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इलेक्ट्रॉनिक्स क्रांति को तरसता भारत

इलेक्ट्रॉनिक्स क्रांति को तरसता भारत

वित्त मंत्री ने इस वर्ष के बजट के साठवें अनुच्छेद में अर्धचालक वेफर निर्माण को प्रोत्साहन देने की बात कही| उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में अर्धचालक वेफर की महत्ता को पहचाना| टेलीविज़न, मोबाइल, कंप्यूटर से लेकर औद्योगिक मशीनों तक या सामरिक उपकरणों टैंक से लेकर राकेट विज्ञान तक सब में इलेक्ट्रॉनिक्स यंत्रो का प्रयोग होता है| इन सभी उपकरणों में न्यूनतम मौलिक ईकाई होती है इंटीग्रेटेड सर्किट(ICICCIC)| ये आईसी बनाने में अर्धचालक के बहुत ही महीन वेफर का प्रयोग होता है| वेफर बनता तो मिट्टी से है लेकिन दुनिया की कठिनतम तकनीकों में से एक है| वित्त मंत्री ने इसी को भारत में बनाने के लिया कहा| लेकिन चालीस साल से कहा जा रहा है| किसी देश के विकास में अर्धचालकों की विशेष भूमिका है| कहा जाता है कि 1970 तक भारत की तरह ही ताइवान, कोरिया, सिंगापुर एंव हांगकांग तीसरी दुनिया के गरीब देश थे| आज यह चारों एशियाई देश विकसित हैं| लेकिन एशियाई भारत अभी भी गरीब ही है| इन चारों देशों ने इसी अर्धचालक के उत्पादन को पकड़ने के साथ ही गरीबी छोड़ने की राह पकड़ ली| हम आज भी अर्धचालक वेफर उत्पादन के लिए अगल बगल झाँक रहें हैं|

कोरिया में शिन कुक-ह्वान ने कैबिनेट मंत्री और औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स सोसाइटी के निदेशक रहते कुछ साहसी कदम उठाए| 1980 में दस वर्षीय योजना बनायीं गयी| इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों को चिन्हित किया गया| उपकरणों के साथ साथ अन्य घटकों पर भी काम शुरू किया गया| पहले बाहर से आईसी मंगवाकर काम शुरू किया गया| और जल्द ही मौलिक ईकाई आईसी उत्पादन पर भी पहुंचे| बाज़ार को देखते हुए मेमोरी चिप्स में निवेश के लिए बडे कोरियाई औद्योगिक समूहों को विश्वास में लिया गया|| हुंडई व सैमसंग समूहों ने इलेक्ट्रॉनिक्स में निवेश किया| फल आज सबके सामने है| लेकिन हमने भारत में आजतक स्थापित औद्योगिक समूहों को पूरे जोर के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स में निवेश करते नहीं देखा| अमेरिका में कार्यरत कोरियाई विशेषज्ञों की सहायता ली गई| शिन कुक-ह्वान का मानना था कि इलेक्ट्रॉनिक्स स्वावलंबन के बिना सामरिक कौशल भी संभव नही है| ताइवान में इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों के घटक जापान से आयत कर केवल असैम्बल ही किए जाते था| सरकार ने नीति बनाई कि केवल ताइवान में उत्पादित उपकरण ही प्रयोग किये जायेंगे| इस योजना ने आग में घी का काम किया| जापानी कंपनियों को कारखाने ताइवान में लगाने के लिए मजबूर होना पडा| ताइवान की समानुक्रम ईकाईयाँ कारखानों में बदल गयी| सरक्षणवाद सफल हुआ| 1990 आते आते ताइवान में आठ आईसी उत्पादक समूह विकसित हुए| ख़ास बात यह थी की इनमें से अधिकतर स्थानीय थे| अपने यहाँ आज तक स्थानीय तो क्या कोई विदेशी आईसी उत्पादन केंद्र भी नहीं बना|

 

क्या स्वदेशी वेफर उत्पादन कर हमें कोई प्रतियोगिता जीतनी है? वेफर निर्माण के पीछे क्यों पडे हैं? हम भारतीयों की कुछ ज़रूरतें हैं| अनाज की ज़रूरत है तो अनाज उत्पादन में स्वावलंबन लाया गया| ताकि खाने के लिए बाहर न देखना पडे| लेकिन अब फ़ोन करने के लिए, गाना सुनने के लिए, ईमेल करने के  लिए और यहां तक की हमारी सेनाओं को भी इलेक्ट्रॉनिक्स मांग पूरी करने के लिए विदेशों की ऑर ताकना पडता है| यह केवल स्वाभिमान तक ही सीमित नहीं है| इस वर्ष $$ 33 बिलियन (अठारह हज़ार करोड़ रुपये) हमें अपनी इलेक्ट्रॉनिक्स ज़रूरतें पूरी करने के लिए विदेशों को देना पडेगा| 2020 तक यह आंकड़ा $ 400 बिलियन तक पहुंच जाएगा| यह तेल के आयत से भी ज्यादा होगा| हम और गरीब क्यों न होते जाएं? अभी गरीबी मिटाने के लिए, रोज़गार के लिए, आयात का बिल कम करेने के लिए, चिकित्सा सुविधा के लिए, सामरिक कौशल के लिए, टेलिकॉम क्षेत्र का संतृप्तिकरण के निवारण के लिए, आईटी के और विकास के लिए या यूं कहें खुशहाली के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स अभिन्यात्रिकी को मजबूत करने की ज़रूरत है|  ऐसे ही हम तीसरी दुनिया के बाज़ार से निकल कर एक विकसित देश कहला सकते हैं|

 

भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स से सौतेला व्यवहार किया है, ऐसा भी नहीं है| चाहे भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड की नींव डालना हो या सेमीकंडक्टर काम्प्लेक्स लिमिटेड खड़ा करना| कोशिश तो की गयी है| इन चार एशियाई देशों को देखें तो 1980 में ये देश भी इलेक्ट्रॉनिक्स घटक आयत कर केवल असैम्ब्लिंग ही करते थे| वहां की सरकारों ने स्थानीय औद्योगिक समूहों को सरंक्षण दिया| आधारभूत सरंचना स्थापित की| विदेशों से सीखने व मशीनरी आयात करने में भी गुरेज़ नहीं किया गया| यह लोग असेंबली से बाहर निकले और जल्द ही सम्पूर्ण निर्माण पा लिया| हम 1980 में असैम्ब्लिंग करते थे तो आज भी अधिक से अधिक डिजाईन तक ही पहुंचे हैं| उत्पादन से बहुत दूर हैं| सेमीकंडक्टर काम्प्लेक्स आईसी उत्पादन के उद्देश्य से तो बना लेकिन योग्यता होने पर भी आज कहीं न कहीं इसरो या DRDO के लिए DRDOएप्लिकेशन स्पेसिफिक आईसी बनाने के लिए रह गया और अन्तरिक्ष विभाग के मातहत हो गया है| भारत सरकार ने एक वेफर उत्पादन केंद्र के लिए फैबसिटी स्थापित करने की पहल की| IBMIBM ने अरबों रुपये में ठेका जीता| लेकिन 2008 आते  आते हाथ खींच लिए और योजना निष्फल निकली| IBM का तकनीक न देने के पीछे कारण समझा जाता है कि उन्हें डर था यह आईसी निर्माण की तकनीक रक्षा विभाग भी प्रयोग कर सकता था| सेमइंडिया का ऐसा ही हाल रहा है| हैदराबाद में SEZ के नाम से ज़मीन तो लुटाई गयी लेकिन वहां आईसी उत्पादन का काम अभी तक नहीं शुरू हुआ| 1970 से चल रहे अर्धचालक वेफर, असेंबली या सेल फ़ोन आदि तकनीकी क्रांतियों का देश लाभ नहीं उठा पाया है| स्टीव संघी, चेयरमैन, माइक्रोचिप टेक्नोलॉजी के अनुसार दो कारणों से भारत इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर में सदा पिछड़ा रहा है|  एक तो लालफीताशाही मानते हैं| हार्डवेयर उत्पादन के लिए सरकार को आधारभूत सरंचना देनी पड़ती है| सरकार असफल रही| बहुत कारण हो सकते हैं| आयत-निर्यात के लिए अनुमोदन समय पर नहीं हो पाते| दूसरा कारण वो विदेशी निवेश की नीति का न होना मानते हैं| फिर भी इलेक्ट्रॉनिक्स में 1996 से FDI लागू है| IBM सरीखी कंपनियां भी विश्वास तोड़ चुकी हैं| तो उनका यह कारण इतना सार्थक नहीं लगता| कागज़ पर भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग विकास करता प्रतीत होता है| लेकिन यह केवल मांग के बढ़ने, इलेक्ट्रॉनिक्स घटकों के असैम्ब्लिंग व क्रय-विक्रय तक ही सीमित है|

 

फिर भी कोशिश जारी है| इस बजट में वेफर उत्पादन के लिए कुछ भी आयत करने पर कस्टम ड्यूटी शून्य कर दी गयी है| राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स पालिसी 2012 के अंतर्गत वेफर उत्पादन को विशेष प्रोत्साहन है| मेड इन इंडिया उपकरणों को प्राथमिकता दी जाएगी| आधारभूत सरंचनाए स्थापित की जाएंगी| विदेशी निवेश को बढावा दिया जाएगा| नीतियों में स्थिरता रखी जाएगी| दो अर्धचालक वेफर संश्लेषण प्लांट्स के लिए काम शुरू किया गया है| इसके लिए $ 5 बिलियन के निवेश की आवश्याकता है| अगर योजना सफल हुई तो 2020 तक वेफर प्लांट से अठाइस करोड़ भारतीयों को रोज़गार मिल सकेगा|

 

वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस ने 1900 से पहले ही बेतार रेडियो तरंगो की संचार के लिए व्यावहारिकता, अर्धचालक जंक्शन रिसीवर द्वारा सिद्ध की थी| यह बात अलग है कि प्रयोग के लिए प्रतिष्ठा व नोबेल पुरस्कार मार्कोनी ले गए| अर्धचालक जंक्शन के आविष्कार के लिए 50 वर्ष बाद बराटीन, शोकले व बार्डीन को नोबेल मिलता है| अगर भारत में यह सच पढाया जाता तो आज तक कितने ही इलेक्ट्रॉनिक्स विद्यार्थी इस से प्रेरणा लेकर विकास में योगदान दे सकते थे| अगर भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स  अभियंता अमेरिका जाकर धुंए उठा सकते हैं तो कम से कम भारत में चिंगारी तो उडा ही सकते हैं| हम अपने साधनों का उपयोग कर ही कहां पाएं हैं| भारत में श्रमशक्ति तो पहले से ही सस्ती है| वेफर उत्पादन के लिए विशेष आधारबूत सरंचना उपलब्ध होने से ज़रूर वरास्ता इलेक्ट्रॉनिक्स अभियांत्रिकी, भारत विकास कर सकता है|

 

लेखक :  अनुराग भारद्वाज

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Posted by on May 13 2013. Filed under इतिहास, मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

1 Comment for “इलेक्ट्रॉनिक्स क्रांति को तरसता भारत”

  1. अनुराग भारद्वाज

    बिल्कुल ठीक वेद प्रकाश जी| स्वावलंबन के लिए जरुरी नहीं कि नक़ल की जाये| शोध करके नए तरीके से भी तकनीक विकसित के जानी चाहिए|
    जैसे अपने पास यूरेनियम की बजाये थोरियम के भण्डार हैं तो अपने यहां थोरियम से परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लिए अच्छे शोध चल रहे हैं| बाकी दुनिया में ऐसा कोई रिएक्टर नहीं तैयार किया जा रहा|
    इसी प्रकार इलेक्ट्रॉनिक्स में भी जो साधन अपने पास हीन उन पर शोध कर तकनीक विकसित की जानी चाहिए|

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