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चौपट राजकुमार…

 

एक साल पहले अभूतपूर्व जीत के साथ ढेरों उम्मीदें जगाने वाले अखिलेश यादव क्यों इनमें से ज्यादातर उम्मीदों पर खरा उतरने में सफल नहीं हो रहे हैं? अतुल चौरसिया की रिपोर्ट.RTR2Z570_472198961

उत्तर प्रदेश की पिछली और वर्तमान सरकारों में विचित्र-सी समानता है. 2007 में मायावती की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी थी, 2012 में अखिलेश यादव की. तब मायावती ने सपना देखा था कि दो साल बाद, 2009 के लोकसभा चुनाव में 50 से 60 सीटें जीतकर वे देश की पहली दलित प्रधानमंत्री बन जाएंगी; 2012 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद से मुलायम सिंह यादव भी वैसा ही सपना देख रहे हैं. साल भर के भीतर ही मायावती का सपना टूटने की शुरुआत तब हो गई थी जब उनके एक विधायक शेखर तिवारी पर पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर एमके गुप्ता की हत्या का आरोप लगा. इंजीनियर का दोष था कि उसने मायावती के जन्मदिन की तैयारी के लिए चंदा देने से इनकार कर दिया था. इसके बाद से उत्तर प्रदेश की जनता का मायावती से मोहभंग होना शुरू हो गया था. 2009 के लोकसभा चुनावों में बहनजी 20 सीटों पर सिमट गईं और 2012 में उत्तर प्रदेश की सत्ता भी उनके हाथ से जाती रही. अब साल भर के भीतर ही प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार के विवादित मंत्री राजा भैया पर भी राज्य के एक तेज-तर्रार युवा पुलिस अधिकारी जिया-उल-हक की हत्या का आरोप लगा है. दो मार्च की शाम प्रतापगढ़ की कुंडा तहसील के एक गांव बलीपुर में वहां के प्रधान नन्हे लाल यादव की कुछ लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी. गांव-वालों का शक गांव के ही गुड्डू सिंह और कामता पाल पर था. गुड्डू सिंह राजा भैया के बेहद नजदीकी हैं और नन्हे यादव के प्रधान बनने के बाद से ही दोनों के बीच तनातनी थी. दोनों के बीच जमीन का विवाद भी था. जब नन्हे यादव और गुड्डू सिंह के समर्थकों के बीच फायरिंग हो रही थी तभी वहां कुंडा के क्षेत्राधिकारी जिया-उल-हक भी पहुंच गए. इसके बाद फायरिंग में नन्हे यादव के छोटे भाई सुरेश यादव और जिया-उल-हक की मृत्यु हो गई.

पुलिस ने पहले तो इस मामले में गुड्डू सिंह और कामता पाल समेत कुल चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी लेकिन इसमें राजा भैया का नाम नहीं था. इसके बाद जिया-उल-हक की पत्नी परवीन आजाद ने एक और एफआईआर लिखवाई जिसमें उन्होंने अपने पति की हत्या के लिए राजा भैया को नामजद किया. परवीन की दलील थी कि काफी समय से उनके पति को राजा भैया की तरफ से धमकी मिल रही थी. उनके पति पिछले साल जून महीने में कुंडा के अस्थान गांव में हुए सांप्रदायिक दंगों की जांच कर रहे थे जिसमें राजा भैया की संलिप्तता के संकेत मिले थे. पुलिस सूत्रों के मुताबिक अपनी जांच रिपोर्ट में जिया-उल-हक ने राजा भैया के लिए प्रतिकूल टिप्पणियां की हैं. राजा भैया से जिया-उल-हक के टकराव की एक और जो वजह सामने आ रही है वह है प्रतापगढ़ में नदियों से होने वाला रेत का अवैध खनन.
सपा की सरकार आने के बाद दंगों की घटनाएं बढ़ गई हैं. विधानसभा में अखिलेश यादव के बयान के मुताबिक 31 दिसंबर, 2012 तक राज्य में कुल 27 सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं

पुलिस सूत्रों के मुताबिक इस पूरे धंधे पर राजा भैया के लोगों का आधिपत्य है. इसी साल फरवरी में जिया-उल-हक ने अवैध खनन से जुड़ी कई टैक्टर ट्रालियों को जब्त भी किया था जिनका संबंध गुड्डू सिंह से बताया जाता है. जब्त किए गए ये ट्रैक्टर आज भी मानिकपुर थाने में खड़े हैं. एक वजह और है. राजा भैया कुंडा में हर हफ्ते अपना दरबार लगाते हैं. इस दरबार के बारे में मशहूर है कि जिले का हर अधिकारी कभी न कभी इसमें हाजिरी लगाने जरूर पहुंचता है. लेकिन जिया-उल-हक के बारे में कहा जाता है कि वे कभी भी इस दरबार में नहीं गए. प्रतापगढ़ की सांसद राजकुमारी रत्ना सिंह इस घटना से जुड़ी एक बात और बताती हैं, ‘पुलिसवाले जिया-उल-हक को छोड़कर इसलिए भागे क्योंकि वे किसी पक्ष पर कार्रवाई कर ही नहीं सकते थे. दोनों ही पक्ष राजा भैया का करीबी होने का दावा करते हैं. किसी पुलिसवाले की हिम्मत नहीं है कि वे राजा भैया के खिलाफ जुबान भी खोल दे, कार्रवाई तो दूर की बात है.’

इस घटना के बाद राजा भैया ने बहुचर्चित बयान दिया कि अगर उन्हें जिया-उल-हक से परेशानी होती तो वे उनका ट्रांसफर करवा देते उनकी हत्या करवाने की जरूरत नहीं थी. लेकिन सच्चाई इतनी भर नहीं है. प्रतापगढ़ के एसपी अनिल कुमार राय, जिनका इस घटना के बाद ट्रांसफर कर दिया गया है, के बारे में पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि उन्होंने राजा भैया के ट्रांसफर-पोस्टिंग के आदेशों को जिले में लागू करने से साफ इनकार कर दिया था.

मायावती और अखिलेश के बीच समानता की कड़ी पहले साल में उनके करीबियों पर लगे हत्या के आरोपों पर आकर टूट जाती है. शेखर तिवारी को हत्या की घटना के बाद सीधे जेल में डाल दिया गया था, जबकि राजा भैया के मामले में सरकार ने अपने सिर कोई तोहमत लेने के बजाय मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया है. नेता प्रतिपक्ष और मायावती के करीबी नसीमुद्दीन सिद्दीकी इसे इस तरह बताते हैं, ‘जो जितना बड़ा अपराधी, वह उतना बड़ा समाजवादी है. बहनजी के शासन में जिन लोगों की हैसियत नहीं थी वे आज राजा बने बैठे हैं.’

कुंडा की घटना अपवाद नहीं है. अकबरपुर के टांडा कस्बे में अगले ही दिन तीन मार्च को हिंदू युवा वाहिनी के नेता राम बाबू गुप्ता की गोली मारकर हत्या कर दी गई. इसमें स्थानीय सपा विधायक की भूमिका बताई जा रही है. इसके बाद वहां मुसलमानों के घर-दुकान फूंक दिए गए. कर्फ्यू लगाना पड़ा. वहां अब भी तनाव कायम है. अखिलेश यादव की सरकार आने के बाद सांप्रदायिक दंगों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है. विधानसभा में अखिलेश यादव द्वारा दिए एक जवाब के मुताबिक मार्च, 2012 से लेकर 31 दिसंबर,  2012 तक राज्य में कुल 27 सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं जिनमें 97 लोगों की मृत्यु हुई है. इसमें 2013 के मामले शामिल नहीं है. मथुरा का कोसीकलां, बरेली, फैजाबाद, गाजियाबाद,लखनऊ, इलाहाबाद, कुशीनगर समेत एक के बाद एक लगातार दंगे होते जा रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू बताते हैं, ‘दंगों को लेकर सपा का दृष्टिकोण अलग है. सपा इसमें अपना राजनैतिक फायदा देखती है. दंगों को रोकने में सपा की तब तक कोई दिलचस्पी नही रहती जब तक कि इसके नतीजे में मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण उसके पक्ष में होता रहे.’

राजू की बात को यदि धरातल पर देखें तो जिन-जिन जिलों में दंगे हुए हैं, मसलन लखनऊ (भाजपा), बरेली (कांग्रेस), फैजाबाद (कांग्रेस), गाजियाबाद (भाजपा) आदि, उनमें से ज्यादातर की लोकसभा सीटें विपक्ष के पास हैं. ऐसे में मुसलिम वोटों का ध्रुवीकरण होने से 2014 के लोकसभा चुनावों में शायद सपा को अपना हित होता दिख रहा है. कानून-व्यवस्था के मामले में सपा के नजरिये के बारे में एक आईएएस अधिकारी, जो इस समय अखिलेश सरकार के बेहद नजदीकी हैं, एक घटना के जरिए बताते हैं, ‘असम में हुए दंगों के बाद लखनऊ के मुस्लिम समुदाय ने विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था. देखते ही देखते यह आयोजन हिंदू-विरोध में बदल गया. पूरे शहर में प्रदर्शनकारियों ने अराजकता फैला दी. गौतम बुद्ध पार्क में बुद्ध की मूर्तियां तोड़ दी गईं, हजरतगंज में आगजनी हुई, बलवाई खुले आम हाथ में तलवार और छुरे लेकर घूम रहे थे. इस सारी घटना को कवर कर रहे मीडियावालों को भी निशाना बनाया गया क्योंकि कुछ दिन पहले ही मुंबई में इसी तरह की घटना के बाद मीडिया की फुटेज के आधार पर बलवाइयों की गिरफ्तारी हुई थी. पहले तो राजनीतिक दबाव के चलते दंगाइयों के खिलाफ कोई कार्रवाई ही नहीं की गई. बाद में जब कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया तो मीडिया की वीडियो रिकॉर्डिंग में कई दंगाइयों की पहचान करके उन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन तमाम स्पष्ट सबूतों के बावजूद गिरफ्तारी के एक घंटे के भीतर उन्हें रिहा कर दिया गया.’

गन्ना शोध संस्थान के अध्यक्ष केसी पांडे वीडियो में एसएसपी राणा को घूस की पेशकश करते पाए गए. सरकार ने पांडे पर कार्रवाई करने के बजाय राणा को ही पुलिस मुख्यालय से अटैच कर दिया!
एक अधिकारी का यह कुबूलनामा कानून व्यवस्था के प्रति प्रदेश की मौजूदा सरकार के नजरिये की चुगली करता है. लखनऊ के मशहूर शायर मुनव्वर राना सरकार के इस रुख की आलोचना एक शेर से करते हैं, ‘रखता जो सर हथेली पर, जलता न उसका घर. लेकिन वो अपनी जान बचाने में रह गया; अखिलेश यादव अपनी हुकूमत बचाने में लगे हुए हैं. ऐसे में सूबे की बर्बादी तय है.’ कानून व्यवस्था के प्रति सपा की हीलाहवाली का ही नतीजा है कि एक तरफ प्रदेश के सात जिलों में पुलिस अधीक्षक ही नहीं हैं और उधर 35 के करीब आईपीएस अधिकारियों को डीजीपी दफ्तर से अटैच करके रखा गया है. इनमें एसपी, एसएसपी और डीआईजी रैंक के अधिकारी शामिल हैं.

डगमगाती व्यवस्था का नजारा लेने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं है. यदि एक ही दिन की बात करें तो 22 फरवरी को राजधानी लखनऊ में शहर के मुख्य इलाके की मुथूट की शाखा से लुटेरे दिन दहाड़े छह करोड़ रुपये लूट ले गए. आज तक इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है. उसी दिन राजधानी के प्रतिष्ठित एमिटी स्कूल की एक शिक्षिका अर्चना शुक्ला को कैंपस में ही अनुराग गुप्ता नाम के छात्र ने तमाचा जड़ दिया. अपनी शिकायत में अर्चना ने पुलिस को बताया है कि अनुराग लंबे समय से उन्हें परेशान कर रहा था. अनुराग गुप्ता विधूना के सपा विधायक प्रमोद गुप्ता का बेटा है. मुलायम सिंह की पत्नी साधना गुप्ता और प्रमोद गुप्ता की पत्नियां सगी बहनें हैं. इससे पता चलता है कि सूबे में नेताओं के परिवारवाले और रिश्तेदार किस तरह से व्यवहार करते हैं.

यह सपा के राज-काज की अपनी शैली है. इसमें नेताओं और रिश्तेदारों के आगे पुलिस और प्रशासन की कोई हैसियत नहीं है. उन्हें सारा काम अपने इलाके के नेताओं की मनमर्जी से करने की सख्त हिदायत है. इसका एक नमूना गोंडा जिले में घटी घटना से लगाया जा सकता है. गोंडा के एसएसपी नवनीत राणा ने पशुओं की तस्करी कर रहे कुछ ट्रक पकड़ लिए थे. इन ट्रकों और पशुओं को छुड़ाने के लिए उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के अध्यक्ष केसी पांडे ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा है. वे नवनीत राणा को घूस देने से लेकर धमकाने तक सारे हथकंडे अपना रहे थे. नवनीत राणा ने यह बात अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बताई. राणा के मुताबिक उन्होंने अधिकारियों के कहने पर इस पूरी घटना का स्टिंग ऑपरेशन कर दिया. केसी पांडे वीडियो में राणा को घूस की पेशकश करते हुए पकड़े गए. घटना मीडिया में उछल गई. लोगों ने राज्यमंत्री को बेशर्मी से घूस देने की पेशकश करते और धमकी देते देखा. जवाब में अखिलेश सरकार ने आला दर्जे की बेशर्मी दिखाई. उन्होंने रंगे हाथ पकड़े गए केसी पांडे पर कार्रवाई करने के बजाय नवनीत राणा को एसएसपी पद से हटाकर पुलिस मुख्यालय से अटैच कर दिया.

Supporters of Yadav, new chief minister of India's northern Indian state of Uttar Pradesh, cheer in Lucknow

इस तरह की घटनाओं से अधिकारियों और नौकरशाहों में भी क्षोभ का माहौल है. लखनऊ के पूर्व डीएम रहे आरएन त्रिपाठी कहते हैं, ‘आज अधिकारियों के मन में यह बात बैठ गई है कि जब सारा काम नेताओं की मर्जी से होगा तब जिम्मेदारी भी उन्हीं के सर आनी चाहिए. नेता गलत काम करके बच निकलते हैं और अधिकारी शिकार बन जाते हैं.’ इसी का नतीजा है कि प्रदेश में कामकाज अटक-सा गया है.’ यह वही स्थिति है जिसका रोना मुलायम सिंह, आजम खान और स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बार-बार रोते पाए जाते हैं कि नौकरशाही ठीक से काम नहीं कर रही है. पर ऐसा क्यों है? साल भर के भीतर अखिलेश यादव ने छोटे-बड़े तकरीबन 3,000 प्रशासनिक फेरबदल किए हैं. अगर हम जिलेवार प्रशासनिक अधिकारियों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर सपा के खास अधिकारी तैनात हैं. मसलन लखनऊ को ही लें- जावेद उस्मानी- मुख्य सचिव, अनीता सिंह- सचिव मुख्यमंत्री, शंभू सिंह- सचिव मुख्यमंत्री, एसी शर्मा – डीजीपी, सुभाष चंद्रा- आईजी लखनऊ रेंज, नवनीत सिकेरा- डीआईजी लखनऊ रेंज, अनुराग यादव- डीएम लखनऊ, एसएन यादव- सीएमओ लखनऊ, बासुदेव यादव- निदेशक माध्यमिक शिक्षा आदि.

एक प्रमोटी आईपीएस अधिकारी अजय मोहन शर्मा ने रामगोपाल यादव के एटा आने पर न केवल सबके सामने पैर छुए बल्कि उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया

इन सारे अधिकारियों को मुलायम सिंह यादव का करीबी माना जाता है. इसके बावजूद अगर मुलायम सिंह बार-बार यह बयान देते हैं कि अधिकारी काम नहीं कर रहे हैं तो इसके पीछे जानकार लोग एक सोची -समझी रणनीति और कुछ हद तक मजबूरियां भी मानते हैं. मुलायम सिंह यादव ने यह बयान कभी भी आधिकारिक तौर पर मीडिया के सामने नहीं दिया है. वे कार्यकर्ताओं के बीच पार्टी दफ्तर में इस तरह की बातें कहते हैं. इसके कुछ तात्कालिक लाभ हैं. दूर-दराज के इलाकों से आया कार्यकर्ता नेताजी के मुख से अखिलेश और अधिकारियों को झिड़कवा कर गदगद हो जाता है. इस तरह से मुलायम सिंह यादव कार्यकर्ताओं के बीच किसी भी तरह के असंतोष को दबाने का काम करते हैं. मुलायम सिह यादव के सामने अंतिम लक्ष्य है 2014 का लोकसभा चुनाव. कार्यकर्ताओं की कोई भी नाराजगी उनके इस सपने को पलीता लगा सकती है. इसके अलावा वे पार्टी के बिल्कुल भीतर तक यह संदेश भी देना चाहते हैं कि वे आज भी प्रासंगिक हैं और हर जगह उन्हीं की चलती है. उनकी दूसरी मजबूरी है परिवार और सरकार के भीतर मचा घमासान. एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी जो कुछ समय पहले तक सपा के बेहद करीब हुआ करते थे, इस लड़ाई को बेहद दिलचस्प अंदाज में बयान करते हैं, ‘मुलायम सिंह अगर नौकरशाहों को निशाना बनाने की बजाय अपना परिवार संभाल लें तो हालात सुधर जाएंगे. राज्य में कुल साढ़े छह मुख्यमंत्री हैं. मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव, राम गोपाल यादव, आजम खान, अनीता सिंह, साधना गुप्ता (मुलायम सिंह यादव की पत्नी) और आधे अखिलेश यादव खुद हैं.’

साधना गुप्ता का सरकार पर नियंत्रण रखने का अपना तंत्र है. इसमें अनीता सिंह और कुछ समय पहले तक सचिवालय में विशेष सचिव रहे हीरालाल गुप्ता जैसे कुछ विश्वासपात्र अधिकारी शामिल हैं. उन्हें जो भी काम करवाना होता है वे सीधे इन अधिकारियों को आदेश कर देती हैं. कई मामलों में तो मुख्यमंत्री को इसके बारे में जानकारी तक नहीं होती. इसकी एक बड़ी वजह अनीता सिंह और मुख्यमंत्री के बीच
संवाद की कमी भी है, जबकि अनीता सिंह मुख्यमंत्री की सचिव हैं.

रामगोपाल यादव का अपना मिनी सचिवालय है जिसमें उनके विश्वासपात्र अधिकारी आते हैं. 17 जनवरी को सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक लखनऊ में थी. अगले दिन रामगोपाल यादव सीधे राज्य सचिवालय के पंचम तल पर स्थित मुख्यमंत्री कार्यालय जा पहुंचे. यहां उन्होंने बाकायदा अधिकारियों की बैठक ली. यह घटना ऐसी है कि जैसे साउथ ब्लॉक स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में मनमोहन सिंह के स्थान पर सोनिया गांधी अधिकारियों की बैठक लेने लगें. एक घटना एटा जिले की भी है. यहां के एक प्रमोटी आईपीएस अधिकारी अजय मोहन शर्मा ने राम गोपाल यादव के एटा आने पर न केवल उनके खुले आम पैर छुए बल्कि उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया. यह प्रोटोकॉल का सरासर उल्लंघन है. रामगोपाल यादव एक सामान्य राज्यसभा सांसद हैं. उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिए जाने का कोई औचित्य नहीं था. लेकिन यह अधिकारियों की वह फौज है जो यादव परिवार की कृपा से मौज कर रही है और इस तरह की घटनाएं मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश की स्थिति को बुरी तरह डावांडोल कर रही हैं.

सत्ता की बंदरबांट में शिवपाल यादव ने अपने महज 26 साल के बेटे आदित्य यादव को पीसीएफ का चेयरमैन बनवा दिया है; उनकी पत्नी के लिए भी ऐसे ही किसी पद की चर्चा है

शिवपाल यादव की अखिलेश यादव से नाराजगी खुला रहस्य है. मुख्यमंत्री बनने से चूक गए शिवपाल यादव ने अब सत्ता का ज्यादा-से-ज्यादा हिस्सा हासिल करने का दूसरा रास्ता निकाला है- अपने लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाना. इस कड़ी में उन्होंने अपने बेटे आदित्य यादव उर्फ अंकुर यादव को उत्तर प्रदेश प्रादेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन (यूपीपीसीएफ) का चेयरमैन नियुक्त करवा दिया है. यूपीपीसीएफ का सालाना बजट 2,000 करोड़ रुपये का है. 26 वर्षीय अंकुर यादव की राजनीतिक योग्यता और शिक्षा-दीक्षा इस पद के लायक है भी या नहीं, इस समय यही सबसे बड़ा सवाल है. स्वयं शिवपाल यादव ने पिछले साल सितंबर महीने में तहलका को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा था कि वे अपने बेटे को राजनीति में नहीं लाएंगे क्योंकि यह बहुत गंदी चीज है. उनकी पत्नी भी नहीं चाहतीं कि अंकुर राजनीति में जाए. मगर आज चर्चा यह भी चल रही है कि वे अपनी पत्नी के लिए भी ऐसे ही किसी पद की तलाश में हैं. इससे भी विचित्र घटना का दर्शन प्रदेश की जनता ने जनवरी महीने में किया. सुरभि शुक्ला नाम की एक सपा कार्यकर्ता हैं जिन्हें शिवपाल यादव का करीबी माना जाता है. उन्हें माध्यमिक शिक्षा परिषद का चेयरमैन नियुक्त कर दिया गया. बताया जाता है कि अखिलेश को इस बात की जानकारी अगले दिन अखबारों से मिली, जबकि इस तरह की नियुक्तियां मुख्यमंत्री अपने विवेक से करता है. बाद में इस नियुक्ति को रद्द कर दिया गया.

एहसासे कमतरी से वरिष्ठ सपा नेता और पार्टी का मुस्लिम चेहरा आजम खान भी जूझ रहे हैं. लेकिन वे अपना गुस्सा निकालने के लिए जुबानी जमा-खर्च से काम चला लेते हैं. अखिलेश यादव जब ताजमहल को दुनिया का सबसे शानदार तोहफा कहते हैं तो वे ताजमहल को गिरवा देने का अभियान चलाने की बात करते हैं. हालांकि अब वे कहते हैं कि यह बात उन्होंने मायावती के संदर्भ में कही थी लेकिन कमअक्ल पत्रकारों ने इसे अखिलेश से जोड़ दिया. कुछ दिन पहले विधानसभा का उत्तरशती समारोह था. समारोह में अचानक ही आजम खान अखिलेश यादव को टीपू के नाम से संबोधित करने लगे. टीपू अखिलेश का घर का नाम है. अखिलेश ने इस बात पर आपत्ति जताते हुए कहा कि उन्हें उनके नाम से बुलाया जाए क्योंकि घर के नाम से सिर्फ घरवाले ही बुला सकते हैं. लेकिन आजम खान नहीं माने.

अधिकारी इस स्थिति का जमकर फायदा उठा रहे हैं. सब किसी न किसी गुट से ताल्लुक रखते हैं. ऐसे में वे विपक्षी समूह के नेताओं की बात पर ध्यान ही नहीं देते. सभी को इस बात का अहसास है कि उन्हें बस अपने खैरख्वाहों के हिसाब से चलना है. लेकिन शायद मुलायम सिंह यादव के लिए दिल्ली तक पहुंचने का यह आखिरी मौका है. 2014 सर पर है और वे बिखरे हुए सपाई कुनबे को बटोर पाने में बेबस सिद्ध हो रहे हैं. इसके नतीजे में भी उन्हें अधिकारियों के खिलाफ बयान देने पड़ रहे हैं. वैसे अधिकारियों को काबू में रखने के लिए एक और रास्ता निकाला जा चुका है. एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी इसे थ्री-सी फॉर्मूले की संज्ञा देते हैं. थ्री-सी यानी करप्ट, क्लोज और कांपिटेंट. उनके मुताबिक ये ज्यादातर वे पीसीएस और पीपीएस अधिकारी है जिन्हें अखिलेश सरकार ने पदोन्नति दी है. राज्य में करीब 110 पीसीएस और पीपीएस अधिकारियों को आईएएस और आईपीएस का दर्जा दिया गया है और करीब 40 से 45 जिलों में इनकी तैनाती कर दी गई है. एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के मुताबिक आईएएस और आईपीएस अधिकारी कई बार सही-गलत कामों को करने से इनकार कर देते हैं, जबकि प्रमोटी अधिकारियों के साथ ऐसी संभावनाएं कम रहती हैं.

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प्रशासनिक कामकाज में शिथिलता और चरमराती कानून व्यवस्था की एक और बड़ी वजह है अखिलेश यादव की खुद की कार्यशैली. बेहद महत्वपूर्ण पद पर लखनऊ में तैनात एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘साल भर के दौरान मुख्यमंत्री ने अधिकारियों के साथ सिर्फ दो समीक्षा बैठकें की हैं. अगर आप पिछली मायावती सरकार को देखें तो अधिकारियों की रिव्यू मीटिंग हर महीने होती थी. मायावती स्वयं अधिकारियों की नकेल कस कर रखती थीं. ऐसा न होने की वजह से अधिकारी खुद को आजाद और गैरजवाबदेह महसूस करने लगे हैं. उनकी कोई जवाबदेही ही रह नहीं गई है.’ इसके अलावा अखिलेश भले ही प्रदेश के मुख्यमंत्री हों लेकिन ज्यादातर महत्वपूर्ण मंत्रालय मुलायम सिंह के बेहद नजदीकी लोगों के पास हैं. अंबिका चौधरी, आजम खान, दुर्गा यादव, बलराम यादव, विनोद सिंह क्षत्रिय आदि तमाम ऐसे नाम हैं जिन पर अखिलेश का जोर नहीं चलता. यही बात पंचम तल पर तैनात महत्वपूर्ण अधिकारियों के बारे में कही जा सकती है. पंचम तल की सुगबुगाहट पर यकीन करें तो जावेद उस्मानी, अनीता सिंह और मुख्यमंत्री के बीच अक्सर आपसी संवाद तक नहीं होता. ये अधिकारी अपने निर्देश दूसरे नेताओं से लेते हैं. एक सपा नेता के शब्दों में, ‘अखिलेश अभी तक प्रदेश अध्यक्ष वाली मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं. खुद को एक सक्षम मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर पाने में वे असफल सिद्ध हो रहे हैं. न तो उनकी अपने विश्वासपात्र अधिकारियों की कोई टीम है न ही वरिष्ठ मंत्रियों में किसी का समर्थन उन्हें पूरी तरह से हासिल है. उन्हें ऐसे ही लोगों के साथ काम करना है. ले-देकर कुछेक छोटे स्तर के वे नेता उनके करीबी हैं जिन्हें अखिलेश के कोर ग्रुप का सदस्य माना जाता है, लेकिन वे किसी भी महत्वपूर्ण पद तक नहीं पहुंच सके हैं.’

अखिलेश ने एक असाधारण परंपरा की नींव रखी है-पीड़ितों के घर-घर जाकर 4-5 लाख रुपये के स्थान पर 40-50 लाख रुपये का मुआवजा बांटने की और दो-दो लोगों को नौकरी देने की

अखिलेश को नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि वे तकनीक से वास्ता रखने वाली आधुनिक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं. उन्हें पावर-पॉइंट प्रेजेंटेशन जैसी चीजें खूब भाती हैं. आए दिन मुख्यमंत्री आवास से लेकर पांच सितारा होटलों में बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट कंपनियां मुख्यमंत्री के सम्मुख नई-नई योजनाएं पेश करती हैं. जबकि नेताजी का कभी कंप्यूटर और अंग्रेजी जैसी चीजों से कभी कोई वास्ता ही नहीं रहा था. नेताजी अपना सारा समय अधिकारियों के साथ बैठक या फिर कार्यकर्ताओं के साथ बिताते थे और उन्हें जमीनी हकीकत का अंदाजा रहता था. नेताजी को आज भी इस बात के लिए जाना जाता है कि उनकी याददाश्त इतनी तेज है कि कोई कार्यकर्ता उन्हें बरगला नहीं सकता. इसके विपरीत अखिलेश मुख्यमंत्री आवास आने वाले लोगों से अक्सर मिलकर उनकी समस्याएं सुन-समझ लेते हैं मगर इसके बारे में ज्यादा लोगों को पता न होने की वजह से कुछ विशेष लोग बार-बार उनसे मिलकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं. जबकि मुलायम सिंह के यहां अगर कोई कार्यकर्ता दोबारा से पहुंच जाता है तो वे उसे वहीं डपट कर क्षेत्र में जाने की हिदायत दे देते हैं.

जो हो रहा है उसे अखिलेश क्यों होने दे रहे हैं इसे लेकर एक आकलन यह भी है कि अखिलेश जान-बूझ कर एक सोची-समझी रणनीति के तहत ऐसा कर रहे हैं. वे 2014 के लोकसभा चुनाव तक यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं. वे इस समय ऐसा कोई काम नहीं करना चाहते जिसके नतीजे उलटे पड़ जाएं और नेताजी का सपना अधर में लटक जाए. ऐसा मानने वालों का विश्वास है कि 2014 के बाद कमान पूरी तरह से अखिलेश यादव के हाथ में होगी. अगर इस बात पर यकीन कर भी लिया जाए तो यह एक गंभीर चूक है. पूरी संभावना है कि जब तक वे पूरी तरह से कमान संभालने की स्थिति में होंगे हालात उनके हाथ से निकल चुके होंगे. इसकी शुरुआत हो भी चुकी है. जिन सांप्रदायिक तनावों से सपा सियासी फायदा उठाने की फिराक में थी उसके समय से पहले (लोकसभा चुनाव) ही उल्टे नतीजे आने लगे हैं. दो मार्च को प्रतापगढ़ में घटी घटना के बाद 3 मार्च को लखनऊ के रिफाए आम क्लब मैदान में मुसलमान नेताओं ने एक जलसा आयोजित किया था. इसमें लखनऊ से सपा के लोकसभा उम्मीदवार अशोक वाजपेयी भी हिस्सा लेने पहुंचे थे. वहां मौजूद भीड़ ने अशोक वाजपेयी के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और उन्हें उल्टे पांव लौटने के लिए मजबूर कर दिया. मुनव्वर राना कहते हैं, ‘नेता नजदीकी नफे-नुकसान का अंदाजा तो लगा लेते हैं लेकिन वे दूरगामी नतीजों का आकलन करने में हमेशा चूक जाते हैं. सपा की यही हालत है. आप देखिए कि कांग्रेस ने बाबरी मस्जिद के मामले में एक ही भूल की थी और दो दशक हो चुके हैं सूबे से उनका सफाया हुए. जिस राजा भैया को गिरफ्तार करके जेल में डाला जाना चाहिए था वो आजाद घूम रहा है.’

प्रतापगढ़ की घटना सपा के नजरिये से बेहद महत्वपूर्ण और दिलचस्प है. इस घटना का एक पीड़ित मुसलमान है और बाकी दो यादव. दोनों जातियां मिलकर सपा का आधार वोटबैंक तैयार करती हैं. इस मामले के सबसे चर्चित आरोपित राजा भैया को भी सपा का ही संरक्षण प्राप्त है. मामला हाथ से निकलता देख घटना के एक दिन बाद चार मार्च को अखिलेश यादव देवरिया स्थित जिया-उल-हक के गांव पहुंचे. वहां उन्होंने मारे गए अधिकारी की विधवा परवीन आजाद और पिता को 25-25 लाख रुपये के चेक बतौर मुआवजा भेंट किए. इसके अलावा परिवार के दो सदस्यों के लिए नौकरी का आश्वासन भी दिया गया. लेकिन हड़बड़ी में वे नन्हे यादव और सुरेश यादव के परिजनों को भूल गए. जब इस बात पर सजातीय लोगों के असंतोष की वजह से ध्यान गया तब छह मार्च को वे बलीपुर गांव भी पहुंचे और मृतकों के परिजनों को 20-20 लाख रुपये के दो चेक दिए. इस मामले में अखिलेश यादव ने एक असाधारण परंपरा की नींव रखी है- किसी भी तरह की हिंसा के पीड़ितों के घर-घर जाकर 4-5 लाख के स्थान पर 40-50 लाख का मुआवजा बांटने की और एक के स्थान पर दो-दो लोगों को नौकरी देने की. एक नेता की जनप्रिय छवि के लिहाज से यह बात बहुत अच्छी लग सकती है. यह देखना दिलचस्प होगा कि इस तरह के दूसरे मामलों में भी मुख्यमंत्री ऐसा ही कर पाते हैं या नहीं. हालांकि शुरुआती संकेत अच्छे नहीं है. तीन मार्च को अकबरपुर जिले के टांडा कस्बे में मारे गए राम बाबू गुप्ता के परिवारवालों से मिलने न तो कोई सरकारी हाकिम पहुंचा और न ही मुआवजे की ही कोई चर्चा है. यह चुनिंदा संवेदना भी उन्हें भारी पड़ सकती है.

 

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एक लौ इस तरह क्यों बुझी…
कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अखिलेश यादव की समस्या उनका अपना परिवार और अनुभवहीनता है. जहां तक नीयत का सवाल है तो उस पर ज्यादा शक की गुंजाइश नहीं है. अखिलेश यादव ने शुरुआत में ही राजा भैया को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने पर आपत्ति जतायी थी, लेकिन मुलायम सिंह के अड़ियल रवैये के आगे उन्हें झुकना पड़ा. यह वही स्थिति थी जिसे एक सपा विधायक इस तरह से बयान करते हैं, ‘या तो आप अच्छे नेता बन जाइए या फिर अच्छा बेटा. अखिलेश यादव अच्छा बेटा बनने के फेर में सब कुछ गंवाते जा रहे हैं.’ राजा भैया को लेकर बाद में भी जूतमपैजार होती रही है. एक सपा विधायक के मुताबिक मुख्यमंत्री के सामने आजम खान और राजा भैया की आपस में जमकर तूतू-मैंमैं हो चुकी है. यह अस्थान दंगे के बाद का वाकया है. लेकिन अखिलेश कभी राजा भैया से मुक्ति पाने का साहस नहीं बटोर सके. मौका अखिलेश यादव के पास अक्टूबर महीने में एक बार फिर से था, लेकिन वे चूकने की बीमारी से उबर नहीं पाए. गोंडा के विधायक विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह सरकार में राजस्व राज्य मंत्री थे. गोंडा में एनआरएचएम योजना के तहत डॉक्टरों की अस्थायी नियुक्तियां होनी थीं. उन्होंने गोंडा के सीएमओ एसपी सिंह  पर  अपने कुछ लोगों को सूची में डालने का दबाव डाला. सीएमओ ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया. विनोद सिंह को यह बात नागवार गुजरी. उन्होंने बाकायदा सीएमओ का अपहरण करके उनसे अस्थायी डॉक्टरों की नई सूची बनवाई जिसमें उनके अपने चेले शामिल थे. मामला विवादों में आ गया. मजबूरन विनोद सिंह को मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा. लेकिन तीन महीने के भीतर नए मंत्रिमंडल विस्तार में विनोद सिंह को फिर से मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया. अब वे माध्यमिक शिक्षा राज्य मंत्री हैं.

2012 के चुनाव से पहले जिन आदर्शों और सिद्धातों की बात अखिलेश करते थे, चुनाव जीतने के बाद कई अवसरों पर उनकी सरकार इसके बिल्कुल विपरीत आचरण करते पाई गई. एक और ऐसा ही मामला सामने आया अपराधी नेताओं को खुली छूट देने और उनके मुकदमे वापस लेने का. 15 जुलाई, 2012 को तहलका की एक खोजी रिपोर्ट में यह सनसनीखेज सच सामने आया कि प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद माफिया खुलेआम घूम रहे हैं और अपना दरबार लगा रहे हैं. सपा नेता अमरमणि त्रिपाठी आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं. उन्हें कवयित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या के मामले में यह सजा हुई है. जिस दिन प्रदेश में सपा की सरकार बनी उसके बाद से ही अमरमणि त्रिपाठी हर दिन मेडिकल चेकअप के बहाने गोरखपुर स्थित बीआरडी मेडिकल कॉलेज जाकर अपना दरबार लगाने लगे.

सरकार में आते ही अभय सिंह समेत तमाम अपराधी किस्म के नेताओं के मामले वापस लिए जाने की पहल की गई. हत्या के दोषी अमरमणि त्रिपाठी दरबार लगाते पाए गए

अमरमणि का मामला अकेला नहीं है. फैजाबाद की जेल में बंद माफिया डॉन अभय सिंह भी यही करते पाए गए. वे तो जेल के अंदर ही अपना दरबार चला रहे थे. 24 मई, 2012 को सरकार ने उनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट में दर्ज मामला वापस लेने की पहल कर दी थी. अभय सिंह पर पूर्वांचल के विभिन्न जिलों में दर्ज 18 आपराधिक मामलों में से अकेला यही ऐसा था जो गैरजमानती था. इसके हटने के बाद अभय सिंह की जेल से रिहाई का रास्ता खुल जाना था. अभय सिंह की तर्ज पर तमाम और अपराधी किस्म के नेताओं के मामले वापस लिए जाने की पहल अखिलेश सरकार की तरफ से हुई.

अखिलेश ने अपनी किरकिरी दागी नौकरशाहों की नियुक्ति के मामले में भी करवाई है. सरकार बनने के तत्काल बाद उन्होंने नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन पद पर राकेश बहादुर और सीईओ पद पर संजीव सरन को तैनात कर दिया. ये दोनों अधिकारी 2005 से 2007 तक मुलायम सिंह यादव की सरकार में इसी पद पर तैनात थे. इस दौरान उन पर 4,000 करोड़ रुपये का भूमि घोटाला करने का आरोप है. दोनों अधिकारियों के खिलाफ जांच चल रही थी मगर उन्हें दोबारा से उन्ही पदों पर नियुक्त कर दिया गया. मीडिया में इस बात की आलोचना भी अखिलेश को डिगा नहीं पाई. अंतत: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप किया. 8 नवंबर, 2012 को कोर्ट ने प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि दोनों अधिकारियों को तत्काल उनके पद से हटाया जाए. लेकिन प्रदेश सरकार अभी भी ऐसा करने के मूड में नहीं थी. आखिरकार दो महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद 16 नवंबर को संजीव सरन को हटाकर उनकी जगह रमा रमण को नया सीईओ नियुक्त किया गया. राकेश बहादुर फिर भी चेयरमैन के रूप में जमे रहे. करीब महीने भर पहले उन्हें भी हटाया गया है. अब भी कई ऐसे अधिकारी महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं जिनके खिलाफ गंभीर जांच या अदालती मामले चल रहे हैं.

इस तरह के घोर नकारात्मक माहौल में जब सरकार की असफलताओं की चर्चा सपा कार्यकर्ताओं और नेताओं से की जाती है तब वे एक सुर से उन लोकलुभावन योजनाओं को गिनाना शुरू करते हैं जिनकी घोषणा पार्टी ने चुनाव से पहले की थी. कैसे ‘पढ़े बेटी, बढ़े बेटी’ के तहत लड़कियों की शिक्षा की व्यवस्था की जा रही है, कैसे कन्या विद्या धन का बंटवारा हो रहा है, कैसे बेरोजगारी भत्ता बंट रहा है और अब कैसे सरकार बारहवीं पास छात्रों को लैपटॉप बांट कर अपने सारे वादे साल भर के भीतर पूरा करने वाली है. कार्यकर्ता एक सांस में ये सारी योजनाएं गिना डालते हैं. जब उनसे कहा जाता है कि ये तो सरकारी खजाने से वोट खरीदने की कोशिश है, समाजवादी पार्टी स्वयं केंद्र सरकार की कैश सब्सिडी योजना का यही कहकर विरोध करती रही है, तब ज्यादातर कार्यकर्ता और नेता नाराज हो जाते हैं. इन योजनाओं का एक दूसरा सच भी है.

आजमगढ़ जिले में कन्या विद्या धन और ‘पढ़े बेटी, बढ़े बेटी’ योजना के तहत करीब 30,000 छात्राएं पात्र पाई गई थीं. इनमें से सिर्फ करीब 3,200 छात्राओं को चेक मिला है. चेक पाने में असफल रहे लोगों का आरोप है कि मुसलमानों और यादवों को चुन-चुन कर चेक दिए गए. लगभग सभी योजनाओं का यही सच है. ‘कन्या विद्या धन,’  ‘हमारी बेटी उसका कल,’ ‘पढ़े बेटी, बढ़े बेटी’इन तीन योजनाओं की कुल अनुमानित लागत 3,623.32 करोड़ रुपये थी, लेकिन सरकार ने बजट में इसके लिए 1,294.24 करोड़ रुपये आवंटित किए थे. लिहाजा इस तरह की गड़बड़ियां स्वाभाविक हैं. इस चक्कर में एक और गड़बड़ी सामने आ रही है. अयोग्य लोगों को पात्र बानाकर इस तरह की योजनाओं का लाभ दिलवाया जा रहा है जबकि योग्य इससे वंचित हैं. जिन अवसरों पर अखिलेश यादव खुद को साबित कर सकते थे, वहां वे बार-बार चूक रहे हैं. एक उदीयमान नेता के लिए एक साल की इससे नकारात्मक समीक्षा नहीं हो सकती. गोमती में साल भर पहले आया तूफान गुजरने को ही है, कहीं ऐसा न हो कि आगे केवल बर्बादी के ही मंजर दिखाई दें.
(जय प्रकाश त्रिपाठी और वीरेंद्रनाथ भट्ट के सहयोग के साथ)

by  tehelkahindi.com

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Posted by on Jul 20 2013. Filed under खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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