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समाजवाद के सच्चे नायक को सलाम

“हिंदुस्तान की राजनीति में तब सफाई और भलाई आएगी, जब पार्टी के खराब काम की निंदा उसी पार्टी के लोग करेंगे” इस बात को मुखर तरीके से जनमानस के सामने रखने वाले डॉ. राममनोहर लोहिया की शनिवार को 46 वीं पुण्यतिथि है।

आज देश में समाजवाद के साथ क्या हो रहा है, तस्वीर सबके सामने है। लोहिया की अंगुली पकड़कर राजनीति में कदम रखने वाले मुलायम सिंह यादव ने समाजवाद के साथ क्या खेल किया है और कर रहे हैं, हकीकत मुल्क के सामने है और यह भी गजब का संयोग है कि लोहिया की पुण्यतिथि से ठीक एक दिन पहले राजा भैया को फिर से मंत्री पद का ताज पहनाकर शिष्य मुलायम गुरू (डॉ. राममनोहर लोहिया) को कैसी श्रंद्धाजलि देना चाहते हैं?

संघर्ष से निकला समाजवाद

23 मार्च,1910 को उत्तरप्रदेश के फैजाबाद जिले (वर्तान में अंबेड़कर नगर) के अकबरपुर नामक स्थान पर जन्मे लोहिया ने 10 साल की उम्र में अगस्त 1920 में स्कूल के बच्चों के लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की मौत के विरोध में हड़ताल की थी। कॉलेज के दिनों से ही खादी पहनने वाले लोहिया ने 1928 में छात्रों को एकजुट करके साइमन कमीशन का विरोध किया था।

Dr. Rammanohar Lohi

Dr. Rammanohar Lohi

वर्ष 1930 में पढ़ाई के लिए इंग्लैड चले गए और फिर यहां से बर्लिन का रूख किया। लीग ऑफ नेशन्स में भगत सिंह को फांसी दिए जाने का सीटी बजाकर लोहिया ने विरोध किया। 1932 में “नमक सत्याग्रह” विषय पर शोध पूरा करके लोहिया ने बर्लिन विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की ।

1933 में मद्रास के रास्ते भारत पहुंचकर लोहिया ने देश की राजनीति में समाजवाद को जगह देने के लिए सक्रियता बढ़ाई और फिर बाद में समाजवादी पार्टी का गठन भी किया। भूमिगत रहकर भारत छोड़ो आंदोलन, गोवा मुक्ति आंदोलन में बड़ी भूमिका अदा की और हिंदू- मुस्लिम भाईचारे बढ़ाने के लिए कई सभाओं का आयोजन भी किया।

अंग्रेजों की खिलाफत

देश को आजाद कराने वाले तमाम आंदोलनों में हिस्सा लेने वाले लोहिया ने अंग्रेजों का खुलकर विरोध किया, इसके लिए उन्हें जेल में रहकर कष्ट भी सहने पड़े।

देश के विभाजन पर लोहिया की समझ

भारत के बंटवारे से लोहिया बहुत दुखी थे, भारत- पाकिस्तान के विभाजन के रहस्यों को लोहिया ने अपनी पुस्तक “गिल्टी मैन एंड इंडियाज पार्टीशन”(भारत विभाजन के गुनहगार) में विस्तार से लिखा है , लेकिन उस समय की सत्तारूढ़ सरकार ने एक विपक्षी नेता की संज्ञा देकर लोहिया को दरकिनार कर दिया था।

सिद्धातों की राजनीति

भूखे, नंगे और गरीबों के हक की लड़ाई लड़ने वाले लोहिया राजनीति के कीचड़ में भी सिद्धातों के रास्ते पर चलकर सत्ता से लड़ाई लड़ने वाले 12 अक्टूबर, 1967 को दिल्ली में अपने प्राण त्याग दिए।

समाजवादी आंदोलन के पथ प्रदर्शक, आजाद भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारी लोहिया संसदीय राजनीति और सांगठनिक क्षमता के अगाध सिंह थे, संसदीय भागीदारी शुरू होने से पहले उन्होंने सियासत में अपनी जगह मजबूत कर ली और उसी का नतीजा है कि 13 अगस्त,1963 को उत्तरप्रदेश के फर्रूखआबाद से लोकसभा सीट से जब चुनाव जीतकर संसद पहुंचे, तो पूरे सदन ने खडे होकर स्वागत किया था।

मौजूदा दौर की राजनीति में विपक्ष की मुखर और सक्रिय भूमिका बहुत कम दिखाई देती है, लेकिन , उस समय लोहिया खुद के बूते सत्ता के मुखर विरोधी रहे। भारतीय समाज में व्याप्त असमानता की गहरी खाई को पाटने वाले लोहिया ने समता और संपन्नता के इरादे से समाजवाद का झंड़ा उस दौर में उठाया जब कांग्रेस में धुर दक्षिणपंथी खेमा हावी था और जो किसी नए सिद्धांत को अपनाने के लिए तैयार नहीं था। जन्म से विद्रोही तेवर वाले लोहिया कांग्रेस को चुनौती देते रहे।

पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार को राष्ट्रीय शर्म की सरकार कहने वाले लोहिया के पास भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी वर्तमान राजनीति और राजनेताओं से कुछ कहने के लिए आज शायद ही कोई शब्द होते…।

Source : patrika.com

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=3505

Posted by on Oct 12 2013. Filed under खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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