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शिखा त्यागी, बीजेपी गवर्नेंस सेल की सह-संयोजक

शिखा त्यागी, बीजेपी गवर्नेंस सेल की सह-संयोजक

यह दृश्य है राजधानी दिल्ली में अशोक रोड स्थित भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय के एक कमरे का. सामने कंप्यूटर और स्मार्टफोन खुला है. लोकसभा में खाद्य सुरक्षा बिल पर छिड़ी बहस के बीच एनडीए शासन को यूपीए से बेहतर बताने के लिए धड़ाधड़ ट्वीट किए जा रहे हैं. यूपीए राज में पेट्रोल-डीजल की कीमतें 120 फीसदी तक बढ़ीं हैं. विकास दर 8 से घटकर 4 फीसदी हो गई. डॉलर की कीमत तब क्या थी और अब क्या है? एनडीए ने 4 करोड़ रोजगार दिए तो यूपीए के समय मात्र 27 लाख लोगों को रोजगार मिला. इस तरह करीब दर्जन भर से ज्यादा मानकों पर तुलनात्मक ट्वीट उड़ेले जा रहे हैं, जो सोशल साइट पर ट्रेंड बन रहे हैं.

इस पूरे अभियान की अगुआई बीजेपी का कोई पुराना कार्यकर्ता नहीं, बल्कि एक युवा प्रोफेशनल चेतन बरागटा कर रहे हैं. एचएसबीसी बैंक की 25 लाख रु. सालाना पैकेज की नौकरी छोड़ पार्टी से जुड़े 34 वर्षीय बरागटा बीजेपी युवा मोर्चे के सोशल मीडिया कैंपेन पैन इंडिया के इंचार्ज हैं. बैंक की नौकरी को वे अपनी क्षमता और इच्छा के अनुरूप नहीं मानते थे. अब पार्टी के काम में उन्हें सुकून मिल रहा है. बराक ओबामा और नरेंद्र मोदी के उदय को सोशल मीडिया की देन बताने वाले बरागटा कहते हैं, “आज 10 करोड़ फेसबुक, 3 करोड़ ट्विटर यूजर हैं. स्मार्टफोन का बाजार भी 26 फीसदी सालाना की दर से बढ़ रहा है. इसलिए नए युवाओं को पार्टी से जोडऩे के साथ-साथ मौजूदा कार्यकर्ताओं को भी इस दायरे में लाना हमारा मकसद है.” बरागटा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे हैं. उनके पिता हिमाचल प्रदेश में मंत्री रह चुके हैं.

हर छोटे-बड़े राजनैतिक मुद्दे पर बीजेपी की धमक को सोशल मीडिया में पहुंचाने का काम हो या बीजेपी शासित राज्यों के बेहतर काम को राष्ट्रीय स्तर पर उभारने की कोशिश, इस काम के लिए खालिस पेशेवर लोग पार्टी के अलग-अलग प्रकोष्ठों से जुड़ रहे हैं. 53 वर्षीया शिखा त्यागी को ही लीजिए. फरवरी 2012 तक वे 40-50 लाख रु. के सालाना पैकेज पर एक मल्टी नेशनल कोल्ड ड्रिंक कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट थीं. लेकिन सार्वजनिक जीवन से जुडऩे की उनकी इच्छा उन्हें सियासी दरवाजे पर ले आई. त्यागी अभी बीजेपी के गवर्नेंस सेल की सह संयोजक हैं. राजनीति से जुडऩे के लिए उन्होंने 2010 में इंटरनेट से ढूंढ़कर बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को ई-मेल भेजा. गांधी की ओर से तो जवाब नहीं मिला, लेकिन गडकरी के कार्यालय से मिलने का वक्त मिल गया.

यूपी के बिजनौर के रतनगढ़ की रहने वालीं और संविधान सभा के सदस्य रहे महावीर त्यागी की भतीजी शिखा त्यागी कहती हैं, “आज भी देश में 40-45 करोड़ वाली आबादी के हिसाब से बना डिलिवरी मैकेनिज्म सिस्टम काम कर रहा है. इसमें सुधार की जरूरत है. सरकार किसी भी पार्टी की हो, नीयत किसी की खराब नहीं होती. डिलिवरी मैकेनिज्म बेहतर होना चाहिए और यही सोचकर मैंने राजनीति का रुख किया.” वे गडकरी को अपना राजनैतिक संरक्षक मानती हैं. उनके मुताबिक, परदे के पीछे भी अच्छा काम किया जा सकता है, लेकिन पार्टी के कहने पर वे चुनाव में भी उतरने को तैयार हैं.

बीजेपी के ज्यादातर मोर्चों में अब प्रोफेशनल युवा आने लगे हैं. बाहर रहकर वे अच्छी कमाई कर सकते थे. लेकिन राजनीति के प्रति झुकाव उन्हें कॉर्पोरेट दुनिया के मायाजाल से बाहर निकाल इस ओर ले आया. बीजेपी नेता श्याम जाजू कहते हैं, “यह सच है कि राजनीति बदनाम है, लेकिन यह इतनी हावी है कि उससे छुटकारा भी नहीं मिल सकता. सब कुछ सत्ता केंद्रित ही होता है.” वे बताते हैं कि उनकी बेटी एमबीए करने के लिए विदेश गई. फॉर्म में पिता का प्रोफेशन भरते वक्त उसने पूछने के लिए फोन किया तो जाजू ने ‘राजनीत’ भरने की सलाह दी. बेटी ने कहा यह अच्छा नहीं लगेगा और आखिर में सामाजिक कार्यकर्ता भर दिया. जाजू के मुताबिक, “राजनीति इतनी बदनाम है कि बच्चे भी इसे अपने फॉर्म में लिखने से परहेज करते हैं. लेकिन इसका क्रेज भी है.”

34 वर्षीय भारत भूषण भी बीजेपी से जुडऩे वाले ऐसे प्रोफेशनल्स में से हैं, जिन्होंने लॉ की डिग्री हासिल करने के बाद सिंघानिया ऐंड कंपनी में बतौर मैनेजर काम किया. अब वे आइटी विशेषज्ञ के रूप में यूथ विंग में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. उन्होंने पार्टी का इंटरनेट टीवी बनाया. पार्टी में सेवा देने के बारे में वे कहते हैं, “सामाजिक संगठन एक प्लेटफॉर्म देता है. कई लोगों से मिलने-जुलने का मौका मिलता है और संबंधों की वजह से जो काम मिलता है उससे जीवन-यापन के साधन जुट जाते हैं.” उनके साथ टीम में नारायण राव भी हैं, जो रुड़की से इंजीनियरिंग कर नोएडा की कंपनी में सीनियर मैनेजर के तौर पर काम करते हैं. इसके अलावा अंबर स्वामी हैं जो इंग्लैंड से एमएस और एमबीए करने के बाद टीसीएस में काम कर रहे हैं. अपने प्रोफेशन के अलावा ये लोग बाकी समय पार्टी को देते हैं.

जामिया मिल्लिया से पीएचडी कर चुके शंभू पासवान किसान मोर्चे में समन्वय से लेकर किसानों से जुड़े मुद्दों पर बौद्धिक सहयोग दे रहे हैं. इसी तरह 33 वर्षीय देवी दयाल गौतम ने जेएनयू में पीएचडी की थीसिस जमा कर दी है और एनसीईआरटी की नौकरी छोड़ बीजेपी के अनुसूचित जाति मोर्चे में सेवा दे रहे हैं. वे कहते हैं, “हर चीज राजनीति से तय होती है. अगर मैं अधिकारी बनता तो सीमित दायरे में काम कर पाता, लेकिन यहां से समाज के लिए व्यापक काम किया जा सकता है.” दिल्ली संवाद सेल के प्रमुख खेमचंद शर्मा पेशे से सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट हैं. वे अपनी पूरी टीम के साथ रिसर्च कर सोशल मीडिया में पार्टी की सोच को आगे बढ़ा रहे हैं. वे 2009 में पार्टी के लिए बने वार रूम से जुड़े हैं.

बीजेपी से जुड़े ज्यादातर प्रोफेशनल युवाओं का रुझान पहले से ही संघ और विद्यार्थी परिषद की ओर रहा है. अपने प्रोफेशन के साथ वे पार्टी से जुड़ रहे हैं और सक्रिय राजनीति में उतरने की इच्छा सभी के मन में है. हालांकि इस तरह के प्रोफेशनल्स के सक्रिय होने से पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं के मन में खटास भी है. बीजेपी के एक मोर्चे के पदाधिकारी ने अपनी पीड़ा कुछ यूं जताई, “प्रोफेशनल का विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं होता. वे नेताओं के इर्द-गिर्द पहुंचकर सियासी मंसूबे पूरे करना चाहते हैं. ऐसे में हम जैसे लोग, जिनकी प्रतिबद्धता नेताओं की बजाए पार्टी के प्रति है, किनारे कर दिए जाते हैं.” इन विरोधाभासों से बीजेपी कैसे निबटती है, यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन फिलहाल इन प्रोफेशनल्स ने एक मॉडर्न माहौल तो पैदा कर ही दिया है.

News Source : Aaj Tak

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=2954

Posted by on Sep 10 2013. Filed under खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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