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कांग्रेस की खीझ या फिर मोदी का तिलिस्म

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आजकल हर जगह यही चर्चा है कि क्या नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे? उनके आलोचक भी सवाल कर रहे हैं और प्रशंसक भी। वह बनेंगे, इसके लिए लोगों के अपने तर्क हैं और नहीं बनेंगे, इसके लिए भी लोगों के पास कई तर्क हैं। दोनों तरह के लोगों को अपनी बात पर पूरा विश्वास है। बीजेपी का आत्म-विश्वास आसमान पर है। उसके तेवर बदल गए हैं। वह मान बैठी है कि अगली सरकार उसी की होगी। वहीं कांग्रेस थोड़ी भ्रमित दिख रही है। इसलिए कांग्रेसी थोड़े झुंझलाते भी नजर आते हैं। यह खीझ कभी वे मीडिया पर निकालते हैं, तो कभी किसी और पर। पिछले दिनों वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा गोल्डमैन सैश बैंक पर फट पड़े। उन्होंने तो चेतावनी तक दे डाली कि वह भारत के अंदरूनी मामले से दूर ही रहे। बैंक ने बस इतना कहा था कि भारत में बदलाव का माहौल दिख रहा है और इस बदलाव के लिए उसने मोदी की ओर इशारा किया था। इसी के साथ रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स, यानी एसऐंडपी ने भी कहा कि लोकसभा चुनावों के बाद अगर आर्थिक हालात नहीं सुधरे, तो वह रेटिंग कम कर सकती है।

इस बीच चार राज्यों के चुनावों पर ओपिनियन पोल हुए। इन सब में कांग्रेस की हालत पतली बताई गई। कांग्रेस ने चुनाव आयोग को कहा कि वह ओपिनियन पोल के पक्ष में नहीं है। बीजेपी को फौरन एक मुद्दा मिल गया। वही बीजेपी, जिसने साल 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में सर्वदलीय बैठक में ओपिनियन पोल पर बैन लगाने पर सहमति जताई थी और जो चुनाव सुधार के बहाने अध्यादेश लाना चाहती थी। ओपिनियन पोल में बढ़त देखते ही उसने चुटकी ली कि पोल पर बैन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला होगा। ऐसे मौके पर जयराम रमेश कहां पीछे रहते हैं? वह कह बैठे, अगर कांग्रेस चुनाव हार जाती है, तो भी राहुल गांधी का भविष्य है, लेकिन बीजेपी हारी, तो मोदी का कोई भविष्य नहीं है। इसका यही अर्थ लगाया गया कि कांग्रेस को हार का अंदेशा है।

काग्रेस को दो चीजें परेशान कर रही हैं। एक, मोदी की आक्रामकता और उसे लेकर एक खास तबके में उत्साह। दूसरी, राहुल गांधी का मोदी को बराबर जवाब न दे पाना। नरेंद्र मोदी के रणनीतिकारों का कहना है कि मोदी के लिए यह चुनाव करो या मरो की तरह है। वह जानते हैं कि अगर वह हारे, तो उनके लिए आगे का रास्ता बंद है। पार्टी और संघ परिवार में उनके दुश्मनों की कमी नहीं है। मोदी के रणनीतिकारों को लगता है कि यूपी और बिहार में अगर वह आधी से ज्यादा सीटें ले आएं, तो उनके लिए दिल्ली दूर नहीं है। इसी के मद्देनजर मोदी ने पहले कानपुर, फिर बहराइच में रैली की और कांग्रेस व समाजवादी पार्टी पर जमकर बरसे।

नरेंद्र मोदी ने पटना में बड़ी रैली की और ब्लास्ट में मृत लोगों के परिवारों से खास तौर पर मिलने के लिए वह बाद में गुजरात से बिहार गए। बीजेपी ने अस्थि-कलश यात्रा निकाली और छत्तीसगढ़ में भी नीतीश कुमार पर वार करने से मोदी नहीं चूके। नीतीश पर इतना तीखा हमला पिछले कई साल में किसी ने नहीं किया था। बिहार बीजेपी गदगद है। उसे लगता है कि मोदी की वजह से बीजेपी की हवा बिहार में बन रही है। यह कथित हवा सीटों में बदलेगी या नहीं, यह कहना मुश्किल है। रैली कहीं भी हो, राहुल गांधी को घसीटने का कोई भी मौका नरेंद्र मोदी नहीं छोड़ते। वह राहुल को ‘शहजादा’ कहकर उनका मजाक उड़ा रहे हैं और कहीं न कहीं यह संदेश भी दे रहे हैं कि राहुल उनके सामने काफी कमजोर हैं।

कांग्रेस ने पहले सोचा कि नरेंद्र मोदी को एक क्षेत्रीय नेता साबित किया जाए। इसलिए मोदी को जवाब देने के लिए उसने गुजरात के नेताओं को उतारा। बात नहीं बनी, तो फिर रणनीति में बदलाव किया। कांग्रेस को मानना पड़ा कि गुजरात के उसके नेताओं से मोदी संभलने वाले नहीं हैं, लिहाजा बड़े नेता उतरने लगे। पी चिदंबरम उतरे और कपिल सिब्बल भी। लेकिन मोदी की आक्रामकता बढ़ती गई। मोदी ने बहराइच में कहा कि इस बार बीजेपी की सरकार बनी, तो देश की हालत खराब करने वालों का ठिकाना कहां होगा, यह उनको पता है। इशारा साफ है।

नरेंद्र मोदी को जवाब देने के लिए कांग्रेस को पुख्ता रणनीति बनानी थी। लेकिन वह रणनीति जमीन पर फिलहाल दिख नहीं रही है। ऐसे में, सवाल राहुल पर आता है। राहुल ने भावुकता का सहारा लिया। एक जगह खाद्य सुरक्षा बिल पर मां के आंसुओं का जिक्र, तो दूसरी जगह, दादी की हत्या की कहानी का। राहुल की दिक्कत यह है कि वह चाहकर भी मोदी जैसा तिलिस्म पैदा नहीं कर पा रहे हैं, जबकि उनके पास कहने को काफी कुछ है। मनमोहन सिंह की सरकार ने पिछले नौ साल में कुछ बुनियादी मुद्दों पर ठोस पहल की है। सूचना का अधिकार हो या फिर सबको शिक्षा देने का कानून बनाना हो। भूख से निपटने के लिए खाद्य सुरक्षा बिल लाना हो या फिर गांव-देहात में जमीन का अधिकार। इसी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों को मनरेगा के बहाने रोजगार देने का काम किया, जिसकी बांह पकड़ कर आंध्र प्रदेश में वाई एस रेड्डी भारी मतों से दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे।

भूखे पेट को खाना, किसानों को जमीन, गरीब को रोजगार और शिक्षा का अधिकार देने के बाद दरअसल दो मुद्दों ने कांग्रेस की हालत खराब कर रखी है: महंगाई और भ्रष्टाचार। साल 2009 के चुनाव के पहले मनमोहन सिंह ने वायदा किया था कि सरकार बनने के सौ दिनों में महंगाई पर काबू पा लिया जाएगा। आज हालत यह है कि प्याज और टमाटर अस्सी रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रहे हैं। घोटालों की तो एक लंबी फेहरिस्त है। त्रासदी यह है कि घोटालेबाजों के खिलाफ जितनी कार्रवाई मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुई, उतनी किसी सरकार में शायद ही हुई हो। पवन बंसल, ए राजा, कनिमोझी, अश्विनी कुमार को इस्तीफा देना पड़ा। डीएमके जैसे पक्के सहयोगी के राजा और कनिमोङी तो जेल गए। यही हाल सुरेश कलमाडी का भी हुआ। कई बड़े उद्योग घरानों के आला अफसर भी महीनों जेल की रोटी खाने को मजबूर हुए, जबकि एनडीए के जमाने में तहलका कांड हुआ और किसी को सजा नहीं मिली। जॉर्ज फर्नाडिस तो कुछ महीनों में फिर मंत्री बन गए थे। ऐसे में, सवाल यह है कि दिक्कत कहां है? रणनीति में या नेतृत्व में? या फिर मार्केटिंग में?

 

लेखक : आशुतोष

44 साल के आशुतोष मैनेजिंग एडिटर हैं। IBN7 से जुड़ने से पहले आशुतोष एक प्रमुख खबरिया चैनल आजतक की टीम का हिस्सा थे। वह प्राइमटाइम के कुछ खास ऐंकर्स में से एक थे। ऐंकरिंग के अलावा फील्ड और डेस्क पर खबरों का प्रबंधन उनकी प्रमुख क्षमता रही है। वह भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक खबरों की कवरेज से जुड़े रहे हैं।

Posted by on Nov 11 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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