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कैसे रोकेंगे रेप जब तलाशे ही नहीं जा सके हैं इसके कारण

How To Prevent Rapes And Gangrapes

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भारत में रेप और गैंगरेप के ताजा मामलों से एक बार फिर से महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा, रेप, छेड़छाड़ बहस के केंद्र में आ गई है। भारत के अलावा दुनिया भर के समाजशास्त्री, मनोचिकित्सक इस बात की तह में जाने की कोशिश कर रहे हैं कि जो देश रेप के खिलाफ कररीब एक महीने तक उबल चुका हो वहां रेप केस कम होने के बजाए नए और हाई प्रोफाइल मामले सामने आते जा रहे हैं। पिछले एक हफ्ते में देश के जनमानस को रेप और गैंगरेप के तीन मामलों से फिर से दहला दिया। ये मामले- आसाराम पर एक नाबालिग बच्ची के साथ कथित रेप का आरोप, मुंबई में फोटोजर्नलिस्ट के साथ हुई गैंगरेप की घटना और अरुणांचल प्रदेश में एक टीचर के एक दर्जन से ज्यादा बच्चियों के साथ रेप थे। भारतीय समाज में रेप के कई कारण हैं जिन्हें तलाशे और रोके बिना रेप की इन घटनाओं पर रोकथाम नहीं लगाई  जा सकती है।
इंदौर के एडवोकेट ने कमलेश वासवानी ने इसी साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दाखिल कर महिलाओं, लड़कियों और बच्चों के साथ रेप के अधिकांश मामलों के लिए पोर्नोग्राफी को जिम्मेदार बताया था और पोर्नोगाफी में लिप्त पाए जाने को इंटरनेट कानूनों के तहत गैर जमानती अपराध बनाने की मांग की थी। 
1990 के दशक में भारत में केबल टीवी आने से पहले एक टीवी चैनल और कुछ गिने-चुने टीवी कार्यक्रम होते थे लेकिन इसके बाद परिदृश्य पूरी तरह से बदल गय। यह सदी बीतने के बाद भारत में टीवी और इंटरनेट के जरिए सूचनाओं का हमला तेज हो गया। यह इतना तेज था कि इसके लिए न तो भारतीय समाज पूरा तरह तैयार था और न ही उसे पता था कि इसका कैसे बुद्धिमानी और जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जाए।
सेव चिल्ड्रेन में स्वास्थ्य और पोषण के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. राजीव टंडन कहते हैं, हम एक पुरानी सभ्यता और एक बनते आधुनिक समाज के दोहरे रूप में दुनिया से लड़ रहे हैं। वे कहते हैं कि हमारे बेडरूम में केबल टीवी आने के बाद यह सॉफ्ट पोर्नोग्राफी को अपने साथ लेकर आया है। यह हमारी फिल्मों, टीवी सीरियल्स और खबरों को सनसनीखेज बनाने तीनों तरीकों से हुआ है। आज समाज के सभी वर्गों के हाथों में वह सब है जिसे संभालने और समझने की उसकी क्षमता भी नहीं है। वे कहते हैं कि भारत एक युवा देश है जो पुरानी मानसिकता के साथ सूचनओं को विस्फोट के दौर में खड़ा है।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस के समाजशास्त्री शिल्पा फड़के कहती हैं कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लिए पोर्नोग्राफी को जिम्मेदार ठहराना केवल एक बकवास है। ऐसा इसलिए है कि पोर्नोग्राफी एक आसान टारगेट है। इस पर आरोप मढ़कर असल समस्याओं- महिलाओं को उपभोग की चीज बनाने, उनकी महत्ता कम करने और अपने आपराधिक न्यायिक प्रक्रिया की आत्मालोचना करने से बचा जा सकता है।
मसीना अस्पताल में साइकैट्री डिपार्टमेंट के हेड डॉ. युसुफवाला कहते हैं, यह एक साबित बात है कि पोर्नोग्राफी देखने के बाद इंसान सेक्स करने के प्रेरित होता है। इसे देखने से मिलने वाली प्रेरणा के बाद लोग तुरंत सेक्स चाहते हैं। हालांकि पोर्नोग्राफी और यौन हिंसा के बीच इतना आसान और सीधा संबंध नहीं है। कई समाजशास्त्री, महिला अधिकारों के एक्टिविस्ट और मेडिकल स्पेशलिस्ट इस बात को नकारते हैं। रेप होने के तमाम कारण हमारे समाज में ही मौजूद हैं। जिनकी ओर बार-बार अपराध विशेषज्ञ, मनोचिकित्सक, समाजशास्त्री, शिक्षाशास्त्री ध्यान दिलाते रहते हैं !
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हालांकि रेप के कई मामलों के दौरान या पहले पोर्न की संलिप्तता सामने आई है लेकिन इससे भी यह साबित नहीं होता कि पोर्न ही पुरुषों को रेप के लिए उकसाता है। दिल्ली में हुए गुड़िया गैंगरेप मामले में पुलिस ने खुलासा किया था कि आरोपियों ने बच्ची को शिकार बनाने से पहले पोर्न फिल्म देखी थी। ऐसे ही अभी मुंबई में हुए फोटोजर्नलिस्ट गैंगरेप मामले में भी पुलिस ने बताया है कि आरोपी उस दौरान पोर्न फिल्म देख रहे थे और पीड़ित को जबरन दिखाने की भी कोशिश कर रहे थे।
फड़के कहती हैं कि वह पोर्नोग्राफी पर बैन लगाने के खिलाफ हैं, इससे हर चीज और किसी भी चीज पर बैन लगाया जा सकता है। कोई भी दूसरी हिंसा के कारणों की ओर ध्यान नहीं दे रहा है। वह पूछती हैं, जब हिंसक वीडियोगेम्स, टीवी सीरियल्स पर दिखाए जाते पितृसत्तातमक विचार और फिल्मों की हिंसा पर बैन लगाने की मांग नहीं होती है तो पोर्नोग्राफी पर बैन लगाने की मांग क्यों। सरदेसाई भी कहती हैं पितृसत्तातमक खांचे को तोड़ने की जरूरत है। वह कहती हैं कि पुलिस की सोच को भी बदलना जरूरी है। हरियाणा फतेहाबाद जिले के एक सब इंसपेक्टर प्रवीण सिंह का कहना था कि महिला सहमत नहीं होगी तो कोई भी पुरुष उसका रेप नहीं कर सकेगा। ज्यादातर मामले कुछ और चीजों से प्रेरित होते हैं। हाल ही में एक महिला अपने देवर के रेप करने की शिकायत लेकर आई, मैंने पूछा जब उसका रेप हो रहा था तो उसका पति क्या रह रहा था? पुलिस जांच करने गई तो तीनों से नहर में कूद कर खुदकुशी कर ली। ऐसे मामलों को गंभीरता से कैसे लिया जा सकता है?
सरदेसाई कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि पोर्न देखने वाले लोग ही ऐसे अपराध करते हैं। जब भी रेप की बात होती है तो इसे यौन अपराध से जोड़ कर देखा जाता है। मेरे लिए यह महिलाओं के खिलाफ हिंसा का मामला है। लोग अपने घरों में देखते हैं कि उनकी मां और बहन के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है और उसे ही अपने जीवन में अमल में लाते हैं। आज भी जिस समाज में लोग ऐसा सोचते हैं जिसकी लाठी उसकी भैंस, ऐसे में पोर्न देखने से रेप का रिश्ता जोड़ना ज्यादती होगी।

 

समाज में बेरोजगारी, समाजिक मूल्यों का हनन और पितृसत्तातमक सोच कम नहीं हुई बढ़ी ही है। भारतीय पुरुषों की मानसिकता के बारे में द गार्डियन की शोधपरक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारतीय पुरुष हालिया रेप की घटनाओं के बाद महिलाओं की भूमिका के बारे में क्या सोचते हैं। 28 साल के एक ड्राइवर अभिजीत का कहना था कि भारत की संस्कृति अलग है। लड़कियों को शाम छह बजे के बाद बाहर नहीं रहना चाहिए। उनके साथ रेप, लूटपाट, अपहरण कुछ भी हो सकता है। लड़कियां छोटी और सेक्सी ड्रेस में घूमती हैं इसलिए आदमी खुद पर काबू नहीं रख पाते हैं।
डॉ. टंडन कहते हैं कि हम एक पितृसत्तातमक, पुरुष प्रधान और लैंगिक भेदभाव वाले समाज में रह रहे हैं जहं औरतों को एक कमोडिटी की तरह देखा-समझा जाता है। इसके बाद अशिक्षा, गरीबी से युवाओं के सपने पूरे नहीं होते हैं। इसलिए हम ऐसी जगह सुरंग पर बैठे हैं जो जल्दी ही फटने वाली है। इन दोनों समस्याओं से ही भ्रमित युवा पितृसत्ता की ओर अग्रसर हो रहे हैं और महिलाओं के खिलाफ रेप जैसे अपराध घट रहे हैं। अक्षरा की सह निदेशक नंदिता गांधी कहती हैं, ऐसे कई युवा हैं तो वर्तमान से निराश हैं और भविष्य से नाउम्मीद। इसलिए ये तनाव उन लोगों पर निकलता है जो सबसे कमजोर हैं, जो सामना नहीं कर सकते हैं- बच्चे, पत्नियां, अनजान महिलाएं आदि।

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मसीना अस्पताल में साइक्रेटिस्ट माचिसवाला कहते हैं कि पोर्नोग्राफी से पुरुषों का महिलाओं के प्रति व्यवहार तो बदला है लेकिन पालन-पोषण, चारों ओर का माहौल भी इसमें भूमिका निभाता है। अगर आप एक कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं और आपके चारों ओर अपराधी हों या आपके परिजन शराबी रहे हों तो आपके महिलाओं के प्रति अपराधों में लिप्त रहने की आशंका बढ़ जाती है। सैंट जेवियर कॉलेज में समाजशास्त्र की प्रोफेसर नंदिनी सरदेसाई कहती हैं, अशिक्षा और बेरोजगारी भी ऐसे व्यवहार के उत्प्रेरक तत्व हो सकते हैं, परिवार का नियंत्रण न होना भी इसका अहम कारण है। पारिवारिक मूल्य कम हो रहे हैं इससे भी महिलाओं के प्रति हमारी सोच पुरानी ही रह गई है। हालांकि आज महिलाएं काम कर रही हैं लेकिन पुरुषों की उनके प्रति सोच नहीं बदली है। महिलाएं एक उपभोग की चीज हैं। ऑफिस से घर लौटती महिलाओं को देखकर बॉलीवुड गीतों- तू हां कर या ना कर या तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त जैसे गानों से छेड़ा जाना आम बात है।
दिल्ली गैंगरेप मामले में मुख्य अभियुक्त राम सिंह का बचपन से अपराधी प्रवृत्ति का होना इस बात का सबूत है कि उस पर उसके परिवार का कंट्रोल नहीं था और वह आस-पास के माहौल से ही आपराधिक प्रवृत्ति का हो गया था।
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अध्ययन बताते हैं कि महिलाएं या युवतियां अपने साथ हुई यौन अपराधों की घटना महिला पुलिसकर्मियों के होने पर उन्हें आसानी से बताती हैं। भारत में ऐतिहासिक तौर पर बाकी एशियाई देशों के मुकाबले महिला पुलिसकर्मियों की संख्या कम है। देश की राजधानी नई दिल्ली में ही सिर्फ सात फीसदी महिला पुलिसकर्मी हैं और उन्हें भी महत्वहीन कामों पर रखा जाता है। उन्हें पेट्रोलिंग में शामिल नहीं किया जाता है। दिल्ली में 161 पुलिस स्टेशनों में से केवल एक में पुलिस स्टेशन अधिकारी हैं। महिलाओं के रेप की शिकायत करने पर अक्सर उन्हें अपमानित किया जाता है।
रेप के बाद सुसाइड करने वाली पीड़ित की बहन चरनजीत कौर का कहना था कि पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज करने से मना कर दिया था और मेरी बहन से भद्दे सवाल पूछ रहे थे जैसे कि क्या आपका अक्सर रेप होता रहा है? उनका कहना था कि वहां कोई महिला पुलिस अधिकारी नहीं थी। मेरी बहन उनके सामने रो रही थी और कह रही थी, अगर मैं आपकी बेटी होती तो भी क्या आप ऐसे ही सवाल करते? दिल्ली गैंग रेप की घटना के बाद दिल्ली पुलिस ने कहा था कि वे और ज्यादा महिला पुलिसकर्मियों को भर्ती करने का अभियान चलाएंगे।
इसके अलावा भारत में नागरिकों की रक्षा में तैनात सामान्य पुलिसकर्मियों की संख्या भी कम है, जो हैं वे भी वीवीआईपी की सुरक्षा में ही तैनात रहते हैं। सड़क पर लाठी से ट्रैफिक संभालने वाले पुलिसकर्मियों से अपेक्षा की जाती है कि वे बिना विशेष साधनों और ट्रेनिंग के अपराधों के खिलाफ सबूत जुटाएंगे। दिल्ली उन शहरों में आता है जहां दुनिया की सबसे बड़ी करीब 84,000 पुलिस अधिकारियों की फोर्स है। लेकिन इसमें से केवल एक तिहाई ही फोर्स ही सुरक्षा में तैनात रहती है। बाकी पुलिस राजनेताओं, नौकरशाहों, राजदूतों, और एलीट क्लास की सुरक्षा में लगी रहती है। एक अनुमान के मुताबिक दो सौ लोगों की सुरक्षा में एक पुलिसकर्मी है तो एक वीआईपी की सुरक्षा में 20 पुलिसकर्मी तैनात हैं।
भारत में यौन हिंसा के पीड़ितों पर ही अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि यह उनकी गलती से ही हुआ है। 1996 में जजों की एक कमेटी के किए सर्वे के मुताबिक 68 फीसदी लोगों का कहना था कि भड़काऊ कपड़ों के चलते ही लोग रेप करने को प्रेरित होते हैं। हालिया गैंगरेप की घटनाओं के बाद राजस्थान के एख विधायक ने प्राइवेट स्कूलों में स्कर्ट पहने जाने पर रोक लगाने की मांग की है। उनका कहना था कि ऐसे कपड़ों से रेप और यौन हिंसा की घटनाओं में वृद्धि होती है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, रूहेलखंड यूनिवर्सिटी के बरेली कॉलेज में जींस-टॉप पर बैन, खाप पंचायतों द्वारा लड़कियों को समय-समय पर जींस न पहनने की चेतावनी देना इसी तरह की मानसिकता का परिचायक है। खाप पंचायतों ने तो चीनी खाद्य पदार्थों को भी रेप के हार्मोंस बढ़ाने वाला बताया था और लड़कियों के इसे खाने पर रोक लगाने का फरमान जारी किया था। बंद समाजों में ऐसे ही फैसले और फतवे देखने को मिलते हैं।
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द रायटर्स ट्रस्ट लॉ ग्रुप ने हाल ही में भारत को इस साल महिलाओं के लिए सबसे खराब रहे देशों की सूची में ऊपर रखा था। ऐसा इसलिए था कि यहां पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कई मामले देखने को मिले और घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाजें भी काफी कम उठी। 2012 में यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 19 साल के बीच के 57 फीसदी लड़के और 53 फीसदी लड़कियां सोचते हैं कि महिलाओं के खिलाफ होने वाली घरेलू हिंसा सही है। रष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक भी ज्यादातर महिलाएं पति के हाथों पिटने की वजह अपनी गलतियों को ही मानती हैं। घरेलू हिंसा के दौरान मां को पिटता देखते हुए लड़का बड़ा होकर अपने परिवार और समाज में महिलाओं के प्रति ऐसा ही व्यवहार करता है। घरेलू हिंसा अधिनियम पारित होने, बेल बजाओ जैसे अभियानों के बावजूद भारतीय समाज में घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं में अपेक्षित जागरुकता नहीं आ सकी है।
महिलाएं अक्सर घर से बाहर निकलने पर सुरक्षित नहीं रहती हैं। कई बार तो उन्हें घर में भी यौन हिंसा का शिकार होना पड़ता है। एक बस में हुई गैंगरेप की घटना और इसके बाद भारतीय अधिकारियों का कहना कि सार्वजिनक स्थान महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से सही नहीं हैं। राजधानी दिल्ली में ही कई रास्ते ऐसे हैं जो शाम होते ही अंधेरे में डूबे रहते हैं। महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने हाल में ही कहा है कि महिलाओं के लिए सार्वजनिक शौचालयों का अभाव है। पब या बार में जाने वाली महिलाओं को भारतीय संस्कृति के खिलाफ जाना माना जता है। कई गावों में यह कहा जाता है कि लड़कियों के मोबाइल फोन पर ज्यादा बात करने और बाजार जाने से भी रेप के मामले बढ़े हैं।
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बीते साल दिसंबर में राजधानी दिल्ली में सबसे सुरक्षित कही जाने वाले पब्लिक ट्रांसपोर्ट मेट्रो रेल में एक लड़की के साथ हुई छेड़खानी ने भारतीय समाज को आईना दिखा दिया था। मेट्रो के जनरल डिब्बे में चढ़ी लड़की के साथ भीड़ भरे कोच में छेड़खानी हुई थी और राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर कोच से बाहर आते समय कुछ युवकों ने उसका टॉप भी उतार दिया था। युवती ने बाद में ब्लॉग के माध्यम से अपनी आपबीती दुनिया को बताई थी।
सार्वजनिक स्थानों पर होने वाली छेड़खानी के विरोध में मौके पर मौजूद लोगों में से कोई बोलता नहीं है। वे ऐसे मामलों में पड़ने से बचना चाहते हैं क्योंकि वे भी कहीं न कहीं यह मानते हैं कि गलती छेड़ी जाने वाली लड़कियों की भी है। ऐसी सोच को समाज में बढ़ाने का काम करते हैं हमारे राजनेता। उनके बयानों से कई बार पीड़िताओं को चोट पहुंचती है तो कभी वे आरोपियों के समर्थन में बयान देते हैं। हाल ही में उमा भारती ने आसाराम पर लगे आरोपों के बाद पीड़ित लड़की और उसके परिवार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। उमा भारती ने आसाराम को न्यायिक और कानूनी प्रक्रिया से पहले ही क्लीन चिट दे दी।
अनीसुर रहमान नाम के एक नेता ने एक महिला मंत्री से रेप करने की फीस तक पूछ ली थी। इसके अलावा भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे ने भी दिल्ली गैंगरेप के बाद प्रदर्शन करने वाली महिलाओं को मेकअप करके आने वाली और डिस्कोथेक के बाद विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाली महिलाएं कहा था। ऐसे बयान परोक्ष और अपरोक्ष रूप से पीड़िता पर ही उंगली उठाने का काम करते हैं।
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हाल ही में 17 साल की एक लड़की ने गैंगरेप के बाद आत्महत्या कर ली थी क्योंकि पुलिस उस पर केस को वापस लेने और एक आरोपी के साथ ही शादी करने का दबाव बना रही थी। पुलिस के ऐसे कारनामे हर शहर, गांव में देखने को मिलते हैं। अपने इलाके की रिपोर्ट अच्छी बनाने के लिए वे ऐसे मामलों में भी समझौते कराने की कोशिश करते नजर आते हैं। पुलिस ही नहीं ग्रामीण इलाकों में खाप पंचायतें भी ऐसे मामलों में समझौते का दबाव बनाती हैं। रेपिस्ट के साथ पीड़िता की शादी करा देने को वहां न्याय का बेहतर तरीका और दो परिवारों या समुदायों के बीच शांति बनाए रखने का उपाय माना जाता है।
भारत की न्यायिक प्रणाली धीमी होने की वजह से भी लोग यौन अपराधों की शिकायत करने के लिए हतोत्साहित होते हैं। इसकी बड़ी कमी न्यायालयो में जजों की कमी होना है। इस वजह से प्रति कोर्ट या प्रति जज केस बढ़ जाते हैं और सुनवाई काफी समय बाद होती है। भारत में दस लाख लोगों पर 15 जज काम कर रहे हैं। ऐसे में रोज मामलों की संख्या बढ़ने से प्रतिदिन अदालतों पर भार बढ़ता जा रहा है जिससे भी न्याय की उम्मीद में बैठे लोग हतोत्साहित होते हैं। भारत के पड़ोसी चीन में हर दस लाख लोगों पर 159 जज काम कर रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज ने एक बार अनुमान लगाया था कि केवल राजधानी के मामलों के बैकलॉग को समाप्त करने में ही 466 साल लग जाएंगे। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया की स्थिति वाकई सोचनीय है।
रेप के मामले पहले तो कम दर्ज होते हैं और जो होते भी हैं तो उनमें न्याय मिलने की प्रक्रिया धीमी रहती है। हालांकि फास्टट्रैक कोर्ट में ये मामले चलने से कुछ तेजी आई है लेकिन इसे उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता है। भारत में दर्ज होने वाले रेप के मामलों में सजा सुनाने की हालत काफी धीमी है। सजा सुनाने की दर 26 फीसदी से ज्यादा नहीं है। रोजाना होने वाली यौन हिंसा जैसे ईव टीजिंग के लिए भी सख्त कानून नहीं हैं जो इस पर रोकथाम लगा सकें। यौन हिंसा पर नए कानून सात सालों से लटका हुआ है।
भारत में महिलाओं का सेकेंड सिटिजन होना कोई नया मामला नहीं है। भारतीय समाज में उन्हों दोयम दर्जा हासिल है। गरीब परिवारों में तो महिलाओं में होने वाली शादी के समय दिए जाने वाले दहेज के चलते लड़की को बोझ माना जाता है। भारत में जारी भ्रूण हत्या के चलते दुनिया में मेल-फीमेल के सबसे बुरे सेक्स रैशियो वाले देशों में इसका नाम ऊपर है। जीवन भर पुरुषों को महिलाओं से बेहतर खाना दिया जाता है।
Source : Dainik Bhaskar

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=2765

Posted by on Aug 29 2013. Filed under खबर, सच. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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