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दुग्धामृत!

दुग्धामृत!

हमारे जैसे कितने देश होंगे, जहां देवता का दुग्धाभिषेक किया जाता है। सागर मंथन से प्राप्त अमृत को तो हमने नहीं चखा, किन्तु दुग्धामृत का पान तो लगभग पंचेन्द्रिय प्राणी-मानव-पशु-देव-गंधर्व आदि कर ही लेते हैं। हम मनुष्यों के लिए मां के दूध से बड़ा अमृत नहीं है। मां का दूध ही व्यक्ति की लज्जा बनकर हीन कर्मो से रोकता है।

शत्रु भी यदि ललकारता है तो व्यक्ति को नहीं, उसकी मां के दूध को ललकारता है। मां के बाद गाय का दूध श्रेष्ठ माना गया है। गौ का अर्थ विद्युत होता है। सविता को विद्युत कहा जाता है, जिसकी उत्पत्ति परमेष्ठी लोक में बताई गई है। अत: परमेष्ठी लोक ही गोलोक है, जिसके स्वामी विष्णु हैं। कृष्ण विष्णु के ही अवतार हैं। तब गौ में विद्युत शक्ति (जीवनदायिनी) का भण्डार है। गाय और भैंस के बछड़े एवं पाडे को देखकर इस अन्तर का अनुमान लगाया जा सकता है।

दूध हमारी जीवन शैली का अभिन्न अंग है। स्तनपान तथा उसके बाद गौ दुग्ध हमारे पोषण का बड़ा आधार रहा है। बच्चों के लिए प्रात:, बड़ों के लिए रात्रि को दूध पीने की अनिवार्यता कही गई है। भारत में एक युग ऎसा भी रहा है, जहां गायें मुद्रा की तरह काम में ली जाती थीं। धन के स्थान पर गायें दान की जाती थीं। आज समय की बलिहारी ही कहिए कि वे ही गायें काटने को भेजी जाती हैं। गाय का दूध, मां के दूध की तरह मृत्यु की ओर धकेलता जान पड़ता है। शास्त्र कहते हैं कि खान-पान पूर्ण रूप से भूगोल पर आधारित होना चाहिए। गायें भी स्थानीय नस्ल की ही होनी चाहिए। अनाज-फल-सब्जियां भी स्थानीय।

समय कितना बदला। आदमी कितना बदला। उसका लोभ और स्वार्थ कितना बढ़ गया। जैसे फल, अनाज की नई किस्में तैयार की गई, पैदावार अधिक बढ़ाने के लिए, उसी प्रकार गायों की भी नई नस्लें तैयार कीं। आज फल भी और गायें भी विदेशी आ रही हैं। थारपारकर, कांकरेज, राठी का स्थान जर्सी और होल्सटीन ले रही है, जिनका दूध निकालने में हाथ दुखने लगते हैं।

गायों का चारा, बांटा (ग्वार, बिनौले, तिल की खली) जमकर कीटनाशकों से भरपूर रहता है। इनकी भी अनेक खाद्य सामग्री रासायनिक खाद, कृत्रिम रंग, प्रिजर्वेटर के साथ कारखानों में तैयार हो रहे हैं। उन्नत बीज जैसे ही उर्वरता में कमजोर होता है। रसायनों (कृत्रिम) का प्रयोग उन्हें और निर्बल बनाता है। अनाज की तरह दूध में भी कीटनाशक के साथ सिंथेटिक सामग्री पेट में जाती है।

आज तो दूध ही सिंथेटिक बनने लग गया है। हमारा शरीर तो प्राकृतिक पदार्थो को ही पचा सकता है। सिंथेटिक सामग्री को तुरन्त बाहर फेंकने में लग जाता है। शरीर में जब तक शक्ति रहती है, वह उसे बाहर फेंक देगा। जैसे-जैसे शरीर कमजोर होगा कुछ सामग्री भीतर रूकने लगेगी। वही समय के साथ अन्य पदार्थो से जुड़ कर बड़ी हो जाती है। उसके चारों ओर छोटी-छोटी सामग्री चिपक जाती है। एक ओर यह कैंसर का रूप ले लेती है, दूसरी ओर सूचना तंत्र में अवरोध पैदा करती है।

आज तो दूध के अन्य उत्पाद-मक्खन, चीज, चॉकलेट आदि सभी में प्रिजर्वेटर होता है। खाद के लिए भी अनेक रंग-गंध आदि मिलाते हैं। क्या उनसे दूध या इसके उत्पाद में होने वाली रासायनिक क्रियाएं रूक जाएंगी? हमें पता नहीं लगेगा, बस। यह सारे कृत्रिम पदार्थ उसी “ग्रोथ” या गांठ पर चिपकते जाते हैं। यह कैंसर दूध का आधुनिक अवतार कहा जा सकता है। भला हो खाद्य निरीक्षकों का जिन्होंने इन उत्पादकों को खुली छूट दे रखी है। कुछ हत्याएं इनके खातों में भी दलाली के रूप में चढ़ती होंगी।

परम्परागत जीवन शैली में दूध के स्वरूप निश्चित थे। गाय, भैंस और बकरी का ताजा दूध! व्यक्ति पशु पालक के जाता था, दूध ले आता था। आज पशु पालक शहर में रह ही नहीं पाता। समय के साथ शहर फैलता जाता है। डेयरियां दूर से दूर जाती रहती हैं। शुद्ध दूध अब नीतिगत रूप से वर्जित हो गया मानो। सारे विकल्प बंद हो गए।

अब न गाय का दूध किसी बीमार के लिए, न भैंस का दूध किसी कमजोर के लिए। न ही ताजा दूध अभागी जनता के लिए। सब कुछ गढढ्-मढढ्! तरह-तरह का दूध, एक थैली में, मिक्स वेजीटेबल की तरह। एकदम ठण्डा, इसी से निकली क्रीम, बटर ऑयल! पूरी तरह पाशच्योराइज्ड अथवा पश्चिमी कृत? घर तक पहंुचते-पहुंचते कितने दिन पुराना हो जाएगा। उस पर “एक्सपायरी” का दिन पुराना होगा 15 दिन आगे का। गर्व की बातें हैं। 14 दिन तो दूध लाने की छुट्टी। कौन उठेगा जल्दी! इसी में अब मिलने लगा पाउडर का दूध, जो कभी स्कूलों में मुफ्त बांटा जाता था।

ठण्डे देशों में ठण्डा करने के लिए 8-10 डिग्री का ही तापमान घटाना पड़ता है। हमारे यहां 40 डिग्री से शून्य तक दबाव बनाना पड़ता है। इस प्रक्रिया के अध्ययन की आवश्यकता है। ताजा दूध तथा इस ठण्डे दूध में बहुत अन्तर है। ठण्डे दूध को पीते ही शरीर की ऊर्जा उसे 37 डिग्री पर लाने में जुट जाएगी। तब वह ऊर्जा पाचन क्रिया अथवा रोग से लड़ने के लिए उपलब्ध नहीं होगी। दूध में उपलब्ध कीटनाशकों से कैसे लड़ पाएगी? जहां शरीर अन्न कीटनाशक से युक्त हो, वहां दूध के कीटनाशक आग में घी ही डालेंगे। शरीर थक जाएगा, इनसे लड़ते-लड़ते!

आज दूध के साथ-साथ बटर ऑयल भी खाने लायक नहीं है। यह भी ठण्डे दूध का उत्पाद है। पश्चिमी देशों के सभी शोध परिणाम इस घी को हानिकारक बताते हैं। इसी आधार डॉक्टर हमारे घी को भी खाने से रोकने लग गए। हमारे यहां दही को बिलोया जाता है। हमारा मक्खन अलग उत्पाद है। बटर ऑयल नहीं है। कृष्ण जी का पूरा बचपन इसी मक्खन को चुराने में बीता था।

इतना बड़ा सन्देश इस देश के दर्शन में मक्खन के महत्व पर और बटर ऑयल से मुकाबला? दोनों का टेस्ट तो कराकर देखें! नकल करने में क्या जोर आता है। क्या कोई रोगों की रोकथाम के लिए कार्य करता है? इलाज करने से तो कारखाने चलते हैं। कोई यह नहीं बताता कि इलाज के बाद भी लोग कैंसर से मर क्यों रहे हैं। पोल खुल जाएगी तो कई कीटनाशक, कई दवाईयां, रासायनिक खाद आदि जीवन से बाहर हो जाएंगे। हमारा दूग्धपादक भी आज खुश है कि रोज कमाओ, रोज पीओ। जिसको मरना है, उसका भाग्य। सरकारों का वास्ता नहीं लोगों से।

गुलाब कोठारी जी 

http://patrika.com/article.aspx?id=42164

gulab ji

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Posted by on May 14 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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