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क्यों और कैसे ढहा बाबरी ढाँचा – 2

जब राम जन्म भूमि-बाबरी विवाद के समाधान की सभी संभावनायें खत्म हो गयीं, तो अन्त में हिन्दू पक्ष ने यही तय किया कि अब सरकार को इस बात के लिए बाध्य किया जाये कि वह कानून बनाकर राम जन्मभूमि हिन्दुओं को सौंप दे, क्योंकि यदि बाबरी ढाँचे पर मुसलमानों का कब्जा कभी था भी, तो वह पूरी तरह गैर-कानूनी था। चन्द्रशेखर की सरकार जाने के बाद बनने वाली नरसिंह राव की सरकार ने साधु-सन्तों को आश्वासन दिया था कि वे तीन या छः महीने की अवधि में इस समस्या का कोई न कोई समाधान अवश्य कर देंगे। धीरे-धीरे यह अवधि भी बीत गयी, हालांकि हर माह साधु-सन्त उनसे मिलकर उनका वायदा याद दिला रहे थे।



इधर राम मन्दिर निर्माण के लिए पत्थरों की तराशी का कार्य चल रहा था और रामसेवक मन्दिर निर्माण के लिए कारसेवा करने को व्यग्र थे। गाँव-गाँव से पूजित राम-शिलायें अयोध्या लायी जा रही थीं। देश में ऐसा वातावरण बन गया था कि ये तथाकथित सेकूलर सरकारें जानबूझकर हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ कर रही हैं। उन्हीं दिनों यानी 1991 में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी और उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के तत्काल बाद अयोध्या जाकर राम जन्मभूमि पर मन्दिर बनाने का संकल्प घोषित किया। इसके लिए उन्होंने विवादित बाबरी ढाँचे को छोड़कर शेष 2.77 एकड़ भूमि मन्दिर बनाने के लिए अधिग्रहीत कर ली और वहाँ जुलाई 1992 में विश्व हिन्दू परिषद ने मन्दिर निर्माण के लिए नींव का पत्थर लगा दिया।

इसके साथ ही विश्व हिन्दू परिषद ने घोषित कर दिया कि वह 6 दिसम्बर 1992 को मन्दिर निर्माण के लिए कारसेवा प्रारम्भ कर देगी। इसके खिलाफ बाबरी पक्ष और केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गयी। उनके पास रेडीमेड बहाना था कि ‘बाबरी मस्जिद’ को खतरा है, इसलिए कारसेवा पर रोक लगायी जाये। सुप्रीम कोर्ट इस शर्त पर हिन्दुओं को कारसेवा की अनुमति दे सकता था कि विवादित ढाँचे को सुरक्षित रखा जायेगा। परन्तु उस समय की नरसिंह राव सरकार एक ही अकर्मण्य सरकार थी। वह इस मामले को अधिक-से-अधिक टालती जा रही थी और कारसेवा की औपचारिक अनुमति मिलते-मिलते रह गयी।

6 दिसम्बर 1992 को लगभग डेढ़ लाख हिन्दुओं की भीड़ कारसेवा करने के लिए वहाँ एकत्र हो गयी। जब उनको पता चला कि अभी तक उनको कारसेवा की अनुमति नहीं मिली है, तो उनका धैर्य जबाब दे गया और उनमें से उत्साही नौजवानों ने बाबरी ढाँचे को गिराना शुरू कर दिया। उनके चारों तरफ पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के जवान लगे हुए थे, परन्तु उनको स्पष्ट आदेश थे कि कारसेवकों पर किसी भी हालत में गोली न चलायी जाये। 2 साल पहले मुल्ला यम सरकार ने निहत्थे रामसेवकों पर गोली वर्षा करके जो जघन्य पाप किया था, कल्याण सिंह उसको किसी भी हालत में दोहराना नहीं चाहते थे।

वहाँ उस समय भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद के बड़े-बड़े नेता जैसे लालकृष्ण आडवाणी, डा. मुरली मनोहर जोशी, विजया राजे सिंधिया, विनय कटियार, उमा भारती आदि भी उपस्थित थे। प्रारम्भ में उन्होंने कारसेवकों को बाबरी ढाँचा गिराने से रोकने की पूरी कोशिश की और कई बार अपनी अपील दोहरायी, पर उनकी बात किसी ने नहीं सुनी। इससे वे सब समझ गये कि घटनाक्रम को तय करना अब उनके हाथ में नहीं रहा, अतः सबने नियति को स्वीकार कर लिया। उसी दिन एक-एक करके तीनों गुम्बद गिरा दिये गये और बाबरी ढाँचे का नामोनिशान मिटा दिया गया। उसकी जगह रामलला की मूर्ति रखकर एक अस्थायी मन्दिर बना दिया गया, जो आज भी वैसा ही बना हुआ है। इस घटना को कुछ टेलीविजन चैनलों ने लाइव भी दिखाया था और सरकारी रेडियो पल-पल की खबर दे रहा था।

‘बाबरी मस्जिद’ नाम के उस घृणित और अवांछनीय ढाँचे को जाना ही था, लेकिन जिस तरह वह गिराया गया, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। हालांकि कई साल पहले देवरहा बाबा ने ऐसी भविष्यवाणी की थी कि एक दिन हिन्दुओं की भीड़ आकर इस ढाँचे को गिरा जायेगी और पुलिस व सेना चुपचाप खड़ी देखती रहेगी। तब कोई नहीं समझ पाया था कि यह कैसे सम्भव होगा। पर ठीक वैसा ही हो गया। ‘तुलसी जस भवितव्यता तैसेई मिले सहाय।’



बाबरी ढाँचा गिरने के बाद दुनिया भर में बहुत तहलका मचा। सारा संसार यह देखकर दंग रह गया कि अत्यन्त सहनशील माना जाने वाला हिन्दू समाज इस हद तक भी उग्र हो सकता है। लेकिन सबने इस घटनाक्रम के लिए मुख्यतः मुसलमानों की हठधर्मी और सरकार की मुस्लिमपरस्ती को जिम्मेदार ठहराया। उस समय तक हिन्दुओं की भावनाओं को इतनी बार आहत किया जा चुका था कि उनका रोष प्रकट होना ही था। तुलसीदास जी लिख गये हैं- ‘अतिशय रगड़ करै जो कोई। अनल प्रकट चन्दन ते होई।।’ यह बात एक बार फिर सत्य सिद्ध हो गयी।

अन्त में एक बात और। बाबरी ढाँचा तोड़ते समय उसमें से एक शिलालेख निकला था और कई मूर्तियों के टुकड़े भी निकले थे। इससे इस बात की पुष्टि हो गयी कि वह मस्जिद वास्तव में किसी मन्दिर को तोड़कर उसी की सामग्री से बनायी गयी थी।

बाबरी ढाँचा ढह जाने के बाद किस-किसने कैसा-कैसा सियापा किया, देश में कैसी उथल-पुथल हुई और साम्प्रदायिक दंगे हुए, उनकी झाँकी अगले लेख में।

लिखक : विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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Posted by on Oct 18 2012. Filed under इतिहास, सच, हिन्दुत्व. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

1 Comment for “क्यों और कैसे ढहा बाबरी ढाँचा – 2”

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