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किसी के वोट बैंक ना बनिए

Don't use Muslims only as vote bank

Don’t use Muslims only as vote bank

पिछले दिनों भाजपा ने चुनाव का बिगुल बजाया, तो उसमें अच्छा-खासा किरकिरापन आडवाणी-मोदी खिंचाव के कारण आ गया। वैसे यह भाजपा का अंदरूनी मामला है और इस पर सही मायने में किसी अन्य पार्टी के नेता या मुसलमान का टिप्पणी करना शोभनीय नहीं है।

वास्तविकता यह है कि जो मुसलमान यह समझते हैं कि किसी पार्टी विशेष को अल्लाह ने उनको अमृत देने के लिए बनाया है और मोदी, आडवाणी आदि को जहर देने के लिए, तो इससे बड़ी गलतफहमी और दुर्भाग्य कोई न होगा, क्योंकि मुसलमानों के लिए सोनिया, मोदी, मुलायम सिंह, मायावती, ममता, जयललिता आदि सभी एक हैं। हां, कुछ पार्टियां तो उनके लिए सबसे खतरनाक साबित हो रही हैं, क्योंकि उनकी रणनीति बगल में छूरी मुंह में अल्लाह वाली है। ऎसी सेकुलर पार्टियां हैं, जिन्होंने अल्पसंख्यकों के लिए कुछ भी नहीं किया।

इस लेखक ने एक टी.वी. चैनल पर मोदी के लिए यह बात कही थी कि बावजूद 2002 के नरसंहार के वह मुसलमानों के ह्वदय सम्राट बन सकते हैं, यदि वे अपने किरदार में थोड़ा बदलाव लाएं अर्थात कम से कम मुसलमानों द्वारा दी गई टोपी या हरी दोशाला को तो स्वयं से सुसज्जित कर लें – चाहे वह कैमरे के लिए “पॉलिटिकली करेक्ट” छवि मात्र ही हो। यह तो मजाक की बात है, लेकिन अगर वह मुसलमानों से गुजरात दंगों के लिए माफी मांग लें, तो कमाल संभव है।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के पश्चात मुसलमानों ने कांग्रेस को हाशिए से लगा दिया था, मगर क्षमा याचना के बाद उसे माफ कर दिया। मुसलमानों को चाहिए कि अब वे आगे की ओर देखें और 1992 की बाबरी मस्जिद एवं 2002 के दंगों को भयंकर सपनों की भांति भुलाकर अब अपनी आगे आने वाली पीढियों को बढिया शिक्षा के अवसरों की प्राप्ति कराएं, भले ही वह मोदी या अन्य किसी भाजपाई प्रधानमंत्री द्वारा ही हो, कांग्रेस द्वारा ही हो अन्यथा आम आदमी पार्टी द्वारा।

उधर, संघ परिवार को चाहिए कि अल्पसंख्यकों के लिए चरमराते दरवाजों को पूर्ण रूप से खोल दें, यदि वे चाहते हैं कि उनके राजनीतिक अंग भाजपा को सत्ता प्राप्त हो, क्योंकि भारत में बिना मुस्लिम मत और बिना मुस्लिम विकास के न तो कोई सरकार केंद्र में शासन कर सकती है और न ही भारत का विकास हो सकता है। मेरा मानना है कि नरेन्द्र मोदी यदि मुसलमानों से क्षमा-याचना कर लें, तो वे उनको न केवल माफ कर देंगे, बल्कि उनके पक्ष में मतदान भी करेंगे, क्योंकि पिछले 11 वर्ष से गुजरात में कोई दंगा नहीं हुआ है, जबकि इन्हीं वर्षो में हमने दूसरे राज्यों में अनेक सांप्रदायिक दंगे देखे हैं। इसके अलावा अल्पसंख्यक भी गुजरात की तरक्की में पूरी तरह शामिल हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि जब-जब चुनाव आते हैं, तब-तब मुसलमानों की बड़ी पूछ होती है। तेरे-मेरे मुसलमानों का खेल “धर्मनिरपेक्ष” पार्टियों में खूब दबा के चलता है। ऎसा प्रतीत होता है कि भारत में इन राजनीतिक पार्टियों के लिए मुसलमान एक पंचवर्षीय बरसाती कीड़े की भांति हो गया है। उधर, मुस्लिम संप्रदाय कहने को तो बड़े ज्ञान-ध्यान से मतदान करता है, मगर वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है। सच्चाई तो यह है कि भारत के लगभग 20 करोड़ मुसलमानों को मतदान वाले दिन पूर्ण रूप से भरमाया जाता है। सोचना चाहिए, आखिर इसका क्या कारण है?

इसका कारण यह है कि पिछले छह दशकों से एक पार्टी, जिसे धर्मनिरपेक्ष के रूप में जाना जाता है, मुसलमानों के वोट मुफ्त में ही बटोरती चली आई है या यह कहना उचित होगा कि मुसलमान को इस पार्टी ने अपना वोट बैंक बना रखा है, जिसकी सीढ़ी पर चढ़ इस पार्टी के राजनेता न केवल सत्ता का सुख भोग रहे हैं, बल्कि धनाढय हो, अपनी भावी पीढियों के निर्वाह का इंतजाम भी कर देते हैं। नरेन्द्र मोदी पर लगने वाले आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन हमें यह जरूर सोचना चाहिए कि देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी ने मुसलमानों को क्या दिया है? सच्चर कमेटी, लगभग 60 हजार छोटे-बड़े दंगे, पिछड़े हुए उर्दू माध्यम स्कूल, निर्दोष मुस्लिम युवाओं को सलाखों के पीछे सड़ाना, आरक्षण का झुंझुना देना, निष्ठुर एवं निठल्ला अल्पसंख्यक आयोग आदि?
पिछले दिनों दिल्ली की शाहजहां आबादी जामा मस्जिद के “शाही” इमाम के छोटे भाई यह्या बुखारी ने रोष जताया था कि कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा था कि मुसलमान और कहीं नहीं जा सकता, क्योंकि कांग्रेस उसकी मजबूरी बन चुकी है। क्या सिब्बल का यह कहना सही है?

अब से लगभग 15-20 वर्ष पूर्व जब दक्षिण दिल्ली की सांसद सुषमा स्वराज थी, तब एक मुस्लिम दल उनके क्षेत्र में कोई काम करवाने गया। दल वालों को उनका सपाट उत्तर था कि जब मुसलमानों ने मुझे वोट ही नहीं दिया और मुझे हराने की कोशिश की, तो मैं भी उनका काम क्यों करूं? हालांकि ऎसा नहीं बोलना चाहिए, क्योंकि विजयी होने के पश्चात ये सारी बातें मिट जाती हैं। सुषमा ने यह बात खीझ कर ही कही होगी, क्योंकि वह वैसी सांप्रदायिक नेता नहीं हैं, जैसे वरूण गांधी।

अब चूंकि 2014 का चुनाव सर पर है, मुसलमानों को इस बार बड़ी सोच समझ से मतदान करना है। अच्छा हो कि मतदान से पूर्व मुसलमान स्टाम्प पेपर पर अपनी मांगें लिखकर उस नेता से हस्ताक्षरित करवा लें कि जो जीतने की स्थिति में हो, उसे वोट दें, भले ही वह भाजपा से हो, शिव सेना, मनसे, सपा, बसपा, कांग्रेस से हो या किसी कम्युनिस्ट पार्टी से हो।
पिछले दिनों दिल्ली के इण्डिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय गोयल ने मुस्लिम समुदाय के लोगों से आमने-सामने एक डायलॉग रखा। हैरानी की बात है कि लगभग 300 सीटों वाले सभागार में 400 मुसलमान उपस्थित थे। मुसलमानों में बेचैनी तो है, वे भी बदलाव चाहते हैं। एक सच्चाई तो यह है कि आज जितनी भी पार्टियों में मुस्लिम नेता हैं, वे अपनी रोटियां सेंक रहे हैं।
भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी कहा जाता है, लेकिन इस पार्टी में भी कई नेताओं ने मुसलमानों के बारे में कभी कुछ बुरा नहीं कहा। राजग की सरकार के समय अल्पसंख्यकों के लिए कई अच्छे काम हुए थे। आज मदरसों के छात्र बड़े-बड़े बैंकों, प्रकाशन गृहों, समाचार पत्रों आदि में कार्यरत हैं, जिसका पूरा श्रेय राजग सरकार के समय मानव संसाधन विकास मंत्री रहे मुरली मनोहर जोशी को जाता है। जरूरत है कि अब अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक होने के खांचे से अलग हटकर विकास के बारे में सोचा जाए। इस लेखक को खेद है कि अब यह कांग्रेस वह कांग्रेस नहीं रही कि जिसमें मौलाना आजाद मंत्रालय की सारी चिçटयां उर्दू में लिखा करते थे। उर्दू का तो अब इस सरकार के समय बंटाधार ही हो गया है।

फिरोज बख्त अहमद
वरिष्ठ स्तंभकार, शिक्षाविद एवं मौलाना आजाद के पौत्र

साभार : patrika.com

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=2348

Posted by on Jun 15 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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