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हिन्दू जनसंहार पर चुप रहे थे निक्सन

वॉशिंगटन। वर्ष 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता से पहले पाकिस्तानी सेना ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में सुनियोजित तरीके से हिन्दू समुदाय के जनसंहार को अंजाम दिया था और निक्सन प्रशासन ने इससे आंखें मूंदे रहीं। एक नई किताब में यह खुलासा किया गया है।

द ब्लड टेलीग्राम’ : निक्सन किसिंगर एंड ए फॉरगॉटन जेनोसाइड’ नामक इस किताब के लेखक गैरी जे. बास ने कहा कि हालांकि भारत सरकार इस बारे में जानती थी लेकिन उसने इसे ज्यादा तवज्जो देने के बजाय इसे बांग्लादेश में बंगाली समुदाय के खिलाफ जनसंहार की संज्ञा दी थी ताकि तत्कालीन जनसंघ के नेताओं इस बात को लेकर हाय-तौबा नहीं मचाएं।hindu-history-ijabai-and-young-shivaji

प्रिंसटन विश्वविद्यालय में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर बास कहते हैं कि इसे मूल रूप से हिन्दुओं की प्रताड़ना के रूप में सामने लाने के बजाए भारत ने इसे बंगालियों के विनाश के रूप में पेश करने पर ध्यान केंद्रित किया।

बास ने किताब में लिखा है कि रूस में भारत के राजदूत डीपी धर ने मॉस्को से पाकिस्तान की सेना पर हिन्दुओं को चुन-चुनकर उनकी हत्या करने की पूर्वनियोजित नीति बनाने का दोष लगाया था लेकिन उन्होंने लिखा है कि जनसंघ जैसे दक्षिणपंथी हिन्दू उग्र राष्ट्रवादी दल की उग्र प्रतिक्रिया के भय से हमने इस बात की पूरी कोशिश की कि यह मामला भारत में प्रचारित न हो। 

ढाका में तत्कालीन अमेरिकी कूटनीतिज्ञों ने विदेश मंत्रालय और व्हाइट हाउस दोनों को ही लिखा था कि यह हिन्दुओं के ‘जनसंहार’ से कम नहीं है। गौरतलब ै ि स जनसंहार में 30 लाख हिंदमारे ए थे।

बास ने कहा कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने यह तर्क दिया था कि देश में बंगालियों की संख्या बहुत ज्यादा होने के कारण चुनाव हार गए पाकिस्तानी जनरल उनकी (बंगालियों की) हत्याएं कर रहे हैं ताकि पूर्वी बंगाल में जनसंख्या में भारी कमी आ सके। और ये लोग पाकिस्तान में बहुसंख्यक न बने रह सकें। किताब कहती है कि चूंकि पाकिस्तानी सेना लगातार हिंदू समुदाय को अपना निशाना बना रही थी, ऐसे में भारतीय अधिकारी नहीं चाहते थे कि जन संघ पार्टी के हिंदू राष्ट्रवादी और ज्यादा भड़कें।

 

बास ने किताब में लिखा है, रूस में भारत के राजदूत डीपी धर ने मास्को से पाकिस्तान की सेना पर हिंदुओं को चुन-चुनकर उनकी हत्या करने की पूर्वनियोजित नीति बनाने का दोष लगाया था लेकिन उन्होंने लिखा है कि जनसंघ जैसे दक्षिणपंथी हिंदू उग्रराष्ट्रवादी दल की उग्र प्रतिक्रिया के भय से हमने इस बात की पूरी कोशिश करी कि यह मामला भारत में प्रचारित न हो। ढाका में तत्कालीन अमेरिकी कूटनीतिज्ञों ने विदेश मंत्रालय और व्हाइट हाउस दोनों को ही लिखा था कि यह हिंदुओं के जनसंहार से कम नहीं है।

 

किताब कहती है, दमन का नेतृत्व करने वाले सैन्य गर्वनर लेफ्टिनेंट जनरल टिक्का खान ने तर्क दिया था कि पूर्वी पाकिस्तान भारत की दासता का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि अवैध आवामी लीग हमारे उस देश के लिए तबाही ले आई होती, जिसे हमने मुस्लिमों के एक अलग देश के रूप में उपमहाद्वीप में से भारी बलिदानों के बाद हासिल किया है।

 

किताब में यह भी कहा गया कि चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ और चीफ ऑफ जनरल स्टाफ जैसे वरिष्ठ अधिकारियों को अक्सर यह मजाक करते हुए यह कहते सुना जाता था कि कितने हिंदू मारे गए बास ने लिखा, लेकिन ढाका में अमेरिकी काउंसल जनरल आर्चर ब्लड द्वारा इसे जनसंहार की भयावह संज्ञा दिए जाने का भी व्हाइट हाउस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

बास के अनुसार ब्लड ने सोचा था कि जो कुछ भी हिंदुओं के साथ हो रहा था, उसकी व्याख्या के लिए जनसंहार ही सही शब्द था। उन्होंने बताया था कि पाकिस्तानी सेना ने भारतीय और पाकिस्तानी हिंदुओं में कोई भी भेद नहीं किया था। दोनों के साथ ही दुश्मनों की तरह व्यवहार किया था। ब्लड ने लिखा, ये हिंदू विरोधी भावनाएं व्यापक रूप से फैली हुई थीं।

किताब के अनुसार, भारतीय सरकार का मानना था कि पाकिस्तान लाखों हिंदुओं को निकालकर बंगालियों की संख्या कम करना चाहती है ताकि वे पाकिस्तान में बहुमत में न रह सकें। इसके साथ ही पाकिस्तान चाहता था कि वह मासूम बंगाली मुस्लिमों को कथित रूप से भड़काने वाले हिंदुओं से छुटकारा पाकर आवामी लीग को एक राजनैतिक शक्ति बनने से रोके।

more info here : http://www.hinduhumanrights.info/the-hindu-genocide-that-hindus-and-the-world-forgot/

Posted by on Oct 16 2013. Filed under सच. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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