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`नेहरू-गाँधी के छद्म वारिस, और लोगों के कुकर्म?’

* जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गाँधी ने तो अपने बेटा-बेटी के आपस में रिश्ते नहीं किए तब कहाँ से आ धमका नेहरू-गाँधी खानदान और उनके जॉइंट वारिस?जिनका गाँधी जी से कोई वास्ता नहीं है, वे गाँधी के वंशज कैसे बन गये?

* जवाहरलाल नेहरू राहुल-वरुण की दादी के पिता जी थे, यानि तीसरी पीढ़ी में. तब ये नेहरू के वंशज कैसे बन गये?

* क्या नेहरू ने दूर की सोचकर अपने दामाद फ़िरोज़ ख़ान को गाँधी नाम दिलाकर विधि-विधान के विरुद्ध कार्य किया था?

* पैदा होने के बाद आदमी का धर्म तो बदला जा सकता है, लेकिन जाति बदले का अधिकार तो विधि के हाथ भी नहीं है.

* कश्मीरी कौल ब्राहमण की बेटी इंदिरा और मुस्लिम फ़िरोज़ ख़ान की संतान गुजरात के गाँधी बनिये किस विधि से हो सकती है?

* इस देश के पढ़े लिखे लोग ग़लत बात का विरोध क्यों नहीं करते? इस नामकरण से इस देश का बहुत कुछ बँधा है, बर्बाद हो रहा है, और बर्बाद हो चुका है….?

* अगर यह छद्म नामकरण रोक दिया जाता तो आज देश की तस्वीर ही कुछ और होती. चुनाव में नेहरू-गाँधी के वंशज की झोक में ठप्पा मारने वालों का रुख़ ही कुछ और होता और 5-7% वोट का डेवियेशन इस देश की तकदीर बदल देता.

* पढ़े कथित गाँधी-नेहरू के वंशज की असलियत, जिससे लम्बे समय से इस देश का वोटर्स धोखा में हैं:

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इस देश की कुछ जनता को पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा फिरोज खान का जन्म और मृत्यु दिवस मनाते देखा है. राजीव और संजय का भी मृत्यु दिवस कुछ पोलिटिकल/ सरकारी/ जनता द्वारा मनाया जाता है. मज़े की बात देखिए कि कभी फ़िरोज़ ख़ान H/o इंदिरा देवी का जन्म या मृत्यु दिवस मनाते नहीं देखा है, क्यों?

देवी इंदिरा के पति यानी कि राजीव व संजय के पिता का नाम लेवा कोई क्यों नहीं रहा, यानी कि जो हैं वे उनके ये पावन दिन क्यों नहीं मनाते हैं? क्यों नहीं उनकी कब्र पर उनके वंशज अमुक दिन माला या फूल चढ़ाने जाते हैं? क्या फ़िरोज़ ख़ान का इंदिरा से शादी करके दो बच्चे पैदा करने का ही कांट्रॅक्ट था? ये सब ज्वलंत प्रश्न हैं.

दस्तावेज़ों और नेट पर उपलब्ध विवरण के अनुसार फ़िरोज़ ख़ान एक मुस्लिम पिता और घंडी गोत्र की पारसी महिला की संतान थे. देवी इंदिरा और फ़िरोज़ ख़ान ने प्रेम विवाह किया था. नेहरू अपना वंश चलाने के लिए अपने दो नातियों राजीव और संजय में से एक को गोद ले सकते थे, लेकिन उस दशा में वह शख्स नेहरू कहलाता. अगर नेहरू ने फ़िरोज़ ख़ान को घर जमाई भी रख लिया होता तो भी उसके बच्चे नेहरू हो गये होते. यानी कि नेहरू ने अपनी इकलौती बेटी इंदिरा का विवाह कर दिया था, लेकिन तत्पश्चात किसी को गोद नहीं लिया था. इस प्रकार जादायद भले ही इंदिरा को मिले लेकिन खानदानी वारिस होने का हक उसे नहीं मिल सकता है. इस प्रकार जवाहरलाल नेहरू का खानदान उनकी मृत्यु के साथ ही ख़त्म हो गया था. इंदिरा-फ़िरोज़ की संतान फ़िरोज़ ख़ान की वंशज हुई न कि नेहरु की.

फ़िरोज़ ख़ान क्यों और कैसे गाँधी बन गये, यह एक रोचक बात है. अगर किसी की माँ उसके बाप को तलाक़ देकर खुद बच्चे की परवरिश करे और उसे अपने परिवार का नाम दे तो भी उस दशा में फ़िरोज़ ख़ान, फ़िरोज़ ख़ान घंडी हो सकते थे. हम नहीं जानते कि फ़िरोज़ ख़ान के साथ ऐसा कुछ हुआ था या नहीं?

रही गाँधी जी द्वारा फ़िरोज़ ख़ान को गोद लेने की बात. यह भी सुना है कि सेक्युलर नेहरू मुस्लिम फ़िरोज़ ख़ान से इंदिरा का विवाह करने को तैयार नहीं थे, जबकि वह पहले ही निकाह कर चुकी थी. ऐसी दशा में गाँधी जी ने कहा था कि वे फ़िरोज़ ख़ान को गोद लेते हैं. गोद लेना कोई गुड्डे-गुड़िया का खेल नहीं है. गोद लेने की एक प्रक्रिया है, एक एक विधि-विधान है. एक उम्र है. यही नहीं गोद लेने के लिए जाति आधारित क़ानून भी थे. गाँधी जी कोई खुदा नहीं थे कि वे जब जो चाहे कर लेते. और हैं. तब गाँधी जी ने अगर यह बात की भी तो यह बड़ी ही हास्यस्पद घटना है, और एक बेरिस्टर से ऐसी मूर्खता पूर्ण बात की कल्पना नहीं की जा सकती है.

दादी के पिता जी का वारिस दादी का पोता हो, शायद यह अजूबा दुनिया में भारत में ही मान्य हो सकता है. अधिकतर लोगों को तो अपनी दादी के पिता जी का भी नाम मालूम न होगा. दादी के पिता जी का वारिस दादी हो सकती है या दादी का पुत्र, भला पोता काहे और कैसे वारिस हो जाएगा? और वह भी बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के.

इनके नेहरु के वारिस होने की ही नहीं कुछ सिरफिरे लोग इनके गाँधी के वारिस होने की भी बात करते हैं. वह यह नहीं बताते कि ये लोग कौनसे गाँधी के वारिस हैं? इन्हें उस गाँधी का पूरा नाम लेना चाहिए. यह देश तो गाँधी का मतलब मोहनदास कर्मचंद गाँधी मानता है. अगर फ़िरोज़ ख़ान उर्फ छद्म गाँधी की बात कर रहे हैं तो उसका पूरा नाम क्यों नहीं लेते, कभी उसका जन्म या मृत्यु दिवस क्यों नहीं मनाते? कभी उसकी कब्र पर झाड़पूंछकर फूल पत्ते क्यों नहीं धरते? और अगर महात्मा गाँधी जी के वारिस होने की बात करते हैं तो गाँधी जी का अपना भरा पूरा परिवार है, वे दूसरों को वारिस क्यों बनाते? यह तो ऐसा हुआ जैसे कि खरगोश ऊँट का वारिस होने की ताल ठोक रिया हो.

गाँधी जी यह जानते थे कि वे मास के लीडर हैं. उनके बाद उनके नाम का दुरुपयोग हो सकता है, जो कि देश हित में कतई न होगा. वे जिस देश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे ते, क्या वे किसी को उस देश के साथ धोखा करने का औजार इस तरह से थमा देते, शायद कतई नहीं, बल्कि गाँधी जी ने अन्य किसी को ऐसी इजाजत कतई न दी होगी.

तब प्रश्न उठता है कि फ़िरोज़ ख़ान, फ़िरोज़ गाँधी कैसे हो गये, और उन्हें इस उपनाम जो की गुजरात के बनिक वर्ग में प्रयुक्त होने वाले गाँधी के उपयोग की इजाज़त किसने और क्यों दी? फ़िरोज़ ख़ान को अपने सही नाम पर क्यों आपत्ति हुई, और क्यों ही उसे नाम बदलने की ज़रूरत पड़ी? देश के बहुत से लोग तो आज भी यह समझते हैं कि यह कथित गाँधी परिवार महात्मा गाँधी जी से रिलेटेड है, जबकि ऐसा कतई नहीं है. कश्मीरी कौल ब्राहमण की बेटी इंदिरा मुस्लिम फ़िरोज़ ख़ान से विवाह करके गाँधी बनिया कैसे पैदा कर सकती थी? इस देश के पढ़े लिखे तबके को यह सोचना चाहिए.

राहुल के दादा फ़िरोज़ ख़ान थे, और दादी कश्मीरी कौल ब्राहमण की बेटी थी, और वह भी तीन पीढ़ी पहले. राहुल एक इटलियन लेडी और राजीव वल्द फ़िरोज़ ख़ान की औलाद है, तब वह नेहरू-गाँधी परिवार का वारिश किस विधि से हो गया, इस देश के प्रबुद्ध जन इस पर विचार करे. यही नहीं कथित रूप से भी राहुल ही नेहरू-गाँधी परिवार का वारिस क्यों हुआ, मेनका-संजय का बेटा वरुण भी वारिस क्यों नहीं हुआ?

क्या इस नामकरण की साजिश में गाँधी जी और नेहरू भी शामिल थे? और अगर ऐसा था तो गाँधी जी ने इस देश के साथ बहुत बड़ा धोखा किया है. धर्म परिवर्तन हो सकता है लेकिन दुनिया की कोई विधि-विधान जाति परिवर्तन नहीं कर सकता है, यानी कि गाँधी जी फ़िरोज़ ख़ान को गुजराती बनिया गाँधी में परिवर्तित नहीं कर सकते थे/ हैं, किसी प्रौढ़ फ़िरोज़ ख़ान को गोद नहीं ले सकते थे. अपना भरा पूरा परिवार होते हुए भी अपना नाम किसी प्रौढ़ को दे देने का अधिकार गाँधी जी को भी प्रदत्त नहीं था.

दस्तावेज़ों के अनुसार फ़िरोज़ ख़ान का दाह संस्कार नहीं हुआ था, और उनकी कब्र इलाहाबाद के पारसी कब्रिस्तान में हैं. दूसरों की कब्र/ समाधियों पर माला टांगने वाले लोग क्यों नहीं अपने पूर्वज फ़िरोज़ ख़ान की कब्र की सुध लेते हैं? शायद इसलिए कि कहीं लोग असलियत न जान जाएँ.

जो लोग शासन की समझ रखते हैं वें भी जानते होंगे कि सेना प्रत्यक्ष रूप से ही युद्ध में हार जीत के निर्णय में भागीदार होती है असली जीत का भागीदार तो कोई और ही होता है. एक चार कमरे के मकान में कोई अंजान व्यक्ति फ्रीली नहीं घूम सकता. तब अरब़ अक्रांता/ अँग्रेज़ों ने कैसे इस इतने बड़े मुल्क पर फ़तह कर उसे सैकड़ों वर्ष तक गुलाम बनाए रखा? रावण जैसा विद्याधर, योद्धा क्या यूँ ही राम के हाथों हार गया, और मारा गया. जी नहीं सच यह है कि `घर का भेदी लंका ढ़ावे’ हुआ है. जीत के लिए श्रेय हमेशा सशक्त ख़ुफ़िया तंत्र के सिर होता है. हार के प्रमुख कारणों में से एक कारण, पराजित देश के देशद्रोही/ समाजद्रोही भेदियों की नकारात्मक भूमिका होती है. अगर ये देशद्रोही/ समाजद्रोही भेदिये विजयी सेना के ख़ुफ़िया तंत्र को अपने देश के राज न दें तो स्थिति ही कुछ और हो.

आज इस देश में सोनिया क्या अपने बल पर अध्यक्ष बनी बैठी है? क्या उसमें इतना बूता है? तो उत्तर होगा कतई नहीं. यहाँ दो पहलू हैं एक तो यह प्रोपगॅंडा की राहुल नेहरू-गाँधी खानदान का वारिस, जैसे कि वरुण उनमें से किसी का कुछ न लगता हो. दूसरे वे कौंच के बीज इस कुकर्म में दोषी हैं जो इस देश की बर्बादी में विभीषण की भूमिका निभा रहे हैं, और सत्ता और संपत्ति के लालच में डूबे हैं. उन विभीषणों को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज भी विभीषण का नाम समाज में गाली समझा जाता हैं. वे अपने मन से अपने कुकर्मों का हिसाब लगाकर कभी ज़रूर देखे, और की तो छोड़िए उनकी आत्म ही अगर कभी जाग गयी तो उन्हें माफ़ न करेगी. किसी की आत्मा कभी जागे न जागे लेकिन मृत्यु के समय ज़रूर जागेगी, और उस समय उन्हें देश के समाज के साथ धोखा करने के पाप का बोध तो हो जाएगा, लेकिन तब प्रायशचित का न तो समय रहेगा, न ही शक्ति.

रे देश/ समाज के गद्दारों,
धन, वैभव साथ न जाएगा, तुम्हारे कुकर्म साथ जाएँगे. तुम्हारे दुष्कर्म उन लोगों जैसे ही हैं जिनके बूते पर यहाँ अंग्रेज और दूसरे विदेशी राज कर गये है/ करते हैं. आज भारत माँ की, यहाँ के जनमानस की दुर्दशा के तुम और तुम जैसे लोग ही दोषी हैं. इस देश को तुम जैसे लोगों ने ही गर्त में पहुँचाया है. जो अपनी मातृभूमि/ माँ का नहीं हो सकता, वह किसी का नहीं हो सकता है. निम्न पंक्तियाँ जरूर पढ़ें, और इन्हें गुनने का प्रयास करें हो सकता है समय रहते तुम्हें अपने कुकर्मों का बोध हो जाये:

जननी जनमभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

सुखस्य मूलं धर्म:
धर्मस्य मूलं अर्थ:
अर्थस्य मूलं वाणिज्य:
वानिजस्य मूलं स्वराज्य:
स्वराज्यस्य मूलं चारित्रं.

 

लेखक : जेपी

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=1306

Posted by on Jul 22 2012. Filed under मेरी बात, सच. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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