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शंकराचार्य के चार मठ

Four Mathas of Shankaracharya

 

द्वारका में स्थित शारदापीठ के जगद् गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती द्वारा हाल ही में साईं बाबा के बारे में की गई टिप्पणी के विवाद के बाद शंकराचार्य का पद चर्चा में है। बहुत से लोग जानना चाहते हैं कि ये शंकराचार्य कौन होते हैं और इनका महत्व क्या है। इनकी नियुक्ति कैसे होती है और ये क्या करते हैं। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अश्विनी शास्त्री :

प्राचीन भारतीय सनातन परम्परा के विकास और हिंदू धर्म के प्रचार व प्रसार में आदि शंकराचार्य का महान योगदान है। उन्होंने भारतीय सनातन परम्परा को पूरे देश में फैलाने के लिए भारत के चारों कोनों में चार शंकराचार्य मठों की स्थापना की थी। ईसा से पूर्व आठवीं शताब्दी में स्थापित किए गए ये चारों मठ आज भी चार शंकराचार्यों के नेतृत्व में सनातन परम्परा का प्रचार व प्रसार कर रहे हैं। आदि शंकराचार्य ने इन चारों मठों के अलावा पूरे देश में बारह ज्योतिर्लिंगों की भी स्थापना की थी। आदि शंकराचार्य को अद्वैत परम्परा का प्रवर्तक माना जाता है। उनका कहना था कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं। हमें अज्ञानता के कारण ही ये दोनों अलग-अलग प्रतीत होते हैं।

ये मठ गुरु-शिष्य परम्परा के निर्वहन का प्रमुख केंद्र हैं। पूरे भारत में सभी संन्यासी अलग-अलग मठ से जुड़े होते हैं। इन मठों में शिष्यों को संन्यास की दीक्षा दी जाती है। संन्यास लेने के बाद दीक्षित नाम के बाद एक विशेषण लगा दिया जाता है जिससे यह संकेत मिलता है कि यह संन्यासी किस मठ से है और वेद की किस परम्परा का वाहक है। सभी मठ अलग-अलग वेद के प्रचारक होते हैं और इनका एक विशेष महावाक्य होता है। मठों को पीठ भी कहा जाता है। आदि शंकराचार्य ने इन चारों मठों में अपने योग्यतम शिष्यों को मठाधीश बनाया था। यह परम्परा आज भी इन मठों में प्रचलित है। हर मठाधीश शंकराचार्य कहलाता है और अपने जीवनकाल में ही सबसे योग्य शिष्य को उत्तराधिकारी बना देता है।

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ
श्रृंगेरी मठ :
 यह मठ भारत के दक्षिण में रामेश्वरम् में स्थित है। इसके तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद सरस्वती, भारती, पुरी सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है, मठ के तहत ‘यजुर्वेद’ को रखा गया है। इसके पहले मठाधीश आचार्य सुरेश्वर थे। वर्तमान में स्वामी भारती कृष्णतीर्थ इसके 36वें मठाधीश हैं।

गोवर्द्धन मठ : गोवर्द्धन मठ भारत उड़ीसा के पुरी में है। गोवर्द्धन मठ के तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘आरण्य’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य है ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ और इस मठ के तहत ‘ऋगवेद’ को रखा गया है। इस मठ के पहले मठाधीश आदि शंकराचार्य के पहले शिष्य पद्मपाद हुए। वर्तमान में निश्चलानंद सरस्वती इस मठ के 145 वें मठाधीश हैं।

शारदा मठ : शारदा (कालिका) मठ गुजरात में द्वारकाधाम में है। इसके तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य है ‘तत्त्वमसि’ और इसमें ‘सामवेद’ को रखा गया है। शारदा मठ के पहले मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। हस्तामलक आदि शंकराचार्य के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे। वर्तमान में स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती इसके 79 वें मठाधीश हैं।

ज्योतिर्मठ : ज्योतिर्मठ उत्तराखण्ड के बद्रिकाश्रम में है। ज्योतिर्मठ के तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘गिरि’, ‘पर्वत’ और ‘सागर’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इसका महावाक्य ‘अयमात्मा ब्रह्म’ है। मठ के अंतर्गत अथर्ववेद को रखा गया है। इसके पहले मठाधीश आचार्य तोटक थे। वर्तमान में कृष्णबोधाश्रम इसके 44 वें मठाधीश हैं।

Source : http://navbharattimes.indiatimes.com

Posted by on Jul 6 2014. Filed under हिन्दुत्व. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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