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चिड़ियाखाने में मार्क्सवाद

जनसत्ता 3 मई, 2013: इधर चीन से एक छोटी-सी खबर आई। ग्वांगझू के चिड़ियाखाने में कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन था। उसमें उम्मीदवारों से मार्क्सवादी दर्शन और सिद्धांत की पूर्ण जानकारी आवश्यक रखी गई है। लिखित और मौखिक दोनों परीक्षाओं में।
सोशल मीडिया में कुछ चीनियों ने समाचार पर चिंता जताई है। कहीं ऐसा न हो कि चिड़ियाखाने के जानवरों में क्रांति और विद्रोह के कीटाणु पहुंच जाएं। अगर वहां ‘सांस्कृतिक क्रांति’ हो गई तो चिड़ियाखाने के गरीब जानवर मारे जाएंगे। कुछ लोगों ने फिक्र जताई कि अगर चिड़ियाखाने में लेनिनवादी-माओवादी विचार फैल गए तो वहां के बाड़े, पिंजड़े तोड़ डाले जाने का खतरा है। वे बाड़े जो पूंजीवादी शोषण, उत्पीड़न के प्रतीक हैं। इस प्रसंग में ब्रिटिश लेखक जॉर्ज आॅरवेल के क्लासिक उपन्यास ‘एनिमल फार्म’ का भी स्मरण किया गया। संभवत: चिड़ियाखाने में संपन्न जानवरों द्वारा सर्वहारा जानवरों का उत्पीड़न बढ़ गया था। इसलिए उन्हें कम्युनिस्ट चेतना देकर पार्टी नियंत्रण में लाने की तैयारी हो रही है।
वैसे कम्युनिस्ट मानसिकता और उसके राज-समाज में हर कहीं चिड़ियाखाने की झलक रही है। चाहे राजा की पोशाक की तरह वह बहुतों को दिखती न थी। मगर लेनिन-स्तालिन का रूस, माओ का चीन, पोल पोट का कंबोडिया, चौसेस्कू का रोमानिया, होनेकर का जर्मनी, आदि अपने यौवन में चिड़ियाखाने से कम नहीं थे। सोल्झेनित्सिन ने सोवियत जीवन, विशेषकर लेबर कैंपों का जो चित्र-लिखित विवरण दिया है, वह मानवता का अजायबघर है! स्तालिनी रूस में केवल एक न्याय था: मत्स्य-न्याय। स्तालिन सबसे बड़ी मछली, एकमात्र शार्क था। उसके बाद ऊपर से लेकर नीचे तक कोई सुरक्षित नहीं था। पोलित ब्यूरो सदस्य तक कोई भी कभी भी रातों-रात लापता हो सकते थे, होते थे। इसकी तुलना में जंगल-राज सुंदर है, जहां बेवजह, बिना भूख के बाघ भी किसी को नहीं मारता।
जबकि रूस में कम्युनिस्ट सत्ता अपने ही करोड़ों लोग खा गई। महज संदेह और सनक में कि वे कुलक, पूंजीवादी दलाल, भितरघाती, विदेशी एजेंट आदि थे। इस सनक में माओ ने स्तालिन को भी पीछे छोड़ दिया। उसी ग्वांगझू में, जहां चिड़ियाखाने में मार्क्सवाद की परीक्षा होने वाली है, 1951 के दस महीनों में ही तेईस हजार लोगों को मार डाला गया। यह ‘प्रतिक्रांतिकारियों’ के विरुद्ध माओ का पहला ही अभियान था। बाद की ‘सांस्कृतिक क्रांति’ में कहीं-कहीं कामरेडों ने वर्ग-शत्रुओं के संहार के साथ उनका मांस तक खाकर अपनी क्रांतिकारिता का प्रमाण दिया था!
इस पाशविकता ने कम्युनिस्ट भाषा में भी अपना स्थान बनाया। रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की आधिकारिक शब्दावली में भी पशु-जगत की भरपूर उपस्थिति थी। जिनोव्येय, कामेनेव, त्रात्स्की आदि लेनिन के निकट सहयोगियों को बाद के कम्युनिस्ट पार्टी प्रकाशनों में ‘सूअर’, ‘कुत्ते’, ‘कीड़े’ जैसी संज्ञाओं से विभूषित किया गया।
स्तालिन लिखित कुख्यात पुस्तक ‘हिस्टरी आॅफ दि कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ द सोवियत यूनियन (बोल्शेविक): ए शॉर्ट कोर्स’ के एक अध्याय का उप-शीर्षक है- ‘देश के गद्दार, भितरघाती, जासूस बुखारिन-त्रात्स्की गिरोह के अवशेषों का सफाया’। ये विशेषण पहली सोवियत सरकार के सर्वोच्च नेताओं के लिए थे! फिर यह केवल शीर्षक था, जिससे पूरे कथ्य का अंदाजा लगा लें। यह ‘शॉर्ट कोर्स’ कोई मामूली किताब नहीं थी। दो दशक तक यह कम्युनिस्टों की बाइबिल थी। दुनिया की हर भाषा में यह छपी (हिंदी में डॉ रामविलास शर्मा इसके अनुवादक थे)। गाली-गलौज से भरी हुई इस किताब ने विश्व में कम्युनिस्टों की एक समूची पीढ़ी को दीक्षित किया।
इसीलिए वही मतिहीन हिंसक मानसिकता अपनाने में वे कम्युनिस्ट भी पीछे नहीं रहे, जो अपने-अपने देश में सत्ताविहीन थे। भारत में खून-खराबे और गाली-गलौज की भाषा का आरंभ मार्क्सवादियों ने ही किया। उन्होंने महात्मा गांधी को एक ‘प्रतिक्रियावादी बनिया’ और ‘जनता से विश्वासघात’ करने वाला बताया। सुभाष चंद्र बोस को (जापानी तानाशाह) ‘तोजो का कुत्ता’ कहा। रवींद्रनाथ टैगोर ‘रंडियों के दलाल’ थे। यहां तक कि नेहरू भी लंबे समय तक ‘अमेरिकी साम्राज्यवाद का दौड़ता कुत्ता’ रहे जब तक भारतीय कम्युनिस्टों को यहां आसन्न क्रांति का अंधविश्वास रहा। बाद में भी उनकी भाषा में बदलाव नहीं आया। बस गालियों के पात्र बदल गए। गांधी, सुभाष, नेहरू के बदले जयप्रकाश नारायण, कृपलानी और वाजपेयी आदि नए निशाने बने।
क्योंकि लेनिनवादी परंपरा में भाषा का जानवरीकरण जरूरी हथियार है। जैसे मनमानी हिंसा, उसी तरह गालियां उनकी भाषा का अभिन्न अंग रही हैं। स्वयं लेनिन ‘व्यापारी’ और ‘बदमाश’ को पर्यायवाची मानते थे। सत्ता पर कब्जे के बाद उन्होंने ‘उदाहरण’ के लिए कुछ व्यापारियों को मार कर खंभे पर लटका देने की सिफारिश की थी। भिन्न राय रखने वाले अपने सहयोगियों पर भी ‘गद्दार’, ‘दलाल’, ‘बकवादी’, ‘दुश्मन का एजेंट’, ‘टुकड़खोर’, ‘मानवता की तलछट’ जैसे विशेषणों के प्रयोग की आदत लगाई थी। लेनिन के अनुसार, ‘जो भी मार्क्सवाद को कमजोर करने की कोशिश करे, उस पर निरपवाद रूप से हमें पहले शातिर बदमाश का बिल्ला चिपका देना चाहिए।’ इस लेनिनी तकनीक को स्तालिन ने भयंकर बुलडोजर में बदल दिया।
कमोबेश वही प्रवृत्ति सारी दुनिया के मार्क्सवादियों ने बड़े उत्साह से अपनाई। बल्कि वही उनकी ‘क्रांतिकारिता’ की पहली पहचान थी। भारतीय मार्क्सवादियों की उस मानसिकता की प्रामाणिक झलक राज

थापर की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘आॅल दीज इयर्स’ (1991) में देखी जा सकती है। प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका ‘सेमिनार’ की संस्थापक राज और उनके पति रोमेश लगभग दो दशक तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेताओं के सहयोगी रहे थे।
राज के शब्दों में, ‘‘हमारे दृष्टिकोण के अनुसार हमारे देश के नेता ‘दौड़ते हुए कुत्ते’, ‘गंदे जानवर’, ‘नीच गुलाम’ थे। आह, कम्युनिस्टों के पास कितना सीमित शब्द-भंडार था। यह निश्चय ही अत्यंत भुखमरे मस्तिष्क को प्रतिबिंबित करता था, जिसका पोषण निरंतर समीकरणों के सूखे भोजन पर किया गया था, उन समीकरणों पर जिन्हें गलती से वैज्ञानिक कहा जाता था।’’
इसी मस्तिष्क ने पूरे उत्साह से 1947 में देश का विभाजन करवाया और लाखों निर्दोष लोगों की होली जलाई। विभाजन तय होने पर पंजाब और कई क्षेत्रों में दंगे भड़क उठे, तब एक दिन कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे थापर-दंपति के घर आए। राज ने दुख व्यक्त किया कि मजहबी आधार पर कम्युनिस्टों ने देश विभाजन का समर्थन कर भारी गलती की। हजारों-हजार लोगों का जीवन बदले और विकृति की आग में तबाह हो रहा है। तब डांगे ने मजे से कहा: ‘चिंता मत करो, राज। हमारे लोगों को खून का स्वाद लेने दो, उन्हें सीखने दो कि खून कैसे बहाया जाता है। इससे क्रांति नजदीक आएगी।’
खून में रस लेने वाली यह मानसिकता उन सहयोगियों के प्रति भी थी जो बिना चीं-चपड़ कम्युनिस्ट नेताओं की हर ऊटपटांग बात खुशी-खुशी न मानें। यहां भी रूस, चीन से लेकर भारत तक कोई मौलिक अंतर नहीं था। बस सत्ता का अभाव ही लाचारी थी! स्वतंत्रता के बाद नए कम्युनिस्ट नेता बीटी रणदिवे ने पिछले नेता पीसी जोशी को एक कमरे में बंद कर दिया। रणदिवे के अनुसार ‘जिसका दिमाग खराब हो गया हो, वही सोच सकता था कि भारत स्वतंत्र हो गया!’ चूंकि जोशी ऐसा मानते थे, इसलिए उन्हें कमरे में बंद कर दिया गया। जब तक वे गलती न मान लें कि भारत स्वतंत्र बिल्कुल नहीं हुआ! जोशी को मार डालने का भी इरादा था, लेकिन दूसरों को भनक लग गई, जिससे वे बच गए। मगर इसी मानसिकता में देश भर में विविध गुटों के कम्युनिस्ट आपसी हत्याएं करते रहे। यह नक्सलियों तक सीमित नहीं था।
वस्तुत: पूरी बीसवीं शती का इतिहास दिखाता है कि जहां भी कम्युनिस्ट सत्ताएं बनीं, उन्होंने अपने ही लोगों पर अमानवीय अत्याचार किए। इस निश्चिंतता और निरंतरता से, कि उन्हें पूरी की पूरी अपराधी परियोजनाएं ही कहना होगा। जरा विचार करें कि आखिर क्या कारण था कि हर कम्युनिस्ट देश में, हर कीमत पर, हर तरीके से, निरंकुश सत्ता बना कर उस पर काबिज रहना ही सबसे महत्त्वपूर्ण समझा गया? इतना कि उसके लिए भीषण, वीभत्स अत्याचार किए गए और नैतिकता की सबसे सामान्य, सार्वभौमिक मान्यताओं को भी तिलांजलि दे दी गई। क्योंकि अधिकतर कम्युनिस्ट धारणाएं निरा अंधविश्वास थीं, जिन्हें लागू करने का एकमात्र तरीका निरंकुश सत्ता और अंतहीन हिंसा ही थी। अन्यथा कम्युनिस्ट अपनी खामखयाली समाज पर कभी लागू नहीं कर पाते!
यहां भी, रणदिवे नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ने पूरे भारत में ‘क्रांति’ की तारीख, 22 फरवरी 1949 तय कर दी! उन्हें विश्वास था कि कम्युनिस्ट क्रांति के लिए जनता तड़प रही है। बस एक चिंगारी दिखाने की जरूरत है। इसी खामखयाली में उन्होंने भारत में सत्ता पर कब्जे का दिन तय कर लिया। सब कुछ सेंट पीटर्सबर्ग में बोल्शेविक तख्तापलट की हूबहू नकल पर तय किया गया। राज थापर ने इस ‘क्रांति’ के दिन पार्टी द्वारा कम्युनिस्टों को दिए गए कामों का किस्सा लिखा है। यह सब कितना हास्यास्पद था, कम्युनिस्ट वास्तविक जीवन से सदैव कितने दूर रहे, उसके कितने भीषण परिणाम हुए, यह सब राजनीति की भाषा में कहना असंभव है। अमेरिका के पूर्व कम्युनिस्ट और प्रसिद्ध लेखक हावर्ड फास्ट ने ठीक कहा था कि कम्युनिस्ट मानसिकता, उसकी परिणति और विभीषिकाओं को केवल साहित्य की भाषा में कहा जा सकता है।
आज बहुतेरी बातें काल-गति में भुलाई जा चुकीं। हालांकि यह मानवता के हित में है कि नई पीढ़ियों को कम्युनिस्ट परियोजनाओं का पूरा अनुभव बताया जाए। क्योंकि नई-नई संज्ञाओं के साथ मूढ़ता और तानाशाही भरी राजनीतिक परियोजनाएं आती ही रहती हैं। भावुकता और अज्ञान में अनेक युवा उसमें फंसते हैं। आज जिहादी आतंकवाद से दुनिया भर में हजारों मुसलिम युवकों का आकृष्ट होना उसी मानसिकता का उदाहरण है। समय रहते सीधी, सच्ची बातें नहीं सुनाने से ही वह मानसिकता बल पाती है।
वैश्विक कम्युनिज्म और वैश्विक राजनीतिक इस्लाम में कई समानताएं हैं, जो सरलता से दिख सकती हैं। लेकिन जैसे चार दशक पहले कम्युनिस्ट मानसिकता की मूढ़ता देख कर भी नहीं दिखती थी। बड़े-बड़े लोग वही दुहराते, जो कम्युनिस्ट प्रचारक कहते थे। आज राजनीतिक इस्लाम के प्रति वही प्रवृत्ति है।
बहरहाल, चीन से आई खबर में एक लाक्षणिक तर्क है। जब निरंकुश सत्ता रखने वाली चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अपने दस्तावेजों में भी मार्क्स, लेनिन, माओ आदि का नाम तक लेना कब का बंद कर चुकी, तब आखिर मार्क्सवाद की जगह चिड़ियाखाने के सिवा और कहां होती! सभी तानाशाही विचारों का अंतत: वही हश्र होता है।

लेखक  : शंकर शरण 

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Posted by on May 4 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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