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हमारी अर्थ व्यवस्था कैसी हो?

किसी भी देश की अर्थ व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य उसके सभी नागरिकों को रोजगार और उनकी आवश्यकता की वस्तुएँ उपलब्ध कराना होता है।

इस कार्य में उसके संसाधनों का उचित उपयोग करना अनिवार्य होता है, जिनमें प्राकृतिक और भौतिक संसाधनों के अलावा मानव संसाधन भी शामिल है। वास्तव में मानव संसाधन ही सबसे पहला और मुख्य संसाधन है, जिसके उचित उपयोग की व्यवस्था करना किसी भी देश की अर्थ व्यवस्था का मुख्य दायित्व होता है।
मानव संसाधन के उचित उपयोग से हमारा तात्पर्य सभी नागरिकों को उनकी योग्यता और क्षमता के अनुसार रोजगार देना है। अधिक से अधिक रोजगार देश के विकास की कुंजी और पैमाना है। भारत सदियों से कृषि प्रधान देश रहा है। आज भी देश की आबादी का लगभग 60 प्रतिशत प्रत्यक्ष और लगभग 20 प्रतिशत अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के लिए कृषि पर निर्भर है। रोजगार बढ़ाने के कार्य में लघु और कुटीर उद्योगों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इससे एक ओर तो बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त होता है, दूसरी ओर सभी वस्तुएँ उचित मूल्य पर उपभोक्ताओं को उपलब्ध हो जाती हैं।

indian economy

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इसके विपरीत भारी उद्योग रोजगारों का स्रजन नहीं बल्कि भक्षण करते हैं। उदाहरण के लिए, कई उपभोक्ता वस्तु जैसे साबुन, तेल आदि भारी उद्योगों द्वारा कम लागत पर तैयार हो जाती हैं, लेकिन इनमें अधिकांश कार्य मशीनों के किये जाने के कारण बहुत कम लोगों को रोजगार मिल पाता है। यही रोजगार का क्षय अथवा भक्षण है।
प्राचीन काल से ही हमारे गाँव अपनी मौलिक आवश्यकता की वस्तुओं के लिए आत्मनिर्भर रहे हैं अर्थात् उनकी आवश्यकता की सभी वस्तुएँ गाँव में ही तैयार हो जाती थीं। लेकिन अब यह दृश्य बदल गया है। इसका मुख्य कारण लम्बे समय तक अंग्रेजों की गुलामी रहा है। इससे पहले मुसलमानों के शासन का ग्रामीण अर्थ व्यवस्था पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ा था, क्योंकि उन्होंने कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाने का प्रयास नहीं किया था। लेकिन अंग्रेजों ने अपने यहाँ के उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए हमारे देश के परम्परागत लघु और कुटीर उद्योगों का विनाश किया और भारतीयों को यूरोपीय देशों की बनी वस्तुओं को खरीदने के लिए बाध्य किया, जिससे देश की सम्पत्ति का एक बड़ा भाग विदेशों में चला गया और देश में गरीबी फैल गयी।

दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी इस दृश्य में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। होना तो यह चाहिए था कि देश में कुटीर उद्योगों का जाल बिछा दिया जाता और अधिक से अधिक आबादी को रोजगार देने का प्रयास किया जाता। परन्तु हमारे पहले प्रधानमंत्री पोंगा पंडित नेहरू लघु और कुटीर उद्योगों के बजाय भारी उद्योगों के समर्थक थे, इसलिए उन्होंने उन्हीं पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि जो पहले से धनी थे, उन्होंने नये-नये उद्योग धंधे लगाये, जिससे वे अधिक धनी होते चले गये और जो गरीब थे, वे अभावों में जीने को मजबूर हो गये।
हमारी आज की कमजोर अर्थ व्यवस्था उन्हीं गलत नीतियों का अवश्यंभावी परिणाम है। गलत या कमजोर नींव पर मजबूत निर्माण नहीं किया जा सकता। हालांकि खुली और उदार अर्थ व्यवस्था के इस युग में अब इस नीति को एकदम उलटना तो संभव नहीं है, पर इतना अवश्य किया जा सकता है कि कुछ निश्चित उपभोक्ता वस्तुओं का निर्माण केवल कुटीर उद्योगों द्वारा किया जाना आरक्षित कर दिया जाये। मेरे विचार से यदि केवल खाद्य वस्तुओं का निर्माण और विपणन ही कुटीर उद्योगों के लिए आरक्षित कर दिया जाये, तो देश की अर्थ व्यवस्था पटरी पर आ सकती है। उदाहरण के लिए, आलू चिप्स, चाऊमीन, पिज्जा, बर्गर, डबल रोटी, बिस्कुट, मिठाई, समोसा, सब्जी जैसी वस्तुओं के उत्पादन के लिए विदेशी कम्पनियों की कोई आवश्यकता नहीं है। यह कार्य हमारे नौजवान भी कम लागत में अच्छी तरह कर सकते हैं।


इनके अलावा कुछ प्रमुख उपभोक्ता वस्तुओं जैसे साबुन, तेल, टूथ पेस्ट आदि का निर्माण भी केवल स्वदेशी लघु उद्योगों के लिए आरक्षित कर दिया जाना चाहिए। गुणवत्ता के नाम पर विदेशी कम्पनियों को इनके व्यापार के बहाने लूट करने की अनुमति देना मूर्खता है। शेष सभी वस्तुओं का निर्माण और विपणन करने के लिए विदेशियों को किसी भी भारतीय कम्पनी में केवल 49 प्रतिशत साझेदारी की अनुमति होनी चाहिए। खुदरा व्यापार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ.डी.आई.) की अनुमति देना बहुत बड़ी मूर्खता है।
यदि इन नीतियों का पालन किया जाये, तो एक ओर तो हमारे देश की विशाल जनसंख्या को भारी मात्रा में रोजगार मिलेगा और विदेशी कम्पनियों द्वारा की जाने वाली अनुचित लूट बन्द होगी, दूसरी ओर हमारे देश को विश्व की खुली अर्थ व्यवस्था का भी लाभ मिलता रहेगा।

 

लेखक : विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

 

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Posted by on Sep 30 2012. Filed under मेरी बात, सच. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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