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भारत-पाक और मोदी का भय

modi dawood

 

पाकिस्तानी गृहमंत्री और सेना-प्रमुख हमारे आड़े वक्त बड़े काम आ रहे हैं। वे एक अच्छे पड़ोसी का धर्म अनजाने ही निभा रहे हैं। उन दोनों के बयानों ने हमारे देश के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों को एक ही मंच पर ला खड़ा किया है। दोनों दलों के नेतागण और उनके साथ प्रांतीय दलों के नेताओं में एक-दूसरे पर आजकल जो जहरीले बाणों की बौछार हो रही है, उसके बीच इस पुष्प-वर्षा का कौन स्वागत नहीं करेगा?

 

लोकसभा के इस 16वें चुनाव में भारतीय लोकतंत्र ने जितनी गिरावट देखी, उतनी पहले कभी नहीं देखी थी। अपने विरोधियों को पाकिस्तान भेजने और कश्मीर को भारत से अलग करने की बातें भी हवा में तैरने लगी थीं। नेताओं के मन बहुत फट गए थे। लग रहा था कि यदि पाकिस्तान नरेंद्र मोदी का विरोध करेगा तो कांग्रेस उसे भी गले लगा लेगी। चाणक्य का सूत्र है ही- शत्रु का शत्रु, मित्र! लेकिन कांग्रेस पार्टी को बधाई कि उसने अद्भुत संयम और परिपक्वता का परिचय दिया। उसने नरेंद्र मोदी से अपनी लड़ाई को भारत का आंतरिक मामला घोषित किया और पाकिस्तानी गृहमंत्री चौधरी निसारअली खान की कठोर भत्र्सना कर दी। उसने प्रकारांतर से यह मान लिया है कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन रहे हैं और उसने एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका अभी से निभानी शुरू कर दी है। इसे मैं भारतीय लोकतंत्र की एक उपलब्धि मानता हूं।

 

चौधरी निसार ने कह दिया था कि यदि मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो वह सारे दक्षिण एशिया में अफरा-तफरी मचा देंगे। इस इलाके में अस्थिरता फैल जाएगी यानी युद्ध भी छिड़ सकते हैं। यह बात उन्होंने मोदी के इस बयान पर कह दी थी कि गृहमंत्री सुशील शिंदे बातें तो लंबी-चौड़ी करते हैं लेकिन दाऊद इब्राहिम को पकड़कर भारत क्यों नहीं लाते? वह ओसामा बिन लादेन जैसा ही गुनहगार है। लादेन को मारने के पहले क्या अमेरिका भी शिंदे की तरह बयानबाजी करता था?

 

चौधरी निसार ने मोदी के इस कथन का अर्थ यह निकाला कि यदि मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो वे पाकिस्तान में घुसकर दाऊद इब्राहिम को उठवा लेंगे या मरवा देंगे। जाहिर है कि निसार की ऐसी समझ पर तरस खाया जाना चाहिए। क्या निसार को यह पता नहीं है कि भारत और अमेरिका की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है? अमेरिका तो पहले से ही पाकिस्तान में बैठा हुआ है। उसकी फौज वहां स्वायत्त है। वह अपने फैसले खुद करती है। वह मुशर्रफ या जरदारी या शरीफ से पूछकर हुक्म नहीं देती है। पाकिस्तान की सरकार बाहर से उसकी कार्रवाइयों का विरोध करती है और अंदर ही अंदर उसका समर्थन करती है। इसीलिए लादेन मारा गया, लेकिन पाकिस्तान में पत्ता तक नहीं खड़का। क्या भारत ऐसी कोई कार्रवाई कर सकता है? वर्तमान परिस्थितियों में यह संभव ही नहीं है। चाहे भारत का प्रधानमंत्री कोई हो, इंदिरा गांधी हो या नरेंद्र मोदी!
पाकिस्तानी गृहमंत्री को चाहिए था कि ऐसा बयान देने के पहले वे अपने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से अनुमति लेते। गृहमंत्री होकर उन्होंने विदेश नीति  के मामले में अनावश्यक दखलअंदाजी की। जहां तक मेरा सोचना है, शरीफ पिछले साल मई में शपथ लेने के पहले से ही मान रहे थे कि मोदी आ रहे हैं और उन्हें उनसे व्यवहार करना पड़ेगा। उन्होंने अभी तक मोदी-विरोधी एक भी बयान नहीं दिया है बल्कि भारत में उनके नए उच्चायुक्त अब्दुल बसीत बराबर कह रहे हैं कि भारत में जो भी नई सरकार बनेगी, पाकिस्तान उससे अच्छे संबंध बनाने की कोशिश करेगा। निसार के बयान ने पाकिस्तान के आम लोगों में चिंता उत्पन्न कर दी है।

 

लाहौर, इस्लामाबाद, कराची और पेशावर से मुझे कई जिम्मेदार लोग पिछले तीन-चार दिनों से लगातार फोन कर रहे हैं और पूछ रहे हैं कि वाकई मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो क्या पाकिस्तान पर हमला बोल देंगे? उन्हें मेरा जवाब सीधा-सादा है। चुनाव के माहौल में वोट की खातिर सभी उम्मीदवार उत्तेजक और आकर्षक बातें कहते हैं। उन बातों को जरा चबा-चबाकर निगलना चाहिए। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, मोदी ने अभी तक कोई भी आक्रामक बयान नहीं दिया है। उन्होंने यही कहा है कि वे अटलजी की विदेश नीति को ही आगे बढ़ाएंगे। समझ में नहीं आता कि निसार जैसे नेता मोदी के बारे में अनावश्यक भय क्यों फैला रहे हैं?

 

इसी प्रकार पाकिस्तान के नए सेना-प्रमुख राहिल शरीफ ने अचानक ही कश्मीर का राग छेड़ दिया है। उन्होंने कश्मीरियों के लिए आत्म-निर्णय की मांग की है और यह धमकी भी दी है कि वे कश्मीर पर युद्ध भी लडऩे को तैयार हैं। उनसे कोई पूछे कि मोदी ने कब कहा है कि वे पाक-अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तानी शिकंजे से छुड़ाने के लिए युद्ध करेंगे? लगता है, जनरल शरीफ ने फारूक अब्दुल्ला के बचकाने बयान को अपने जी से लगा लिया है। वे मान बैठे हैं कि मोदी के आते ही कश्मीर पर बम-वर्षा होने लगेगी। इस मुद्दे पर भी कांग्रेस ने पाकिस्तानी सेना-प्रमुख की भत्र्सना की है। क्या बात है कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री शरीफ शराफत बरत रहे हैं और जनरल शरीफ आफत बुला रहे हैं।

 

यदि कश्मीर पर आत्म-निर्णय हो तो मैं पूछता हूं कि पाकिस्तान पर क्यों न हो? क्या पाकिस्तान का निर्माण जनता के आत्म-निर्णय से हुआ है? जिन अंग्रेजों ने पाकिस्तान बनाया, उन अंग्रेजों ने ही कश्मीर भारत को दिया। यदि कश्मीर में जनमत-संग्रह हो तो यह अधिकार पहले पाकिस्तान की जनता को मिलना चाहिए। उससे पूछा जाना चाहिए कि वह फौज के बूटों तले रहना चाहती है या नहीं? भारतीय कश्मीर में जनमत-संग्रह करवाने के पहले संयुक्तराष्ट्र के प्रस्ताव के मुताबिक पाकिस्तान को अपना कश्मीर खाली करना होगा। क्या वह करेगा? क्या वह दोनों कश्मीरों को स्वतंत्र राष्ट्र बनने देगा? सच्चाई तो यह है कि कश्मीर का सवाल पाकिस्तानी फौज के बरगद के लिए खाद-पानी की तरह है। अगर वह कश्मीर को कंधे पर उठाए न रखे तो उसकी दुकान ही बैठ जाए। उसने पूरे कश्मीर पर कब्जा करने के लिए सभी नुस्खे अपना लिए। युद्ध, घुसपैठ, आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप! सभी नुस्खे बेअसर साबित हो गए। नेता सारी बात समझ गए हैं, लेकिन फौज के लिए यह जीवन-मरण का सवाल है। इसीलिए प्रधानमंत्री से पूछे बिना ही सेना-प्रमुख ने अपनी बंदूक दाग दी।

 

इसमें शक नहीं है कि मनमोहनसिंह सरकार ने पाकिस्तान से संबंध सुधारने के भरसक प्रयास किए,  लेकिन इस लचर-पचर सरकार को कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। इसने 10 वर्ष का समय खो दिया, लेकिन अब क्योंकि मोदी का भय अपने आप फैल रहा है तो उम्मीद की जाती है कि पाकिस्तान के उग्रवादी तबकों पर लगाम लगेगी। इससे वहां की लोकतांत्रिक सरकार भी मजबूत होगी और भारत-पाकिस्तान संबंध भी सुधरेंगे। भय बिनु होत न प्रीति!

 

वेदप्रताप वैदिक
भारतीय विदेश नीति  परिषद के अध्यक्ष
[email protected]

 

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भारत -एक हिन्दू राष्ट्र

अंकिता सिंह

Web Title : 
India – Pakistan and fear of Modi

Keyword : Narendra Modi, Dawood Ibrahim, Bharatiya Janata Party (BJP), Lok Sabha Elections 2014,ved pratap vaidik

Posted by on May 3 2014. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

3 Comments for “भारत-पाक और मोदी का भय”

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