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नेहरू के घर को लेकर इंदिरा ने किया था लाल बहादुर शास्त्री जी का अपमान

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मुगलसराय के साधारण परिवार में जन्मे लाल बहादुर शास्त्री बहुत ही सादा जीवन जीते थे। शास्त्री प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बावजूद अपना सादापन भूले नहीं थे। देश में अनाज के संकट को देखते हुए उन्होंने देश में जहां कहीं भी खाली जमीन हो, उस पर अनाज उगाने की बात कही थी। इस बात पर अमल की शुरुआत उन्होंने 10, जनपथ नई दिल्ली स्थित अपने निवास में बने लॉन में गेहूं उगाने के साथ की थी। प्रधानमंत्री निवास में हल जोतते हुए उनकी तस्वीरें आज भी कोई भूल नहीं पाया है। उन्होंने देश के लोगों से हर हफ्ते एक दिन का व्रत रखने का आह्वान किया था।

 

जमीन पर बैठकर खाना खाते थे शास्त्रीप्रधानमंत्री के पद पर पहुंचने के बाद भी लाल बहादुर शास्त्री में घमंड या दिखावापन नहीं था। वे इतने सरल थे कि प्रधानमंत्री रहते हुए जमीन पर बैठकर खाना खाते थे। ‘डेज विद लाल बहादुर जी: ग्लिंप्सेज फ्रॉम द लास्ट सेवेन ईयर्स’ नाम की किताब लिखने वाले पूर्व आईएएस अफसर राजेश्वर प्रसाद ने अपनी किताब में शास्त्री के जीवन खासकर उनके आखिरी सात सालों का बखूबी ब्योरा दिया है। इस किताब में प्रसाद लिखते हैं, ‘मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है कि 5 अगस्त, 1965 का दिन। उस दिन प्रधानमंत्री शास्त्री जी के घर यानी 10, जनपथ नई दिल्ली में कोई धार्मिक अनुष्ठान हो रहा था। उस दिन श्रीमती ललिता शास्त्री पूजा कर रही थीं। पूजा के बाद शास्त्री जी के साथ हम लोगों ने फर्श पर बैठकर पत्तल में खाना खाया था। इस मौके पर शास्त्री जी का निजी स्टाफ भी मौजूद था और सबने इसी तरह से खाना खाया।’ जबकि शास्त्री जी उस समय उस कुर्सी पर थे, जिस पर कुछ साल पहले तक जवाहरलाल नेहरू जैसे नफासत पसंद शौकीन नेता बैठा करते थे। क्या आप तब या अब किसी प्रधानमंत्री को अपने घर में फर्श पर बैठकर खाना खाने की कल्पना भी कर सकते हैं?

 

इंदिरा ने तीन मूर्ति भवन में न रहने को कहा थालाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस बात की अटकल लगाई जा रही थी कि वह तीन मूर्ति भवन में रहेंगे। चूंकि, जवाहरलाल नेहरू अपने निधन से पहले बतौर प्रधानमंत्री वहीं रहा करते थे। लेकिन शास्त्री के प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी ने एक चिट्ठी शास्त्री को लिखी। इस चिट्ठी में इंदिरा ने शास्त्री पर तंज कसे। इंदिरा ने लिखा था कि नेहरू से मिलने बहुत लोग आया करते थे, इसलिए उन्हें तीन मूर्ति जैसे बड़े बंगले की जरुरत थी। इसके अलावा इंदिरा गांधी ने तीन मूर्ति भवन को नेहरू की याद में म्यूजियम में तब्दील करने की बात भी लिखी। इस चिट्ठी को पढ़ने के बाद शास्त्री को बहुत दुख हुआ था। इसके बाद इंदिरा से उनका रिश्ता बहुत सहज नहीं रह गया। लाल बहादुर शास्त्री ने नई दिल्ली स्थित तीन मूर्ति की जगह 10, जनपथ में रहने का फैसला किया था।

 

विजयलक्ष्मी पंडित से भी अच्छे रिश्ते नहीं थेदेश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित ने शास्त्री की तीखी आलोचना की थी। उस दौर में संसद सदस्य थीं, जब शास्त्री देश के प्रधानमंत्री थे। कई मुद्दों पर तेजी से निर्णय न ले पाने की वजह से विजयलक्ष्मी पंडित ने संसद में शास्त्री के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उन्होंने शास्त्री को प्रिजनर ऑफ इनडिसिजन यानी अनिर्णय का कैदी तक करार दे दिया था। इस बयान के बाद दोनों के बीच बहुत अच्छे रिश्ते नहीं रह गए थे।

 

पाकिस्तान को ललकारा15 अगस्त, 1965 को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से भाषण देते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान को चेतावनी दे डाली थी। ‘डेज विद लाल बहादुर जी: ग्लिंप्सेज फ्रॉम द लास्ट सेवेन ईयर्स’ में पूर्व आईएएस अफसर राजेश्वर प्रसाद ने लिखा है, ’15 अगस्त, 1965 को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से शास्त्री ने कहा था-हम हथियार का जवाब हथियार से देंगे। हम रहें या न रहें। यह देश बना रहे, यह झंडा लहराता रहे।’ इसलिए जब सेना प्रमुखों ने सीजफायर लाइन को पार करने की अनुमति मांगी तो शास्त्री ने देर नहीं की।

 

साभार: “राष्ट्र सर्वप्रथम सर्वोपरि”

वन्दे मातरम…

जय हिंद… जय भारत…

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Posted by on Aug 31 2013. Filed under इतिहास. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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