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25 मई का स्याह दिन… खून, बर्बरता और मौत का जश्न…

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25 मई का स्याह दिन… खून, बर्बरता और मौत का जश्न…

 

२५ मई का स्याह दिन… खून.. बर्बरता… मौत का जश्न…   नक्सलवाद के विरुद्ध युद्ध छेड़ने वाले  छत्तीसगढ़ के प्रखर नेता महेंद्र कर्मा सहित २८ लोगों की जघन्य हत्या ! पूरा देश सकते में हैं. आदिवासी अधिकारों की लड़ाई के नाम पर ऐसी दरिंदगी… शर्मनाक! तिसपर कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा इस घृणित कृत्य को आदिवासियों का प्रतिशोध कहकर सही ठहराने की कोशिशें… नीचता की हद.

 

इस तथ्य से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि आज़ादी के पश्चात् कांग्रेस सरकार द्वारा अंग्रेजों की ही जन- शोषण नीतियां अपनाई गयी जिसके फलस्वरूप वनवासियों को अपनी ज़मीन, अपना जीवन बचाने हेतु हथियार उठाने पड़े. नक्सलबाड़ी आन्दोलन सरकार की जनविरोधी नीतियों का नतीजा था. किन्तु  आदिवासी अधिकारों के लिए यज्ञकुंड बनी नक्सलबाड़ी की पवित्र अग्नि तो वहीँ बुझकर रह गई और लाशों के ढेर पर अपनी रोटी सेंकने वाले कथित ख्रिस्तानी मिशनरी और साम्यवादियों ने  अपने तुच्छ स्वार्थों की खातिर सभी वनवासी इलाकों को माओवाद और नक्सल वाद की रक्तिम दावाग्नि में झोंक दिया. इसी दावाग्नि में हजारों निर्दोष आदिवासी और सुरक्षाबल के जवान झुलसकर शहीद हो चुके हैं और अब नया नाम है स्व. महेंद्र कर्मा का.

 

महेंद्र कर्मा कांग्रेसियों में अपवाद थे. छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद से मुक्त कराने हेतु कृतसंकल्प उस महान नेता का अस्तित्व नक्सलियों और भोले-भाले आदिवासियों की विवशता का लाभ उठाकर धर्मान्तरण कराने वाले मिशनरियों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा था और इसीलिए वे नक्सलवादियों के निशाने पर थे.
किन्तु उनपर नक्सालियों द्वारा किया गया यह हमला औचक  नहीं लगता. हमले के व्यापक स्तर ने मुझे अपने एक पारिवारिक सदस्य द्वारा व्यक्त की गई आशंका पर फिर से सोचने के हेतु विवश कर दिया.
दरअसल चंद रोज़ पहले मेरे एक पारिवारिक सदस्य ने सुबह-सुबह मेरे सामने एक प्रतिष्ठित अख़बार धर दिया… “पढ़ इसे.”
उसमें केन्द्रीय कोबरा फ़ोर्स द्वारा 8 कथित निरपराध वनवासियों की हत्या की खबर और गोविन्द चतुर्वेदी का विचित्र किस्म की बौद्धिकता झाड़ता हुआ लेख था जो निहायत ही गैरजिम्मेवारी  से नक्सलवाद को न्यायोचित तथा छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह को आदिवासियों के मौत के लिए दोषी सिद्ध करने पर तुला था. (गोविन्द जी इस तथ्य को पूरी तरह छिपा गए कि कोबरा फ़ोर्स राज्य सरकार नहीं बल्कि केंद्र सरकार के अधीन है.)

 

मैंने प्रतिक्रिया दी- “हूं, ये छद्म बुद्धिजीवी कभी नहीं सुधरेंगे.”

 

उन्होंने कहा- “नहीं, कुछ न कुछ गड़बड़ ज़रूर है. लगता है छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार को घेरने की तैयारियाँ चल रही हैं. मुझे आशंका है कि आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ में कोई बहुत बड़ा काण्ड होने वाला है.” अफ़सोस कि उनकी आशंका  कुछ ही दिनों में सच साबित हुई.

 

 इस जघन्य हत्याकांड में कुछ विचित्र ‘और पूर्वनियोजित संयोग’ (?) दिख रहे हैं जिन्होंने मुझे उक्त आशंका का स्मरण करा दिया. ऐसे अजीब ‘संयोग’ जो स्व. श्री महेंद्र जी तथा उनके साथियों को मौत की घाटी में दफन कर आये.

 

‘संयोग’ 1 … छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा इंटेलिजेंस सूचनाओं के आधार पर नक्सली हमलों की आशंका को देखते हुए कांग्रेस को रैली आयोजित ना करने की हिदायद दी गई थी. ‘संयोगवश’ ‘हिदायत का पालन नहीं हुआ. (किसने नहीं होने दिया?)

 

संयोग 2 … गृह मंत्रालय ने माना है कि कांग्रेस के उस काफिले द्वारा नक्सल इलाके से गुज़रते वक़्त अपनाया जाने वाला सुरक्षा प्रोटोकॉल नहीं अपनाया गया जबकि उस काफिले में मौजूद सभी नेता नक्सलियों के तौर तरीके जानते थे. (तो किसने प्रोटोकॉल के अनुसार काम नहीं होने दिया?)

 

संयोग 3 … छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस आलाकमान, नक्सलियों और ईसाई मिशनरियों के प्रिय कांग्रेस नेता अजित जोगी, जो महेंद्र कर्मा के घोर प्रतिद्वंद्वी भी हैं, रैली में मौजूद थे किन्तु काफिले के साथ जाने की बजाय ना जाने किस ‘महत्वपूर्ण’ काम से २ घंटे पूर्व ही  रैली छोड़ अपने बेटे समेत हैलीकॉप्टर से चल दिए. (हालाँकि हमें संतोष है कि वे सकुशल हैं मगर उनके यूं ‘संयोगवश’ काफिले के साथ ना जाने का जवाब तो मनीष तिवारी के पास भी नहीं..)

 

संयोग 4 … कभी भी मीडिया से सीधे बात न करने वाली राजमाता घटना के पश्चात् बिलकुल सटीक समय पर मीडिया के सामने आंसू बहती हुई प्रकट हुई. उन्होंने इस हमले को ‘लोकतंत्र पर हमला’ बताया. शायद मोहतरमा भूल गयीं कि यूपीए के ही शासनकाल में नक्सलवादियों के हाथों में साधारण राइफल के जगह एके 56 आ गई. दंतेवाडा हमले में शहीद 78 जवान याद हैं? नक्सलियों द्वारा मार डाले गए हजारों निर्दोष नन्हे बच्चे, महिलाएं, वृद्ध याद हैं? क्या तब यह लोकतंत्र पर हमला नहीं था? मौत पर राजनीती ना करने की नसीहत देने वाले हमलों में और तुरत ही उनके रीढविहीन चम्मचों ने छत्तीसगढ़ में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग शुरू कर दी. ‘संयोगवश’ छत्तीसगढ़ में चुनाव नज़दीक हैं.

 

और इन सबसे बड़ा ‘संयोग’ तो अभी सामने आया है कि काफिले का तयशुदा रास्ता अचानक बदला गया. पहले काफिला सुकमा से गादीरास होते हुए दांतेवाडा आने वाला था. ऐन समय रास्ता बदलकर गादीरास के बजे दरभा से होते हुए जाना तय किया गया.. इसी बदले हुए रस्ते पर हजारों नक्सली पूरी तयारी के साथ घात लगाये बैठे थे! कितना क्रूर ‘संयोग’ है कि ऐन वक़्त बदले हुए रास्ते पर अचानक ही  एके 56 और घातक ग्रेनेड्स से लैस हजारों नक्सलवादी टकरा जाएँ और यूं ही आपकी जान ले लें!!!

 

रास्ता किसने बदलवाया, इसपर छानबीन जारी है (जबकि यह समझना भी कठिन नहीं है) और हाँ… स्वयं रमण सिंह तो न्यायिक जाँच की मांग कर रहे थे किन्तु कांग्रेसी गृहमंत्री ने जांच NIA को सौंप दी है. आखिर कांग्रेस क्या छुपाना चाहती है?
अब पूरे घटनाक्रम का ठीकरा ”सुरक्षा में कोताही’ के नाम पर रमनसिंह सरकार के माथे मढने की कवायदें जारी हैं.नक्सलवाद से लोहा लेने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों को मानवता-विरोधी बताकर बंद करवाने वाले भी जोर-शोर से रमनसिंह को कोस रहे हैं. मगर कोई यह नहीं बताएगा कि कि नक्सलवाद से लड़ने की मुख्य ज़िम्मेदारी व शक्ति केन्द्रीय गृहमंत्रालय के पास है, राज्य के नहीं और ना ही यह कि आखिर किसके द्वारा और क्यों काफिले को  सुरक्षित रास्ता छोड़कर मौत के रास्ते पर धकेला गया ??? आश्चर्य तो  भाजपा के रवैय्ये पर भी होता है. जब केन्द्रीय गृहमंत्रालय स्वयं कांग्रेसियों द्वारा प्रोटोकॉल की लापरवाही को स्वीकार कर रहा है, जब छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी बीके हरिप्रसाद ने स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ सरकार ने सुरक्षा कारणों के अधर पर कांग्रेसी नेताओं को सुकमा जाने से मना किया था, तब भाजपा क्यों यही तथ्य जनता के सामने नहीं लाना चाहती? क्या भाजपाई चाहते हैं कि रमनसिंह सरकार को बेवजह दोषी ठहराकर बर्खास्त कर दिया जाये?

 

वहीँ मीडिया ने तो रंग बदलने में गिरगिट को भी मात दे दी. कल तक CRPF जवानों को निर्ममतापूर्वक मारने वाले हमलावर इनके लिए अपने ‘हक की लड़ाई लड़ने वाले गरीब आदिवासी’ थे, वही आज कांग्रेसी नेताओं पर हमले के बाद स्पष्ट रूप से ‘नक्सली’ घोषित हो गए!
इस सबके बीच, एक प्रश्न अब भी बरक़रार है कि ना जाने क्यों ‘संयोगवश’ कांग्रेस के सभी प्रभावशाली और ‘जी-हुजूरी’ ना करने वाले नेता एक-एक कर दुर्घटना या हमलों का शिकार होते रहे हैं? नाम गिनाएं? स्व. श्री लाल बहादुर शास्त्री… ललित नारायण मिश्र… माधवराव सिंधिया… राजेश पायलेट… और अब… महेंद्र कर्मा. अगली बार ??

 

जवाब देने के लिए ‘संयोगवश’ बच गए अजित जी अभी टीवी पर अवतरित होने वाले हैं.

 

हालाँकि हमें यह भी ज्ञात है कि इन ‘संयोगो’ का रहस्य कभी नहीं खुलेगा

 

लेखिका  : तनया गडकरी

 

Source : IBTL

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=2272

Posted by on May 27 2013. Filed under सच. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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