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हिन्दुत्व के शंकर स्वरूप आनंद

hindutva ke swaroop aanad

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हाल में कठिनतम प्रयासों से तैयार किये गए ‘हिंदू विश्वकोष’ का राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने विमोचन किया. इस अवसर पर बोलते हुए उन्होंने हिंदू मान्यताओं में वर्णित धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जैसे पुरुषार्थ चतुष्टय की सुन्दर व्याख्या तो की ही. इसके अलावा महात्मा गांधी से लेकर डा. राधाकृष्णन तक को उद्धृत करते हुए किसी विद्वान हिन्दू संत की तरह उन्होंने हिंदुत्व को परिभाषित किया लेकिन यह भी कहा उन्होंने कि हिंदुत्व, परिभाषा की नहीं बल्कि महसूस करने की चीज़ है. ऐसा कहते हुए शायद उनके मन में कबीर के दोहे ही रहे होंगे जब वे हिंदुत्व रूपी प्रेम का वर्णन करते हुए उसे गूंगे का शक्कर कहते थे जिसे खाइए और मुस्कान बिखेरिये.

निश्चय ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा परिभाषित हिंदुत्व नाम के इस जीवन पद्धति में विचार-विमर्श, सहमति-असहमति की काफी गुंजाइश है. शास्त्रार्थ की इस परंपरा ने भक्ति युग से लेकर आज तक के साहित्य को काफी समृद्ध किया है. सोचने-कहने की इसी परंपरा ने तो वेद-उपनिषद-पुराण जैसी चीज़ों को श्रुति और स्मृति में (सुनने और याद रखने) के माध्यम से शाश्त्राव्दियों तक समेटे रखा. तब तक उसे जिन्दा और कायम रखा जब तक कि लिपियों की खोज न कर ली गयी. उसके बाद छापाखाना आदि का निर्माण होने से आजतक तो खैर यह सारा साहित्य विश्व थाती बन ही चुका है.

लेकिन शास्त्रार्थ की महान परंपरा के बावजूद मुनियों ने इस पर काफी चिंतन किया है कि कब किस बात पर विमर्श की जाय. ऋषियों का हमेशा यह मानना था कि हर विमर्श किसी प्रयोजन के लिए होता है न कि बुद्धि विलास के लिए. अगर कुरुक्षेत्र के रण में खडा कोई अर्जुन मोहवश किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया हो तब तो हर तरह से उसका समाधान करना सारथी कृष्ण का दायित्व ज़रूर होता था लेकिन अनावश्यक कुतर्कों के साथ यज्ञ नष्ट करने की राक्षसी प्रवृत्ति का फिर ताकत से ही समाधान देते रहने की प्रथा तब भी थी. यानी किन मुद्दों पर विमर्श की जाय और किसे छोड़ दिया जाय इस पर भी मनीषियों ने काफी चिंतन किया है. हाल में शिरडी के साईं बाबा को पूजा जाय या नहीं ये विवाद भी उसी श्रेणी का है जिस पर ज्यादे विमर्श की गुंजाइश नहीं है. जैसा आइन्स्टाइन ने भी कहा है कि आस्था किसी तर्क का मुहताज नहीं होता तो हर भारतीय को अपनी-अपनी आस्थाओं के साथ तबतक रहने देने में कोई भी बुराई नहीं है जब तक कि उनकी आस्था कभी किसी अन्य की आस्था पर कुठाराघात नहीं करे. शिरडी के साईं बाबा अलग-अलग कालखंड में जन्में ऐसे ही गुरुओं में से एक थे जिनके अनुयाइयों को उनकी भक्ति से रोकना मुनासिब नहीं. हालांकि शंकराचार्य स्वरूपानंद का बयान जिन आशंकाओं के परिप्रेक्ष्य में है उसपर भी गौर किया जाना उचित ही होगा.

भारतीय वांगमय हमेशा अपने ‘गुरू’ को भगवान पर भी प्रमुखता देने का आदेश देते रहे हैं. अगर गोविन्द खड़े हों और गुरू भी तो पहले गुरु के पांव लागने की ही आज्ञा है. तुलसी ने भी कहा कि विरंचि और शंकर भी ‘सम’ हों तब भी आप बिना गुरु के भवनिधि नहीं तर सकते हैं. इसके अलावा भारतीय मनीषा हमेशा से भक्त को भगवान से ज्यादा तवज्जो देने की बात कहते रहे हैं. तो साईं बाबा को जो लोग भी गुरू या अच्छे भक्त के रूप में पूजते हों उनकी आस्था का सम्मान किया ही जाना चाहिए. देश भर में महात्माओं के सैकड़ों ऐसे समाधि मिलेंगे जहां पर हर बरस मेले जैसी स्थिति होती है. अनेक कथा-कहानियां उन समाधि स्थलों से जुड़े आपको सुनने को मिलेंगे जिनमें अंधों को आंख, निर्धन को माया, बाझन को पूत और कोढ़ी को काया आदि मिल गयी, ऐसी मान्यता है. ऐसी कथाएं अलग-अलग रूपों में आप सबने सुनी ही होगी. तो इस अर्थ में साईं भक्ति को गलत ठहराया जाना उचित नहीं लगता.

लेकिन..लेकिन ये भी सच है कि किसी भी भक्त या गुरु को ‘भगवान’ का दर्ज़ा अपने यहां कभी नहीं दिया गया. भक्त को भगवान से ज्यादा भले समझ लें आप लेकिन भगवान तो बस भक्तवत्सल ही होते आये हैं. इस मामले में सनातन धर्म इतना ज्यादा लोकतांत्रिक है कि भगवान के पिता  को भी भगवान नहीं मानता कभी,  न ही उनके बेटों को. ऐसा होता तो राम के पिता दशरथ या उनके पिता अज या उनके भी पिता रघु फिर आगे दिलीप, अंशुमन आदि को या फिर श्रीराम के बेटे लव-कुश भी भगवान मां लिया गया होता. जैसे खुद मुरलिया वाले ने अपना नाम यशोदानंदन, वसुदेव, नन्दकिशोर, देवकीसुत आदि रख कर अपने माताओं-पिताओं को सम्मान दिया हो लेकिन ‘भगवान’ उनमें से कोई मां-बाप-पुत्र आदि नहीं कहे गए. भारत भूमि पर एक से एक संत-ऋषि-मुनियों का प्राकट्य हुआ है. विश्वामित्र-वशिष्ठ आदि तो श्री राम के गुरु ही हुए हैं लेकिन फिर भी वे ऋषिगण कभी भगवान नहीं कहे गए, न ही उन्होंने खुद को भगवान कहा जाय, ऐसा कभी चाहा. वाल्मिकी जैसे ऋषि धरा पर ‘रामायण’ को उतारा वे भी ‘प्रभु’ नही हुए. वेदव्यास तो सम्पूर्ण महाभारत के जनक हैं, बावजूद उसके ‘भगवान’ तो वो माखनचोर ही कहा गया. जिस तरह भारतीय लोकतंत्र को हम कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका रूपी तें स्तंभों के रूप में जानते हैं वैसे ही हिंदू दर्शन भी ब्रम्हा, विष्णु और महेश के रूप में तीन स्तंभों की मान्यता है. इसी तरह उनका कार्य विभाजन भी किया गया है. यह धर्म भगवान के रूप में बस उन्हें ही मान्यता देता है पालनहार विष्णु के अवतार होकर इस धरा पर कुछ शर्तों के अधीन धर्म की पुनर्स्थापना के लिए आये हों. इसके अलावा खुद देवताओं को या उनके अवतारों को भी भगवान की संज्ञा नहीं दी गयी कभी.

जिस तरह लोकतांत्रिक पद्धति में सबके पास सबकुछ बन जाने का अवसर है, आप कुछ शर्तों के साथ इस देश के राष्ट्रपति तक बन सकते हैं, वैसे ही हिंदुत्व भी आपको हर विकल्प मुहय्या कराता है. आप एक निष्क्रिय आस्थावान भी हो सकते हैं, मतदाता की तरह. सक्रिय रूप से आप भक्त बन कर, जनता की आस्थाओं के प्रतिनिधि भी बन सकते हैं और अगर चाहें तो ‘नोटा’ का विकल्प भी आपके पास होता है कि बिना किसी भी भगवान का समर्थन किये हुए भी आप भारतीय और हिंदू बने रह सकते हैं. यहां तक कि आप सीधे तौर पर यह भी घोषित कर सकते हैं कि आपका आस्था इस लोकतंत्र (हिंदुत्व) में बिलकुल नहीं है. अगर अपने विचारों को प्रति ईमानदार रहे आप तो आपके इस विचार को भी चार्वाक की तरह सम्मान ही दिया जा सकता है. लेकिन भारतीय शास्त्रानुसार ‘भगवान’ बन जाने के लिए आपको मोक्ष की प्राप्ति करनी होगी, खुद की आत्मा को परम आत्मा में समाहित कर लेना होगा. खुद का अस्तित्व खत्म करके आपको उस परम अस्तित्व में खुद को विलीन कर लेना होगा.

ऐसा करते हुए आपके पास कई विकल्प होंगे. जीवन मरण के चक्र से छूट कर भगवान बन जाते वक्त भी आपको यह तय करना होगा कि सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य या सामीप्य में से किस तरह का मोक्ष चाहिए? आप भगवन के लोक में निवास करना चाहते हैं, उनके समीप रहना चाहते हैं या सीधे तौर पर खुद को उस परम पिता परमात्मा में ही समाहित कर लेना चाहते हैं. ऐसे हर तरह के विकल्पों में से चुन लेने की सुविधा मोक्ष के बाद भी आपको प्रदान की जाती है. हालांकि तुलसी बाबा जैसे ऐसे भी भक्त हुए हैं जिन्हें ऐसे मोक्ष की भी आकांक्षा नहीं है और न ही भगवान बन जाने की. जब वे यह कहते हैं कि ‘अरथ न धरम न काम रूचि, गति न चहउ निर्वाण, जनम-जनम सियाराम पद यह वरदान न आन’ तब वे एक अनोखे पांचवे विकल्प की इच्छा कर खुद को निर्विकल्प कर लेना चाहते हैं, खुद भगवान बन जाने या कहे जाने की लालसा नहीं पालते. ऐसे ही साईं बाबा का भा माहात्म्य है जिन्होंने कभी ‘इश्वर’ हो जाने के आग्रही नहीं रहे. राम बन जाने के बजाय उन्होंने भी ‘राम किंकर’ हो जाने में ही खुद की सार्थकता समझी.

इन तमाम आख्यानों के आलोक में यही कहा जा सकता है कि एक भक्त या गुरू के रूप में अगर साईं की महिमा गाई जाय तो उसपर ऐतराज़ करना निस्संदेह गलत है लेकिन भारतीय शास्त्र परंपरानुसार साईं को ‘भगवान’  के रूप में पूजा जाना भी उतना ही गलत होगा, और वह खुद साईं की अपनी महिमा के प्रतिकूल भी होगा. बावजूद उसके ‘जेहि के मन राम जाहि जेही, तेहि तेही सन काम.’ किसी को भी किसी को मानने या नहीं मानने के लिए मजबूर न किया जाय. हम सब अपनी आस्थाओं के साथ समाज में कायम रहें, ऐसा ही विमर्श हो समाज में. यह बात हर वक्त हमें ध्यान में रखना होगा कि ‘बांटने’ वाले लोग हमारी ओर इसी तरह टकटकी लगाए बैठे रहते हैं जैसे कोई बगुला अपने आहार मछली की ओर नज़र गड़ाए रखता है. अंततः हर वो तर्क या बहाना हमें स्वीकार्य हो जो देश को जोड़े इसके उलट हर वो तथ्य गलत और त्याज्य जो हमें तोड़ने, बहकाने, भटकाने की कोशिश करे. देश के समक्ष ऐसे ही ढेर सारे संकटों-समस्याओं का पहाड़ खड़ा है ऐसे में एक और मुद्दे को छेड़ देना कहीं से उचित नहीं. समाज को दिशा दिखाने वाले गुरुजनॉन का यह ज्यादा दायित्व है कि वे प्राणी मात्र में सद्भाव पैदा करते रहने वाले मुद्दों तक ही खुद को सीमित रखें. कोई अन्यथा विमर्श एक देश के रूप में हमें कमज़ोर ही करेगा.

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Source : visfot.com

 

Posted by on Jun 28 2014. Filed under हिन्दुत्व. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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