Donation (non-profit website maintenance)

Live Indian Tv Channels

अपूर्ण महानता वाला भारत!

India is incomplete with greatness!

आधुनिक सिंगापुर के जनक ली कुआन येव के विचारों व साक्षात्कारों का संकलन किया है शोधकर्ताओं – ग्राहम एलीसन, डी ब्लैकवेल और ऎली वाइने ने।

इसी साल प्रकाशित इस पुस्तक का शीर्षक है : ली कुआन येव : द ग्रांड मास्टर्स इनसाइट्स ऑन चाइना, द यूनाइटेड स्टेट्स एंड द वल्र्ड। इसी पुस्तक से भारत संबंधी कुछ अंश साभार पेश हैं :-
लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का भारतीय स्वरूप इस देश की दीर्घकालीन संभावनाओं में कैसे अवरोध पैदा करता है? भारत ने राजकीय नियोजन और नियमन में अपने कई दशक बरबाद कर दिए हैं। साथ ही इस कमी ने भारत को नौकरशाही और भ्रष्टाचार के दलदल में फंसा दिया है। अगर भारत ने विकेद्रित प्रणाली अपनाई होती तो बंगलुरू और मुंुबई जैसे कई क्षेत्रीय केंद्रोे के फलने-फूलने का रास्ता खुलता।…जाति व्यवस्था योग्यता आधारित व्यवस्था की दुश्मन रही है।…भारत अपूर्ण महानता का देश है। इसकी क्षमता बंजर पड़ी हुई है, उसका पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ है। भारत की सांवैधानिक व्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था में अंतर्निहित सीमाएं हैं, जो इसे तेज गति से आगे बढ़ने से रोकती हैं…। भारतीय राजनीतिक नेतृत्व सुधार के लिए कृतसंकल्प है, पर नौकरशाही धीमी और परिवर्तन रोधी है। क्षेत्रीय दलों का दबाव और भ्रष्टाचार ठीक नहीं है। इससे भी बढ़कर यह कि लोकप्रिय जनतांत्रिक राजनीति में शासक दलों में लगातार बदलाव के कारण नीतियों में निरंतरता भी कम रहती है।…इन सब कारणों से निवेश और रोजगार सृजन में रूकावटें आती हैं।

भारत एक वास्तविक राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह 32 राज्यों का एक समूह है, जो अंग्रेजों द्वारा बिछाई रेल लाइन के चारों तरफ बनाए गए हैं। अंग्रेज आए, उन्होंने भारत को जीता और 175 राजाओं के राज्यों को मिलाकर अपना राज स्थापित किया। अंग्रेजों ने यहां 1000 अंग्रेज और अंग्रेजों के रंग-ढंग में ढाले गए हजारों-हजार अन्य भारतीयों की मदद से शासन किया।

मैं एक ऎसे समाज के खिलाफ हूं, जिसमें अपने श्रेषतम लोेगों को शीर्ष पर पहुंचने देने की लिए जरूरी समझ न हो। मैं एक ऎसे सामंतवादी समाज के खिलाफ हूं, जिसमें आपका जन्म समाज में आपकीवरीयता क्रम को तय करता है।

भारत एक सुस्थापित सभ्यता है। अपनी प्रतिष्ठा के कारण नेहरू और गांधी के पास मौका था कि वे वो कर सके, जो कि मैंने सिंगापुर के लिए किया। लेकिन उन्होंने जाति प्रणाली को चुनौती नहीं दी। वे आदतों को नहीं तोड़ सके।

भारत और चीन के निर्माण उद्योगों पर नजर डालिए और आपको उन दो स्थानों का अंतर समझ आ जाएगा – एक वह जो जानता है कि कैसे काम पूरा किया जाना है, दूसरा वो जो काम करने के बजाय उसके बारे में बातें करता है। इसका आंशिक कारण है कि भारत मे अत्यधिक विविधता है – इसमें 32 राष्ट्र हैं, जो 330 भाषाएं बोलते हैं। जबकि चीन मे 90 प्रतिशत लोग चीनी भाषा बोलते हैं, उनकी लिपि एक है।…इस तरह दोनों देशों में भारी अंतर है।…हम सेब और संतरे की तुलना कर रहे हैं। मुझे गलत नहीं समझा जाए…भारत का अभिजन वर्ग दुनिया के किसी भी भाग के अभिजन जैसा ही है, पर वे भी समान बाधाओं का सामना करते हैं।

एक औसत भारतीय नौकरशाह आज भी स्वयं को शासक और नियामक की तरह ही देखता है न कि सुविधादाता की तरह। औसत भारतीय नौकरशाह आज भी इस बात को स्वीकार नहीं कर सका है कि लाभ कमाना और अमीर बनना कोई पाप नहीं है। औसत नौकरशाह को भारतीय व्यापारी समुदाय मे भरोसा बहुत कम है। वे भारतीय व्यापारी समुदाय को पैसा हड़पने वाले ऎसे अवसरवादी की तरह देखते हैं जिनके ह्वदय में समाज के कल्याण के लिए कोई जगह नहीं है विशेषकर अगर वह व्यवसायी विदेशी हो।

भारत का निजी सेक्टर चीन की तुलना में बेहतर है। भारतीय कंपनियां कारपोरेट कारोबार के अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार चलती हैं और चीन की तुलना में शेयर पर बेहतर रिटर्न देती हैं और भारत में पारदर्शी तथा सक्रिय-सतर्क स्टॉक मार्केट है।…भारत की बैंकिंग प्रणाली और शेयर बाजार चीन की तुलना में बेहतर है। भारत में मजबूत संस्थाएं हैं – विशेषकर न्याय प्रणाली विकसित है, जोकि बौद्धिक संपदा के सर्जन और संरक्षण के लिए बेहतर वातावरण उपलब्ध करा सकती है।…भारत को अपने लोगों को शिक्षित करना होगा अन्यथा यह अवसर बोझ भी बन सकता है।

भारत और चीन दोनों देशों की बात एक ही सांस में करना ठीक नहीं होगा। वे दो भिन्न-भिन्न देश हैं।…भारत की अर्थव्यवस्था चीन की अर्थव्यवस्था की तुलना मे ज्यादा तेज गति से बढ़ सकती है।…भारत सीमा पार अपनी ताकत का प्रदर्शन चीन से कहीं दूर तक और बेहतर तरीके से कर सकता है, पर कहीं भी यह भय नहीं है कि भारत के इरादे आक्रामक हैं…। भारत अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए कहीं भी चीन की तरह चुनौती पेश नहीं करता-और आगे भी नहीं करेगा
…चीन का पूरा फोकस अमरीका पर है और वह भारतीयों के साथ समान सहयोगी की तरह व्यवहार करता है। मैं यह पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि भारत की रूचि चीन के बढ़ते मध्यम वर्ग और उससे निर्मित बाजार में है या नहीं, क्योंकि भारत प्रतिस्पर्घा से भयभीत है। चीन ने भारत को मुक्त व्यापार समझौते का प्रस्ताव दिया था, पर भारत ने इसे स्वीकार नहीं किया।…मुक्त बाजार की सौदेबाजी जब तक है, तब तक भारत को चीन से प्रतिस्पर्घा में आगे निकलना सीखना होगा।

चीन भारत से युद्ध में उलझना नहीं चाहेगा। बल्कि वह दूसरी चुनौतियों के लिए तैयार है : उदाहरण के लिए, वह नाइजर डेल्टा में है, जहां चीनी लोग और चीनी पैसा, दोनों ही खतरे में हैं -पर उसने यह तय किया है कि यह जोखिम लेने की जरूरत है। …वह मध्य एशियाई गणतंत्र देशों से भी मित्रता सम्बंध स्थापित कर रहा है। वह कजाखिस्तान से चीन तक हजारों किमी लंबी पाइपलाइन चाहता है और इसके निर्माण की जिम्मेदारी लेेने को भी तैयार है। मुक्त बाजार प्रतिस्पर्घा यही है। यह इस तरह से नहीं है कि – अगर तुम भारत को कुछ दोगे, तो मैं तुम्हारी पिटाई करूंगा, वरन् यह इस तरह काम करता है कि – भारत तुम्हें जो कुछ भी दे रहा है, हम तुम्हें इससे भी अधिक देंगे। वह खेल को नियमों के अनुसार खेलने को तैयार है और अपनी जीत की संभावनाओं के प्रति काफी आश्वस्त भी है।

विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में चीन का अमरीका की जगह ले लेना तय है, पर नवोन्मेष या नवप्रवर्तन के केंद्र रूप में चीन कभी अमरीका की जगह नहीं ले पाएगा।
प्रस्तुति : स्वतंत्र जैन

S0urce : http://patrika.com/article.aspx?id=40841

Modern Singapore’s founding father Lee Kuan Yew is a compilation of the views and interviews researchers – Graham Allison, D. Blackwell and ऎli by Waine. The title of this book published this year: Lee Kuan Yew: The Grand Masters Insights on China, the United States and the World. Acknowledgments are presenting excerpts from the same book on India: –

The nature of democratic governance in the country’s long-term prospects how interferes? State planning and regulation in India are wasted decades. India as well as the reduction of bureaucracy and corruption have been implicated in the marshes. If Vikedrit system adopted by India like Bangalore and regional Kendraoe Munubi fruiting – opens the way to thrive …. Caste system is the enemy of merit-based system …. India is a land of greatness incomplete. Its potential is lying fallow, it is not fully utilized. There are inherent limitations in India’s constitutional system and the political system, which prevents it from moving forward at speed …. Is committed to improving the political leadership, the bureaucracy is slow and resistant to change. Regional parties are not under pressure and corruption.

India is not a real nation, but a group of 32 states, which have been built around the railway line laid by the British. British came, they won India’s states, including 175 kings established their rule. British English, and in 1000 the British complexion were cast in the thousands – thousand ruled with the help of other Indians.

I am against such a society in which your Sreshtm grown men, it is not necessary to reach the top. I am against such feudal society, in which the order is determined by your birth Apakivriyta in society.

India is a well-established civilization. Nehru and Gandhi of their reputation that they have had a chance to do that, which I did for Singapore. But he challenged the caste system. They could not break habits.

This is partly due to the tremendous diversity in India – the 32 nations who speak 330 languages. In China, 90 percent of the people speak the Chinese language, the script …. this is a huge difference in the two countries …. we’re comparing apples and oranges. If I’m not mistaken … India Abhijn class Abhijn like any part of the world, but they also face similar obstacles.

An average Indian bureaucrat still sees himself as the ruler and not the regulator as facilitator. The average Indian bureaucrats still could not accept the fact that making profit is not a sin to be rich. Average bureaucrat is little confidence in the business community. They grab the money that the Indian business community such as opportunists who see no place for the welfare of society in Hvday especially if it be foreign businessmen.

India’s private sector is better than China..

India and China, the two countries is not right to speak in the same breath.But nowhere is this fear that India has aggressive intentions …. India, like China pose to international peace anywhere does not – and will not further
China’s entire focus is on America … and he treats with the Indians as equal partners. I can not say definitively that India’s interest in China’s expanding middle class and created him or not, because India is afraid of Pratisprga.

China would not want to get involved in a war with India. Rather, it is ready for the challenges: for example, in the Niger Delta, where Chinese people and Chinese money, both are at risk – but he decided that it needs to take risks. Countries in the Central Asian republic of … friendship is formed relationship. Kilometer pipeline from Kazakhstan to China thousands he wants and is willing to Leene responsible for its construction. That Pratisprga free market. It is not like that – if you give something to India, I will beat you, but it works like that – India is whatever you want, we will give you even more. He is willing to play the game according to the rules and is quite confident of his chances of winning.

China as the world’s largest economy, the U.S. is set to take place at the center of innovation or innovation as China will ever take the place of the United States.
Presentation: Independent Jain

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=1662

Posted by on Mar 9 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

Leave a Reply

*

Recent Posts

Photo Gallery