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जब तक एक-एक आतंकी नष्ट नहीं कर दें, आराम करना ही आतंक होगा।

जब तक एक-एक आतंकी नष्ट नहीं कर दें, आराम करना ही आतंक होगा।

 

‘इंडियन मुजाहिदीन’ कुछ नहीं होता। सारा आतंक पाकिस्तान से आता है। दुर्भाग्यवश सरकार भी इस लाइन को बढ़ा रही है। ‘होम-ग्रोन’ टेरर शब्द हमारी मातृभूमि को बदनाम करने का प्रयास है। इंडियन मुजाहिदीन कहकर, हम भारतीयों को दीन-हीन किया जा रहा है। रोकें इसे।          – सोशल मीडिया से, 22 फरवरी 2013 को।
ये ‘युद्धभूमि’ से क्या मतलब है? कहां है यह? और ‘देश के दुश्मन’ की परिभाषा? जज क्रोध में पूछे जा रहे थे। ‘सारा संसार, मी लॉर्ड’- सरकार की ओर से उत्तर आया। राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने जो आदेश जारी किया था उसके अनुसार : सारी दुनिया ही युद्ध का मैदान है- जब तक कि हर आतंकी को नष्ट नहीं कर दिया जाता। ‘डिज्नीलैंड की खूबसूरत राहों से लेकर हवाई के रेतीले किनारों तक सबकुछ युद्धभूमि। हर आतंकी देश का दुश्मन।’
न्यूयॉर्क की वह अदालत खचाखच भरी हुई थी। 9/11 को 5 वर्ष हो चुके थे। मामला एक अमेरिकी नागरिक का था। उसे आतंक को सहायता देने के गंभीर आरोपों में महीनों काल कोठरी में रखा गया। यातनाएं दी गईं। सबकुछ बग़ैर किसी आरंभिक सुबूत के! कई दिन तक तो कोई मुकदमा ही दर्ज नहीं किया। अमेरिका में वहां के नागरिकों को गज़ब की स्वतंत्रता प्राप्त है। चाहे संदिग्ध हो – फिर भी बिना वकील के उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। इसलिए हरेक को संदेह से देखने पर भड़के आम अमेरिकी वहां उत्सुकता से इकठ्ठे हुए थे। किन्तु सरकारी वकील के जवाब सुनने के बाद सबका रोष समाप्त हो गया। समझ गए कि सरकार उन्हीं की रक्षा के लिए कठोर बनी हुई है। देश के लिए समर्पित है। चाहे कितनी भी बदनामी राष्ट्रपति बुश को क्यों न झेलनी पड़े।
बुश ‘सर्वाधिक बदनाम’, सर्वाधिक क्रूर, अमानवीय तौर-तरीके अपनाने वाले, युद्ध भड़काने वाले राष्ट्राध्यक्ष के रूप में समूचे विश्व में जाने जाते हैं/रहेंगे। किन्तु उन्होंने सिद्ध कर दिया कि आतंक के विरुद्ध युद्ध ऐसे ही लड़ा जाता है। और उन्हें कोसने वाले अमेरिकी नागरिक – यह एक पल को भी याद करने को तैयार नहीं हैं कि बुश की कठोरता के कारण ही आतंकी अमेरिका पर दूसरा हमला नहीं कर पाए। ताज़ा समाचार यह है कि सबसे बड़े बुश-विरोधी बराक ओबामा ने इसी फरवरी में ठीक वैसा ही गोपनीय आदेश जारी किया है। इसमें राष्ट्रपति के आदेश से किसी भी अमेरिकी/विदेशी को बग़ैर किसी सुबूत के कभी भी, कहीं से गिरफ्तार किया जा सकेगा। फिर भड़क रहे हैं अमेरिकी। किन्तु देशहित में कठोर बनना ही पड़ता है।
बस, यही हमारी कमजोरी है। हम विनम्र ही बने रहते हैं। नरम ही रहना चाहते हैं। हैदराबाद बार-बार लहूलुहान हो – हमारी सरकार सबकुछ विनम्रतापूर्वक करती चली जाती है। रियाज, यासीन, इकबाल या जितने भी भटकल हों – हम उन्हें पहले तो पहचान ही नहीं पाते। फिर पकड़ कर छोड़ देते हैं। फिर कोई वीडियो क्लिप दिखाता है तो हम पछताने लगते हैं। आतंकी कोलकाता जेल से छूट जाता है। वहां से निकल कर पुणो में जर्मन बेकरी धमाके को अंजाम देता है। फिर पाकिस्तान में दिखता है। हमारी सरकार विलाप करती है। कागज़ जुटाकर इस्लामाबाद भेजती है। भेजती रहती है। कराची में दाऊद मखौल उड़ाता है। रावलपिंडी में हाफिज सईद तकरीर करता है। दाऊद की जानकारी, हम चाहते हुए भी, उसके समधी से लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। पलक-पावड़े बिछाकर उसे मैच दिखाने को उतावले अवश्य हो जाते हैं।
हाफिज़ से मिलने हुर्रियत नेताओं को कश्मीर से पाकिस्तान भेजते हैं। सैयद सलाहुद्दीन उनका मार्गदर्शन करता है कि कश्मीर कैसे स्वतंत्र होना चाहिए! हम वीज़ा देते चले जाते हैं। वजीफा देते चले जाते हैं। सरकार के शीर्ष पर बैठे लोगों से आतंकवादियों को सम्मानसूचक शब्दों से विभूषित करवाते जाते हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस के महासचिव से ‘ओसामाजी’ सुनने पर लगा था कि पूरे अलकायदा ने भी कभी अपने आका को इतना मान नहीं दिया होगा। गृहमंत्री ‘श्री हाफिज़’ और मिस्टर सईद से नवाज़ते हैं। क्या ऐसे लड़ेंगे हम आतंक के विरुद्ध युद्ध? ऐसी घटनाएं ‘सहज-सामान्य’ भूल कहकर टाल देने से ही तो हर बार हैदराबाद हो जाता है। हर बार खून बहता जाता है।
आतंक के विरुद्ध युद्ध लड़ने के लिए समूचे संसार को न सही, जहां आतंकी दिखें, जहां उनका पता चले – उस जगह को तो युद्धभूमि बना ही सकते हैं। नहीं तो हमारी हालत 50 के दशक के फ्रांस जैसी हो जाएगी। वह समूचे विश्व को शिकायत करता था कि अल्जीरियाई आतंकी हमलावर उनके यहां गुप्त रूप से साइकल पर रखकर बम भेजते हैं। साइकल सवारों पर कैसे शक करें। ’51 में गिरफ्तार एक आतंकी ने अदालत में खिल्ली उड़ाकर कहा : ‘..तो फ्रांस हमें लड़ाकू हवाई जहाज दे दे। हम साइकल छोड़, उसमें बम भेजने लगेंगे।’
विलाप, रूदन, क्रंदन और पछतावे का कोई स्थान नहीं है आतंक के विरुद्ध युद्ध में।
देश के दुश्मनों को नष्ट करने की सोच। उसी तरह की रणनीति और आक्रमण करने की तैयारी। और हर तरह के परिणामों के लिए तत्पर रहना। सोच। तैयारी। परिणाम। ऐसे होगा आतंकियों का सफाया।
हैदराबाद हमले से एकदम नई बहस खड़ी हुई है। इससे पहले खुफिया तंत्र की सौ फीसदी विफलता देखी जाती थी। या कि बहुत आधी-अधूरी, फैली-फैलाई धुंधली सी जानकारी राज्यों को भेजी जाती थी। कि आतंकी हमला हो सकता है। सूचनाएं हैं। ऐसे अलर्ट पर कोई ध्यान दे तो भी कुछ कर नहीं पाता था। वैसे ध्यान देता भी नहीं था। जयपुर आतंकी विस्फोट के बारे में मध्यप्रदेश पुलिस ने काफी ठोस सूचना राजस्थान को भेजी थी। पुलिस प्रमुख ने उसे देखना तक उचित नहीं समझा था। किन्तु इस बार सबको काफी-कुछ पता था। लगभग सबकुछ। दिलसुख नगर इलाके तक का नाम था। संभवत: पहले भी वहां हो चुके हैं विस्फोट इसलिए। जो भी। पुलिस कमिश्नर वहां गए। तब तक कुछ नहीं था। बाद में साइकल और बम पहुंचे। स्पष्ट है, पुलिस कमिश्नर के सामने सजाए तो नहीं ही जाएंगे। क्यों ऐसी सोच नहीं थी कि जब तक हैदराबाद का चप्पा-चप्पा पुलिस बूटों से न गूंज उठे, वो चैन से नहीं सोएंगे। गुप्तचरों के दल दिन रात जुटेंगे। और सेना, अर्धसैनिक बलों, अन्य राज्यों – सारे जहां से – सहायता लेंगे। हैदराबाद ही क्यों, उन सभी छह शहरों के लिए समूचा देश भिड़ जाता।
खोजी शिकारी कुत्तों की तरह चुस्त और भूखे भेड़ियों की तरह आक्रामक रखवाले ही आतंक के विरुद्ध युद्ध लड़ सकते हैं। शेर की तरह शूरवीर ही इस युद्ध का नेतृत्व कर सकते हैं। धीरे-धीरे, शांति से और ‘अभी, काफी समय है’ जैसी हमारी सरकार की सोच हमें कुख्यात किन्तु हास्यास्पद ‘बगदादी बॉब’ बना देगी। सद्दाम हुसैन कैबिनेट में सूचना मंत्री थे मोहम्मद सईद अल-सहाफ। अप्रैल 2003 में उनका टीवी पर कथन दुनिया भर ने सुना था: अभी तो काफी समय है। शांति से रोक लेंगे। बगदाद से 100 मील दूर है अभी अमेरिकी सेना। ठीक उसी समय आधी टीवी स्क्रीन पर दुनिया ने देखा अमेरिकी टैंक बगदाद की सड़कों को रौंदते हुए बढ़ रहे थे।
ऐसा नैराश्य निश्चित ही हमें पीछे धकेल देगा। इसलिए ऐसे नैराश्य में नहीं डूबना है। आतंक के विरुद्ध ही नहीं – हर एक युद्ध दो तयशुदा तरीकों से लड़ा जाता है :
1. रणनीति: अ) हमलों को भांपने, हमलावरों को पहचानने और हमले से पहले ही उन्हें नष्ट करने या पकड़ने की।
ब) हमलों के बाद कठोरतम कार्रवाई करने और साथ देने वालों को नष्ट करने की। हथियार व नेटवर्क तबाह करने की। पैसे के स्रोत बंद करने की।
2. आक्रमण: लगातार चलने वाली भयावह प्रक्रिया। आक्रमण मानसिक/शारीरिक और सशस्त्र हर तरह के हो सकते हैं। यह तब तक करने अनिवार्य हैं – जब तक कि दुश्मन पूर्णत: नष्ट न हो जाए।
हम, यानी हमारी सरकार/सरकारें ‘हमले से पहले ही दुश्मन को नष्ट करने’ वाली रणनीति में सौ फीसदी विफल है। बाकी रणनीति इसलिए व्यर्थ है क्योंकि सांप काट कर चले जाने के बाद लाठी पीटने से कर्कश शोर ही मचेगा, लाठी ही टूटेगी, चोट हमें ही लगेगी। धरती खराब होगी, सो अलग।
हैदराबाद विस्फोटों से हमारी यह कमजोरी पुरजोर तरह से उभर गई है।
आतंक के विरुद्ध युद्ध बहुत-बहुत-बहुत ही लंबा होगा। अभी जैसा है, वैसे रवैये से असंभव है कि हमले रोके जा सकें। किन्तु रोकने ही होंगे। और सरकार को ही रोकने होंगे। जिम्मेदारी नहीं, धर्म है उनका। वरना दहशत में जीने लगेंगे सारे भारतीय। और दहशत होगी सरकार की! कहते हैं जब नागरिक, सरकार से डरने लगें तो उसे ‘आतंक’ कहते हैं। और जब सरकार, नागरिकों से डरने लगे तो उसे ‘स्वतंत्रता’ कहते हैं। काश, हमारी सरकार, हम नागरिकों से डरने लगे!
Kalpesh Yagnik
(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)
Source : bhaskar.com

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Posted by on Feb 23 2013. Filed under मेरी बात, सच. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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