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कोठी में मिली 2 साल से बंधुआ मजदुरी करती मेड

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नई दिल्ली। देश के ग्रामीण इलाकों में भयंकर गरीबी है और महानगरों में सस्ते घरेलू नौकरों की जबरदस्त मांग। यहीं से पनपता है अवैध प्लेसमेंट एजेंसियों का रैकेट। एक मां जिसकी बच्ची को अच्छे रोजगार का सपना दिखा कर दिल्ली लाया गया था, उस मां ने अपनी बच्ची की तलाश में रात दिन एक कर दिया। अपनी बेटी की तलाश में लगी मामुनी कहती हैं कि हम क्या करें, जब तक वो नहीं मिलेगी तब तक हम घर नहीं जाएंगे। हम वापस तो लड़की को लेकर ही जाएंगे।
मामुनी की लाडली दो साल पहले राजधानी दिल्ली आई तो थी नौकरी के लिए लेकिन फिर घर नहीं लौटी। घरों में काम दिलाने के नाम पर एक एजेंट मामुनी की बेटी को दिल्ली लेकर लाया था। मामुनी को अच्छे पैसे और रोजगार का भरोसा दिया गया। मामुनी की तरह ही असम के चाय बागान में काम करने वाले एक सौ के करीब परिवार अपनी बच्चियों की तलाश में दर-दर भटकने को मजबूर हैं। बचपन बचाओ आंदोलन और दिल्ली पुलिस की विशेष मुहिम के तहत एक छापा दिल्ली के शकरपुर इलाके में एक प्लेसमेंट एजेंसी पर मारा गया था।
शकरपुर के उस बिल्डिंग में नाबालिग लड़कियां बेहद गंदे हालात में जबरन रहने को मजबूर है। सात से आठ साल की छोटी बच्चियों को इन कमरों में पुरुष एजेंट के साथ रहना पड़ रहा हैं। जाहिर है इसमें इनकी हामी नहीं होती है। दिल्ली पुलिस के छापे के दौरान मामुनी ने दोलोन नाम के उस शख्स को पहचान लिया जिसने उसकी बेटी को इस दलदल में घसीटा था। मानव तस्कर से जब पूछा गया कि क्या तुम लाए थे इसकी बेटी को ? कहां है इसकी बेटी? उसने जवाब में कहा कि कोठी में। पुलिस पूछताछ के दौरान एजेंट डोलोन ने अपना जुर्म कबूल लिया। उसने बताया कि असम से कई ऐसे लोग हैं जो लड़कियों की तस्करी में शामिल हैं।
एजेंट डोलोन ने बताया कि 34 लड़कियों को असम से लाया गया था। एक लड़की का सात से आठ हजार मिलता था। मैं अब तक दो -चार लड़कियां लाया हूं। हर एक लड़की के लिए मुझे भी आठ हजार रुपये मिले। पुलिस पूछताछ के दौरान एजेंट डोलोन ने मामुनी की बेटी का पता भी बताया। एजेंट ने खुलासा किया कि मामुनी की बेटी पिछले दो साल से दिल्ली के एक घर में नौकरानी का काम कर रही थी। दो साल से खोई अपनी बेटी को अचानक सामने देख कर मां की आखों का छलकना लाजमी है। मामुनी की आंखें अपनी बिटिया से मिलाने वालों को शुक्रिया अदा कर रही थीं।
नाबालिग को अपने घर पर काम पर रखनेवाले ने पुलिस के सामने ये कबूल लिया कि उन्होंने कभी भी मामुनी या उसकी लड़की को कोई पैसे नहीं दिए। उन्होने ये भी खुलासा किया कि लड़की देने वाले एजेंसी को शुरुआत में 30 से 36 हजार रुपये देने पड़ते हैं। इसके बाद हर महीने 2800 पगार के तौर पर एजेंसी के एजेंट आकर ले जाते थे।
नाबालिग लड़कियों को काम पर रखना ना सिर्फ कानून का उल्लंघन है। बल्कि ऐसा करने से मानव तस्करी के धंधे को बढ़ावा मिलता है। दूर-दराज के इलाकों के गरीब परिवार इस दलदल में फंसते रहते हैं। ना चाहते हुए भी गरीब मां-बाप चंद पैसों के लिए अपने बच्चों को बाहर भेजने के लिए मजबूर हैं। दलालों के बातों में फंसने के बाद इन परिवारों को ना तो पैसे मिलते हैं और ना ही बेटी।

News Source : ibn

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=3242

Posted by on Oct 2 2013. Filed under खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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