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राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद

पोंगा पंडित नेहरू के चाटुकार छद्मसेकूलर और वामपंथी इतिहासकार भले ही इसे स्वीकार न करें, लेकिन यह एक माना हुआ तथ्य है कि अपने लगभग 700 वर्षों के शासनकाल में मुसलमान हमलावरों और बादशाहों ने बलपूर्वक हजारों मन्दिरों को धूल-धूसरित किया और अनेक स्थानों पर उनके ही मलबे से तथाकथित मस्जिदें बनवायीं। अलाउद्दीन खिलजी, बाबर और औरंगजेब का नाम ऐसे शासकों में सर्वोपरि है, हालांकि ऐसे कुकृत्य लगभग सभी मुसलमान बादशाहों ने कम-अधिक मात्रा में किये थे। विश्व हिन्दू परिषद ने गहरी छानबीन के बाद ऐसी तीन हजार मस्जिदों की सूची तैयार की थी, जिसे अभी तक किसी इतिहासकार ने चुनौती नहीं दी है।


मुसलमानों और उनके बाद अंग्रेजों का शासन समाप्त हो जाने के बाद, स्वाभाविक रूप से हिन्दू समाज की यह अभिलाषा है कि विदेशी आतताइयों द्वारा तोड़े गये ऐसे मन्दिरों को फिर से बनवाया जाये और उन स्थानों पर बनी हुई तथाकथित मस्जिदों को या तो हटा लिया जाये या उन्हें समाप्त कर दिया जाए। लेकिन लगभग तीन हजार स्थानों पर ऐसा करना एक प्रकार से असम्भव ही होता, इसलिए विश्व हिन्दू परिषद ने उनमें से केवल तीन प्रमुख स्थानों को चिह्नित किया- अयोध्या का राम जन्मभूमि मन्दिर, मथुरा का कृष्ण जन्मस्थान और काशी का ज्ञानवापी में विश्वनाथ मन्दिर- जो हिन्दुओं के तीन प्रमुख आराध्य क्रमशः राम, कृष्ण एवं शिव से सम्बंधित प्रमुखतम स्थान हैं।
इनमें अयोध्या के राम जन्मभूमि मन्दिर के स्थान पर तथाकथित बाबरी मस्जिद बनी हुई थी, जिसे बाबर के एक सिपहसालार मीर बाकी द्वारा सन् 1528 में बनवायी गयी माना जाता था। हिन्दुओं का शताब्दियों से यह विश्वास है कि इसी स्थान पर भगवान राम का जन्म हुआ था। उस स्थान पर हजारों साल पहले से मन्दिर बना हुआ था, जिसको बाबर के सिपहसालार ने तुड़वाया और उसी के मलबे से वहाँ आधी-अधूरी मस्जिद बनवा दी। तभी से कई हिन्दू राजाओं की सेनाओं और साधु-सन्तों ने उस स्थान को मुसलमानों के कब्जे से वापस लेने के लिए समय-समय पर युद्ध किये थे, लेकिन सीमित साधनों के कारण पूर्ण सफलता कभी नहीं मिली, हालांकि उसके बाहर के चबूतरे पर हिन्दुओं का भजन-कीर्तन हमेशा चलता रहा।
स्वतंत्रता के बाद 1949 में एक दिन हिन्दुओं की भीड़ ने बलपूर्वक उस बाबरी ढाँचे पर कब्जा कर लिया और वहाँ श्री रामलला की मूर्ति स्थापित कर दी। इसके विरोध में मुसलमानों ने अदालत में वाद दायर कर दिया और वहाँ मुकदमा शुरू हो गया। उस समय देश में नेहरू की सरकार थी, जो स्वाभाविक रूप से हिन्दू विरोधी थे। उन्होंने जब इस विवाद को तूल पकड़ते देखा, तो उस ढाँचे पर ताला लगवा दिया। लेकिन रामलला की मूर्ति हटाने की हिम्मत उन्होंने भी नहीं की, इसलिए उस मूर्ति की पूजा के लिए एक पुजारी नियुक्त किया गया और अन्य राम भक्तों को केवल दरवाजे के बाहर से ही दर्शन आदि की अनुमति दी गयी। उस ढाँचे के आस-पास मुसलमानों का कोई अन्य पूजा-स्थल नहीं है, इसलिए मुसलमानों को उस स्थान के निकट आने पर रोक लगा दी गयी।
1981 में विश्व हिन्दू परिषद ने उस ढाँचे पर लगे ताले को खुलवाने के लिए आन्दोलन शुरू किया। 1983-84 में इस आन्दोलन ने जोर पकड़ा, लेकिन इन्दिरा गाँधी की आकस्मिक हत्या के कारण यह आन्दोलन रोक दिया गया। बाद में जब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने, तो इस आन्दोलन को फिर चालू किया गया और ताला खुलवाने की माँग की गयी। ताला खुलवाने के लिए अदालत में सुनवायी शुरू हुई, तो सरकारी वकील से पूछा गया कि ताला खोलने में क्या परेशानी है। सरकारी वकील ने कानून-व्यवस्था की समस्या बतायी, तो पुलिस अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि वे कानून-व्यवस्था को सँभाल लेंगे। यह सुनकर न्यायाधीश ने ताला खोलने का आदेश दे दिया। इस प्रकार फरवरी, 1986 में राम जन्मभूमि का ताला खोल दिया गया और हिन्दुओं को रामलला के पास तक जाकर पूजा-अर्चना करने का अधिकार मिल गया।

राम जन्मभूमि का ताला खुलते ही मुसलमान समाज में रोष फैल गया। हालांकि ताला खुलने से मुसलमानों को कोई अन्तर पड़ने वाला नहीं था, क्योंकि पूजा तो वहाँ पहले से ही हो रही थी और मुसलमानों के वहाँ फटकने तक पर रोक लगी हुई थी। लेकिन अपनी राजनीति चमकाने के इच्छुक कुछ मुसलमान नेताओं ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बना डाली। इनमें प्रमुख थे, इमाम बुखारी, सैयद शहाबुद्दीन आदि। उनको शर्म-निरपेक्ष पार्टियों के नेताओं का भी खुला समर्थन मिल रहा था।
कहा जाता है कि ताला खुलवाने का कार्य स्वयं राजीव गाँधी ने व्यक्तिगत रुचि लेकर कराया था। उनके संकेत पर ही पुलिस अधिकारियों ने कानून-व्यवस्था के बारे में आश्वासन दिया था। शाह बानो केस में राजीव गाँधी मुस्लिम साम्प्रदायिकता को खाद-पानी देने के लिए बहुत बदनाम हो गये थे, अतः हिन्दू समाज को खुश करने के लिए उन्होंने राम जन्मभूमि मन्दिर का ताला खुलवा दिया। इस बात में काफी वजन है, क्योंकि उनकी सरकार ने हर प्रकार की साम्प्रदायिकता को हवा देने का काम किया था। मेघालय के चुनाव प्रचार में वे बाइबिल के अनुसार शासन व्यवस्था चलाने का आश्वासन देकर आये थे और पोप के भारत आगमन पर सपत्नीक साष्टांग दंडवत् हो गये थे। इसी तरह खालिस्तानी आतंकवादी सरगना भिंडरांवाले को उन्होंने ‘संत’ कहा था।

यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण हैं कि बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने राम जन्मभूमि पर बने हुए मन्दिर को तोड़कर उसी के मलबे से आधी-अधूरी मस्जिद बनवायी थी, जिसको कालान्तर में बाबरी मस्जिद का नाम दिया गया। हालांकि किसी मस्जिद का नाम किसी व्यक्ति के नाम पर रखना गैर-इस्लामी है, लेकिन इसे मानता कोई नहीं। मस्जिद को आधी-अधूरी इसलिए कहा है कि वहाँ न तो कोई मीनार थी, जिस पर चढ़कर मुल्ला अजान देता है, और न वजू करने के लिए पानी का कोई इन्तजाम था। वहाँ तो केवल पश्चिमी दिशा में खिंची हुई एक दीवार और दालान था, जिसकी छत में तीन गुम्बद बने हुए थे। मस्जिद का आधी-अधूरी होना अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि वह तथाकथित मस्जिद जल्दबाजी में और बिना किसी योजना के बनायी गयी थी। हमलावर प्रायः ऐसा ही करते हैं।
वहाँ पहले मन्दिर था इसका दूसरा प्रमाण यह है कि उसके चारों ओर राम और उनके परिवार से सम्बंधित कई स्थान हैं, जैसे सीता रसोई, दशरथ का भवन, कैकेयी का भवन आदि। परन्तु राम जन्म स्थान कोई नहीं है। अब यह तो असम्भव है कि वहाँ तमाम धार्मिक स्थान बना दिये जायें और राम जन्मभूमि को छोड़ दिया जाये। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि 1940 से पहले बाबरी मस्जिद को ‘मस्जिद-ए-जन्मस्थान’ कहा जाता था। यह इस बात का एक और पक्का प्रमाण है कि वह मस्जिद राम जन्मभूमि माने जाने वाले स्थान पर बनी हुई थी।
बाबरी वाले अपनी मस्जिद के पक्ष में तरह-तरह के तर्क देते हैं, उन तर्कों की समीक्षा नीचे की जा रही है-
तर्क 1 – वहाँ पहले कोई मन्दिर नहीं था, बल्कि खाली जमीन थी, जिस पर बाबर ने मस्जिद बनवाने का आदेश दिया।
उत्तर– यह तर्क हास्यास्पद है, क्योंकि इसका मतलब तो यह निकलता है कि हिन्दुओं ने उस स्थान के चारों ओर अपने कई धार्मिक स्थान बना लिये और बीच में खाली जगह इसलिए छोड़ दी कि बाबर वहाँ आकर मस्जिद बनवा सके। वहाँ आसपास मुसलमानों की कोई बस्ती न तो कभी थी और न आज है। फिर बाबर जी किसके लिए और क्यों वहाँ मस्जिद बनवायेंगे?
तर्क 2 – वहाँ पहले आस-पास कोई बस्ती नहीं थी, बल्कि जंगल था। हिन्दुओं ने मस्जिद के आस-पास मन्दिर बाद में बनाये हैं।
उत्तर– यह तर्क भी हास्यास्पद है। क्या घोर जंगल में बाबर जी ने मस्जिद इसलिए बनवायी थी कि जंगली जानवरों को नमाज पढ़ने की सुविधा हो जाये?

 



तर्क 3– बाबरनामा में ऐसा कोई जिक्र नहीं है कि उसने वहाँ मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनवायी।
उत्तर– बाबरनामा में तो इसका भी जिक्र नहीं है कि उसने अयोध्या में कोई मस्जिद बनवायी। फिर बाबरी मस्जिद कहाँ से आ गयी? वास्तव में जिन दिनों यह मस्जिद बनवायी गयी थी, उस अवधि के बारे में बाबरनामा में कुछ नहीं लिखा है, यानी उसके वे पन्ने गायब हैं।
तर्क 4– वहाँ मन्दिर टूटा हुआ पड़ा था। उसी जमीन पर बाबरी मस्जिद बनायी गयी।
उत्तर– क्या हिन्दू इतने मूर्ख हैं कि आस-पास के मन्दिरों तथा भवनों को बना लेंगे और अपना सबसे प्रमुख मन्दिर टूटी-फूटी हालत में छोड़ देंगे, ताकि कोई हमलावर आकर वहाँ मस्जिद बनवा सके?
तर्क 5– मस्जिद को हटाया नहीं जा सकता। एक मस्जिद कयामत तक मस्जिद ही रहती है।
उत्तर- यह बात मन्दिरों के बारे में भी कही जा सकती है। जब मन्दिरों को तोड़कर मस्जिद बनायी जा सकती है, तो किसी मस्जिद को तोड़कर मन्दिर क्यों न��ीं बनाया जा सकता?

 

इससे स्पष्ट है कि उस तथाकथित मस्जिद के पक्ष में दिये जाने वाले सारे तर्क बेकार हैं। वास्तव में सन् 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ द्वारा पुरातात्विक और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर दिये गये फैसले में तीनों न्यायाधीशों ने स्पष्ट कहा है कि बाबरी मस्जिद किसी भव्य मन्दिर के खंडहरों पर बनी थी। उनमें से दो न्यायाधीशों ने यह भी स्पष्ट लिखा है कि उस मस्जिद को बनाने के लिए मन्दिर को तोड़ा गया था, जबकि केवल एक न्यायाधीश ने ऐसा लिखा है कि मन्दिर पहले से टूटा हुआ पड़ा था।
विश्व हिन्दू परिषद ने प्रस्ताव रखा था कि यदि मुस्लिम समाज बाबरी मस्जिद के स्थान पर से अपना दावा स्वेच्छा से छोड़ दे, तो उसके बदले में वे मुसलमानों की किसी बस्ती के पास भव्य मस्जिद अपने खर्च पर बनाकर भेंट कर देंगे। यदि इस प्रस्ताव को मान लिया जाता, तो देश में हिन्दू-मुस्लिम एकता का ऐसा वातावरण पैदा होता, जिसकी बराबरी दुनिया में कोई नहीं कर पाता। लेकिन मुसलमानों में इतनी समझदारी कहाँ कि वे देश और समाज के हित में इतनी दूर तक सोच सकें? अपनी मूर्खता से उन्होंने वह सुनहरा मौका गँवा दिया और फिर देश में वह सब हुआ, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। इस स्थिति को व्यक्त करने के लिए एक पंक्ति पर्याप्त होगी- ”लमहों ने ख़ता की थी, सदियों ने सजा पाई।“

 

लेखक : विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

 

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Posted by on Sep 6 2012. Filed under मेरी बात, सच, हिन्दुत्व. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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