी की खबर नहीं दी। शनिवार को जब डा. वैदिक ने अपने को बताया तो अपन ने नया इंडिया में खबर छापी। लेकिन कुल मिला कर इससे मालूम हुआ है कि हम हिंदी के लोग सोए हुए हैं और हम मुर्दा हिंदीभाषियों के चलते हिंदी ने राजनैतिक ताकत गंवा दी है। तभी अंग्रेजी के टाइम्स नाउ या हेडलाइन टुडे जैसे 2-3 टीवी चैनल या टाइम्स आफ इंडिया जैसे अखबारों में यह हिम्मत हो गई है, वे ऐसे भेडिए हो गए हैं जो शोर करके यह बहस चलवा देते हैं कि हिंदी की बात करके राजनाथ सिंह ने कैसी सत्यानाशी बात की है और मनीष तिवारी व कांग्रेस मुख्यालय भी इन भेडियों के सुर में यह हल्ला बोल राजनैतिक अभियान चलाने की हिम्मत करते हैं कि हिंदी वाले मध्यकाल में जी रहे हैं।

कितनी शर्मनाक बात है!

संदेह नहीं है कि मनमोहन सिंह के दस साल के राज में हिंदी और भारतीय भाषाओं का राजकाज में आग्रह कमजोर ही नहीं खत्म हुआ है। मनमोहन सिंह ने अंग्रेजी को बढ़ावा दिया और उसे थोपना चाहा। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस नेता बात आम आदमी की करते हैं और आम आदमी की जुबान को मध्यकाल की बताते हैं। गरीब को रोटी के टुकड़े डालते हैं और उसकी भाषा की गरिमा के साथ खेलते हैं। कोई कांग्रेस से पूछे कि 120 करोड़ लोगों की आबादी में से जिन 85 करोड़ों को रोटी देने की वह जो बात कर रही है क्या वे अंग्रेजी बोलने वाले हैं? क्या इनके पिछड़ेपन,  इनके दमन,  इनके शोषण,  इनकी भूखमरी की वजह अंग्रेजी बोलने वाले काले अंग्रेजों का कालापन नहीं है? अंग्रेजीदां काले लोगों का भ्रष्टाचार और लूट का तंत्र जिम्मेवार नहीं है?  मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी अंग्रेजी के सौ शब्दों की समझ पर एसएमएस करने वाली नौजवान पीढ़ी को शायद अंग्रेजीदां मान बैठी है। ये सोचते होंगे कि यह पीढ़ी अंग्रेजी में अवसर देखती है। वह अंग्रेजी पढ़ना चाहती है। वह राजनाथ सिंह के हिंदी के समर्थन को और अंग्रेजी के विरोध को दकियानूसी और मध्यकाल की सोच मानती है। यदि इस चश्मे से राहुल गांधी नई पीढ़ी या कलावती की झोपड़ी को देख रहे हैं तो फिर वे यह उम्मीद छोड़ दें कि 65 या 85 करोड़ आम आदमी को खाद्य सुरक्षा के नाम पर रोटी के टुकड़े फेंक कर वे वोट बंटोर लेंगे। यदि भूखा पेट भारत की हकीकत है तो हिंदी और भारतीय भाषा में इन भूखे पेटों का जीना भी हकीकत है। उस गरीब ने देखा है कि डा. मनमोहन सिंह और उनके कैबिनेट ने यूपीएससी की परीक्षाओं में वापिस अंग्रेजी को अनिवार्य बनवाने का आदेश निकाला था। गनीमत जो करुणानिधि और शिवराज सिंह ने विरोध पत्र लिखकर भारतीय भाषाओं के साथ इस अन्याय को रुकवाया।

ध्यान रहे जिस श्याम रूद्र पाठक को तिहाड़ जेल में डाला गया है वह आम आदमी के लिए अदालत में हिंदी और भारतीय भाषाओं की पैरवी के लिए धरने पर था। उसने संविधान के अनुच्छेद 348 में संशोधन चाहते हुए सर्वोच्च न्यायालय व राज्यों के उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओं को जगह देने की मांग की हुई है। उन्होंने एक ज्ञापन लिखा था, जिसे गंभीरता से लेते हुए कांग्रेस नेता ऑस्कर फर्नांडीज ने तत्कालीन कानून मंत्री सलमान खुर्शीद को उसे भेजा भी था। लेकिन अब खुर्शीद की जगह कपिल सिब्बल आ गए हैं और नतीजा ढाक के तीन पात वाला है। पाठक के ज्ञापन पर कार्रवाई करने की बजाय कपिल सिब्बल या कांग्रेस में न जाने किसने पाठक को ही गिरफ्तार करके तिहाड़ जेल में डलवा दिया है।

 

अच्छी बात है जो डा. वैदिक ने पाठक के मसले पर मुलायम सिंह यादव,  भाजपा नेताओं और रामदेव आदि उन तमाम नेताओं में यह माहौल बनाना शुरू किया है कि ये कांग्रेस के हिंदी विरोधी चेहरे को चुनाव में मुद्दा बनाएं। डा. वैदिक का मानना है कि दो-तीन अंग्रेजी चैनलों के सुर में कांग्रेस के प्रवक्ता और नेता यदि हिंदी के विरोध में पार्टी को ला खड़ा कर रहे हैं तो आगामी चुनाव में कांग्रेस को मजा चखाया जाए। हिंदी के वोट चाहेंगे और बात अंग्रेजी की करेंगे, ऐसा नहीं होने देने का डा. वैदिक ने एक इरादा बनाया है। अपन पाठक और डा. वैदिक के हिंदी आंदोलन के समर्थक हैं। और अपना राजनाथ सिंह को भी समर्थन है। जिन्होंने सचमुच अंग्रेजी को भारत की सभ्यता और संस्कृति के लिए नुकसानदायी बता कर अभिनंदनीय काम किया है। आखिर सवाल राजनीति का नहीं बल्कि अपनी मातृभाषा का है, अपनी जुबान का है।

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Posted by on Jul 27 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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