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कैदखाना या पागलखाना

Prisoner in jail

Prisoner in jail cell

कैदखाना या पागलखाना

अभी सरबजीत सिंह की चिता ठंडी भी नहीं हुई थी कि सीमापार से एक और खबर आ गई| उसी मनहूस कालकोठरी में, जिसमे सरबजीत की हत्या हुई छत्तीस में से बीस भारतीय मानसिक रोगी हो गए हैं| यह आंकड़ा इसलिए भी हैरान करता है क्योंकि कराची की मलीर जेल में 535 में से एक कैदी मानसिक रोगी है| कराची की जेल के अधिकतर कैदी समुद्री सीमा की अवमानना के मामले में मामले में पकडे गए हैं| मछुआरे हैं| लेकिन भारत-पाक युद्ध पानी की बजाये जमीन पर ही लडे गए हैं| अगर कोई किसान गलती से ज़मीन पर अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार कर ले तो जासूसी का तमगा मिल जाता है|

 

Prisoner in jail cell

Prisoner in jail cell

अमानवीय यातनाये

फिर इनाम के रूप में शुरू होती है यातनाओं की श्रृंखला| इन इनामो की आप हम कल्पना भी नहीं कर सकते| आगरा के मोनू अभी भी अपनी बायीं बाजू में गरम सलाख से दागे जाने का निशान दिखाते हैं| फिर भी अपने आपको भाग्यशाली समझते हैं कि घर वापस तो आये| कश्मीर सिंह ने तेईस साल तक खुला आसमान नहीं देखा| सत्रह साल तक लोहे की बेड़ियों में जकड़े रहे| जो भाग्यशाली कैदी पाकिस्तानी जेल से छुट कर आये वो बताते हैं की थर्ड डिग्री यातनाएं, छोटी-छोटी बात पर हत्या( अभी हाल का मामला चमेल सिंह का हैं जिनकी कपडा धोने जैसी छोटी सी बात को लेकर हत्या कर दी गयी), दिल दहला देने वाली सजाएं, जबरिया काम, धर्म परिवर्तन और पाकिस्तान के लिए जासूसी करने को मजबूर करते हैं पाकिस्तानी जेलकर्मी और वहाँ की ख़ुफ़िया एजेंसी। 12 साल पहले लाहौर की कोट लखपत जेल से छूटे विनोद साहनी ने एक इंटरव्यू में बताया, ‘कैदियों को जेल के भीतर मारकर उनकी लाशें फेंक दी जाती हैं।’ उनके शवों तक को अंत्य संस्कार के लिए अस्पतालों में लंबा इंतजार करना पड़ता है।’ पाकिस्तानी जेल से छूटे कैदी आज भी अपना सामान्य जीवन नहीं जी पा रहे उनसे वहाँ की जेलों की यातना के बारे में पूछे जाने पर उनकी आँखों के सामने भय की लहर तैर जाती हैं वो बताते हैं की वहाँ की जेलों में उन्हें गन्दा खाना, गन्दा कपडा और जानवरों की तरह रहने पर मजबूर किया जाता हैं किशोरी लाल शर्मा अपनी किताब Untold story of a spy: My Years in a Pakistani Prison में लिखते हैं  ‘ मियांवाली की कसूरी जेल में दिन की शुरूआत ही पांच कोड़ों से होती थी। शाम तक पांच किलो रस्सी बुनकर देनी होती। पाकिस्तानी सेना क्वार्टर गार्ड में मुझे एक ऐसी कुर्सी पर बिठाया गया जिसे इलेक्ट्रिक प्लेट से तपाया गया था। इसे वे ‘ हॉट प्लेट ट्रीटमेंट ‘ कहते थे।

उन कैदियों और अभी हाल में आई भारत-पाक न्यायिक समिति की रिपोर्टो के आधार पर अमानुषिकता के मामले में पाकिस्तान की जेलें किसी नर्क से कम नहीं, खासकर तब जब वह बंदी भारतीय हो। जर्मनी, जापान, उत्तर कोरिया और चीन के साथ पाकिस्तान उन देशों में आता है जहां की जेलें किसी नर्क से कम नहीं। इन यातनाओं को सह न पाने से कई कैदी तो पागल तक हो गए हैं। उधर पाकिस्तानी सरकार कहती है, उसकी जेलों में कोई भारतीय बंदी नहीं, पर इन दोनों देशों ही नहीं, इंगलैंड और अमेरिका जैसे देशों के पास ऐसे अकाट्य प्रमाण हैं, जिनसे पिछले 40 सालों में इन जेलों में 1965 और 1971 के अनेकों युद्धबंदियों के यातनापूर्ण जीवन बिताने की बात सिद्ध होती है। सालों पहले करगिल में कैप्टेन कालिया के टार्चर जैसे और पिछले दिनों मेंढर सेक्टर में भारतीय सैनिकों का सिर कलम करने और अब सरबजीत सिंह पर जेल में कतिलाना हमले के वाकयों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पाकिस्तान को सामान्य शिष्टाचार और मर्यादाओं तो छोड़, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का भी ध्यान नहीं है।

 

आखिर क्यों निकालते हैं भारतीय कैदियों के अंग

इसी वर्ष जनवरी में चमेल सिंह की रहस्यमयी परिस्थतियों में कोट लखपत जेल में मृत्यु हुई| उनकी पांच साल की सजा पूरी होने वाली थी| लेकिन सजा पूरी नहीं हुई और उनका शव ही भारत आया| और भी ज्यादा हैरानी की बात है कि उनके शव से मुख्य अंग हृदय, यकृत और गुर्दे पहले ही निकले जा चुके थे| सरबजीत के शरीर से भी हृदय, आमाशय, गुर्दे और पित्ताशय पाकिस्तान में निकले जा चुके थे| सैंपल लेने के लिए पूरे अंग नहीं बस उत्तक काफी होते हैं| यदि अंग निकालने भी पड़ें तो परिजनों की इच्छा के विरूद्ध नहीं निकले जा सकते| सरबजीत का पोस्टमॉर्टेम जिन्ना अस्पताल की टीम ने नहीं किया| बाहर से टीम बुलाई गई और अंग निकालकर चली गयी| क्या टीम कोई मिशन पर थी? पाकिस्तान ये अंग छुपाकर, छुपाना क्या चाहता है| क्या पोस्टमॉर्टेम में यह अंग कोई तथ्य उजागर कर सकते थे| वैसे शारीरिक यातनाएं ही मानसिक संतुलन बिगाड़ने के लिए काफी होती हैं| दबी जुबान में कहा जाता है कि जासूसी के आरोपियों को ऐसे ड्रग्स दिए जाते हैं जिनसे वो सब उगल दे या सब भूल जाएँ| दोनों स्थितियां पागल होने की हैं| अमानवीय! छतीस में से बीस भारतीय जो एक ही जेल में मानसिक रोगी हैं क्या उसके पीछे यह कारण है| ये लोग कोई युद्धबंदी नहीं हैं| इन्होने किसी की हत्या नहीं की| कभी इन कैदियों को मानसिक चिक्तिसा भी नहीं उपलब्ध करवाई गयी| लेकिन भारतीय सरकार की चुप्पी से लगता है यह न्यायोचित होगा|

कहा जाता है किसी देश को को जांचना हो की वो विकसित है या नहीं तो उस देश के बच्चों और गर्भवती माताओं का स्वास्थय देख लो| लेकिन कहना पड़ेगा की कोई देश सभ्य है या नहीं यह उस देश में दूसरे देशों के कैदियों की स्थिति बता देती है|

चलो इन कैदियों को दुनिया का सबसे खतरनाक अपराधी भी मान लें| क्या पागल करने की सजा का कानून किसी देश के सविंधान में है?

नोट -यह लेख विभिन्न समाचार पत्रिकाओ में छपी खबरों के आधार पर लिखा गया हैं

 By  Jayhind Team 

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Posted by on May 7 2013. Filed under खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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