Donation (non-profit website maintenance)

Live Indian Tv Channels

ऐसे नरसंहार पर देश अखिलेश को कभी माफ नहीं कर सकेगा

India_Communal_Clashes__systems@deccanmail

‘ये दंगे मेरे राजनीतिक कॅरिअर पर लगा दाग है। यह दाग हमेशा रहेगा।’  -मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, विधानसभा में

इतने निर्दोषों की दंगों में हत्या के बाद ‘दाग’ रहे न रहे, कॅरिअर ही क्यों रहना चाहिए? आज 2013 का उत्तरप्रदेश, 2002 के गुजरात से कहीं अधिक कलंकित, डरावना और धधकता हुआ है। ऐसा था नहीं। ऐसा किया गया है। नेताओं ने तो घृणा पैदा करने, बढ़ाने और फैलाने का निकृष्ट काम किया ही है, पुलिस व नागरिक प्रशासन के अफसर भी इस खून-खराबे को पनपने-भड़कने और बने रहने देने के लिए बराबरी के जिम्मेदार हैं।

जो मुजफ्फरनगर में हुआ वैसी आग पूरे देश में लगाने का ज़हरीला वातावरण तैयार किया जा रहा है। समय ही कितना है देश के आम चुनाव में। चुनाव की आहट के साथ ही सामाजिक वैमनस्य, लोगों को जाति-धर्म में बांटने का काम शुरू हो गया है। षड्यंत्र और तोडफ़ोड़ का परिणाम सांप्रदायिक उन्माद, हिंसा और हत्याएं।
जबकि अब आम भारतीय जाग चुका है। वह सिर्फ उन्हें जिताएगा – जो विकास करके देंगे। पढ़ाई-लिखाई को बढ़ावा देंगे। काम के अवसर देंगे। कारोबार को फलने-फूलने देंगे। मंदिर-मस्जिद की बात नहीं करेंगे। अस्पताल और सड़कें बनवाएंगे। इकोनॉमिक डेवलपमेंट ही जिनका काम होगा। ताकि लोग खुशहाल बनें।
ऐसा ही हुआ है पिछले कुछ चुनावों से। देश में जगह-जगह वे ही लोग, वो ही पार्टियां चुनी जाने लगीं जो केवल विकास करके दिखा रही थीं। केंद्र में यूपीए का लौटना भी इसी का परिणाम था। तब यूपीए न इस तरह के भ्रष्टाचार से आरोपित थी, न ही नेतृत्व ने ऐसी चिर-चुप्पी साध रखी थी। कि कुछ भी बुरा हो जाए – मुंह नहीं खोलेंगे। तो फिर उत्तर प्रदेश में घृणा की राजनीति क्यों पनपने दी गई?

मुजफ्फरनगर के गांव कवाल में 27 अगस्त को इस दंगे का बीज बोया गया। छेडख़ानी की एक स्तरहीन घटना पर यह घटा। जाट समुदाय के दो लोगों ने उक्त घटना पर बदला लेते हुए मुस्लिम युवक की हत्या कर दी। इस पर उन दोनों की भी हत्या कर दी गई। फिर, जैसा कि होता है, पुलिस ही पुलिस फैल गई। किसी को गिरफ्तार करने की हिम्मत लेकिन नहीं जुटा पाई। यहां पुलिस की, तमाम अफसरों की अकर्मण्यता। गंभीर और आपराधिक चुप्पी। क्यों डरे? किससे डरे? किसके कहने पर कांपते रहे? काहे के पुलिस अफसर?

 

फिर मामले की नजाकत देख अखिलेश सरकार ने कलेक्टर और एसएसपी को हटा दिया। इसे सरकार की भारी $गलती बताया जा रहा है। प्रश्न यह है कि सरकार ने इन्हें ऐसे क्यों हटाया? कुछ किया नहीं – इसलिए। या कि सरकार मुस्लिम और जाट जैसे राजनीतिक समीकरणों में उलझ कर ऐसा कुछ कर गई?
फिर अगस्त के आखिरी दिन खाप पंचायत बुलाई गई। जाटों की हत्या को लेकर भारी आक्रोश। हत्यारों को गिरफ्तार करने की मांग। यहां भाजपा नेताओं के भाषण जितने भड़काने वाले थे, उतने ही सपा नेताओं के। जाति पंचायतों का मामला हमेशा हर पार्टी को, तयशुदा बातों से अलग कर देता है। अखिलेश सरकार फिर हरकत में आई। उसने भड़काने वाले भाषण देने वाले नेताओं पर केस दर्ज कर दिए। लेकिन किसी को गिरफ्तार करने का साहस यहां भी नहीं दिखा सकी। पुलिस अफसरों की कायरता। मुख्यमंत्री की निर्बलता। क्यों नहीं पकड़ सके? किससे खौफ खा गए?

 

और उसके बाद आई 7 सितंबर की वह घड़ी। जाटों की पंचायत। सांप्रदायिक तनाव बुरी तरह से फैल चुका था। और अधिक भड़काया जा रहा था। राज्य के पुलिस प्रमुख डीजीपी देवराज नागर मुजफ्फरनगर में पहुंचकर ऐसा स्वीकार कर चुके थे। किन्तु बस, स्वीकार ही किया – किया कुछ भी नहीं। या कि डर गए? क्या मुख्यमंत्री अखिलेश ने उन्हें ‘कुछ न करने’ को कहा था? यदि हां, तो ऐसा क्यों? उन्होंने मान क्यों लिया? यदि नहीं, तो वे कठोर कार्रवाई क्यों न कर पाए? टीवी पर स्टिंग ऑपरेशन ने सब साफ कर दिया है।
इस महापंचायत में कोई एक – सवा लाख लोग जुटे। किसी सरकार को इतने सारे लोगों के इकठ्ठे होने की भनक तक न पड़ी – तो क्या तो मुख्यमंत्री, क्या तो मुख्य सचिव, क्या पुलिस प्रमुख और क्या सांसद-विधायक-सरपंच-पंच – सभी तो आपराधिक नाकारापन और लापरवाही के जीवंत प्रतीक हैं। अफसरों को तो तनख्वाह ही इस बात की मिलती है। लोक सेवक। रक्षक। कानून का राज स्थापित करने वाले। खुफिया महकमा पूरा का पूरा न केवल बर्खास्त हो जाना चाहिए था। बल्कि सींखचों के पीछे डाल दिया जाना चाहिए।
और फिर जिस तरह दंगे भड़के – पंचायत में भाग लेकर लौट रहे लोगों को जिस आसानी से हिंसा-खून-खराबे का शिकार बनाया गया – वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। फिर क्या तो कोई दंगाई, क्या शिकार, क्या निर्दोष, क्या दोषी – सब को एक जैसा बना दिया गया। आग, हथियार, हिंसा को क्या पता होता है – सामने कौन है? वह तो वहां सो रहे पुलिस व नागरिक प्रशासन के अफसरों को सोता देख, दुगनी भड़कती है।
मुख्यमंत्री को इस कदर श्रीहीन, संवेदनाहीन और दीन-हीन देखकर उत्तरप्रदेश ही नहीं, समूचे देश में चुने गए नेतृत्व पर शर्मिंदगी होने लगती है। तांडव हो रहा था। फिर भी एक युवा मुख्यमंत्री सो रहा था। एक ऐसा मुख्यमंत्री जिसे मात्र डेढ़ वर्ष पहले देशभर ने सुलझे हुए, भले इन्सान और ईमानदार नेता के रूप में माना। विदेश से उच्च शिक्षा लेकर लौटे इस नौजवान से न जाने क्या-क्या उम्मीद थी – सब ध्वस्त हो गई। छोटे-बड़े 21 दंगे हो चुके हैं उनके राज में।
फिर आया विधानसभा सत्र का दृश्य। भाजपा विधायकों की गिरफ्तारी होनी थी। भड़काने वाले उग्र, आपत्तिजनक भाषणों पर दर्ज मुकदमों के कारण। अचानक प्रकट हुईं उमा भारती। भारी नाटक हुआ। पुलिस को चेतावनी दी। अखिलेश को चुनौती दी। सब बेबस। देखते रहे। देश ने भी देखा, टीवी पर। बसपा के भी सांसद, विधायकों पर मुकदमे हैं। कांग्रेस नेताओं पर भी हैं। सब मजे में। उमा भारती ने कहा- गहन छानबीन से पहले कोई उनके विधायकों को कुछ नहीं कर सकता। और दंगे भड़काने वाले तो अखिलेश सरकार के सबसे प्रमुख मंत्री मोहम्मद आजम खान हैं। उन्हें गिरफ्तार करो।
आज़म खान तो मुख्यमंत्री अखिलेश पर कहीं भारी हैं। गिरफ्तारी तो दूर, अखिलेश उन्हें कुछ जोर से कह सकें – यह भी संभव नहीं। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री कौन है – यही पता नहीं चलता। मुलायम सिंह यादव – जिन्हें बेटा भी कार्यकर्ताओं की शैली में ‘नेताजी’ ही बुलाता है – तो स्वयं कह चुके हैं कि : मैं मुख्यमंत्री होता तो 15 दिन में प्रदेश को ठीक कर देता! तो कीजिए, ना । जिस सपा को जनता ने चुना है, वह आपकी ही तो है।

 

जो कुछ भी हो रहा हो, न मुलायम ऐसा कह कर जिम्मेदारी से बच सकते हैं, न ही उमा भारती, न ही राहुल गांधी – जिन्होंने इस राज्य में हार के बाद कहा था : यह न समझा जाए कि मैं अब चला जाउंगा, मैं तो यहां पूरे पांच साल तक रहूंगा..। किन्तु सबसे बड़े दोषी अखिलेश ही हैं।
दंगों के दोषी नेताओं को कड़ी सजा मिलनी असंभव है। किन्तु उन्हें पहचानकर, हराना ही होगा। कानून का न सही, लोकतांत्रिक दंड तो हमारे ही हाथ में है। सारा देश उन निर्दोषों को, उनके परिवारों को संबल दे सकेगा, यदि ऐसे पथभ्रष्ट नेता, सत्ता से बाहर फेंक दिए जाएं। दोषी अफसरों को दंड तो उन निर्दोषों की करुण पुकार, अपनी तरह से देगी।

कल्पेश याग्निक
(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=3093

Posted by on Sep 21 2013. Filed under सच. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

Leave a Reply

*

Recent Posts

Photo Gallery