Donation (non-profit website maintenance)

Live Indian Tv Channels

मोदी की विदेश नीति हिन्दी में

Modi's foreign policy in hindi
एक अंग्रेजी अखबार की इस खबर ने मुझे आह्लादित कर दिया कि दक्षेस देशों से आए नेताओं से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदी में वार्तालाप किया। वैसे नवाज शरीफ, हामिद करजई, सुशील कोइराला आदि तो हिंदी खूब समझते हैं। इन नेताओं से मेरी दर्जनों बार बात हुई है पर इन्होंने मुझसे कभी भी अंग्रेजी में बात नहीं की। किंतु मोदी ने श्रीलंकाई नेता महिंद राजपक्षे से भी हिंदी में बात की। राजपक्षे हिंदी बिल्कुल भी नहीं समझते। तो क्या ऐसा हुआ होगा कि मोदी बोलते रहे होंगे और राजपक्षे बगलें झांकते रहे होंगे? न ऐसा हुआ है और न कभी ऐसा होता है। जब भी दो राष्ट्रों  के नेता मिलते हैं तो वे दोनों अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा में बोलते हैं और दोनों पक्षों के अनुवादक उस वार्तालाप का तत्काल अनुवाद करते चलते हैं। कूटनीतिक वार्ताओं में अनुवाद का बड़ा महत्व होता है। जब तक अनुवादक अनुवाद करते हैं, वार्ताकार को सोचने का समय मिल जाता है। दूसरा, यदि कोई गलत शब्द मुंह से निकल जाए तो अनुवादक के मत्थे मढ़कर मुख्य वार्ताकार बच निकल सकता है। तीसरा, शीर्ष वार्ताओं में राष्ट्रभाषा के प्रयोग से राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता प्रदर्शित होती है।

 

भारत का सौभाग्य है कि उसे मोदी जैसा प्रधानमंत्री मिल गया है। उन्होंने अपने पहले हफ्ते में ही दो ऐसे काम कर दिए, जो आज तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं कर सका। दक्षेस नेताओं को बुलाना और उनसे राष्ट्रभाषा में बात करना। इन दोनों कामों के लिए मैं इंदिराजी से लेकर अभी तक सभी प्रधानमंत्रियों से कहता रहा हूं, लेकिन इसे क्रियान्वित किया, अकेले मोदी ने। जिस भाषा में मोदी ने वोट मांगे, उसी में वे राज चला रहे हैं। इससे बड़ी ईमानदारी क्या हो सकती है। गुजरात का यह सपूत दो अन्य गुजराती महापुरुषों महर्षि दयानंद और महात्मा गांधी के मार्ग पर चल पड़ा है। कौन जाने, इसे भी देश कभी महान प्रधानमंत्री के तौर पर जानेगा।

 

यों तो अटलजी ने मेरे अनुरोध पर विदेश मंत्री के तौर पर संयुक्तराष्ट्र में अपना भाषण हिंदी में दिया था, लेकिन वह मूल अंग्रेजी का हिंदी अनुवाद था। चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री के रूप मेें मालदीव जाते समय हवाई अड्डे पर मुझसे वादा किया था कि वे दक्षेस-सम्मेलन में हिंदी में बोलेंगे। उनका वह आशु हिंदी भाषण विलक्षण और मौलिक था। उसे करोड़ों लोगों ने सुना और समझा, लेकिन दोनों प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल में नेहरूकालीन ढर्रे को बदल न सके। नरसिंह राव जब चीन गए तो एक चीनी प्रोफेसर को हिंदी अनुवाद के लिए तैयार किया गया, लेकिन जब मैंने उससे पूछा कि आपसे काम क्यों नहीं लिया गया तो वह बोला कि आपके प्रधानमंत्री अचानक अंग्रेजी में ही बोलने लगे। नरसिंह राव जैसा कई देशी और विदेशी भाषाओं का पंडित भी अंग्रेजी की गुलामी से छुटकारा न पा सका। मोदी भी अंग्रेजी बोल सकते हैं। वे कामराज की तरह नहीं हैं, लेकिन उन्होंने जानबूझकर राजभाषा का प्रयोग किया। उन्होंने संविधान का मान बढ़ाया, भारत का मान बढ़ाया और हिंदी का मान बढ़ाया।
भारत को आजाद हुए 67 साल हो गए, लेकिन इस देश में एक भी प्रधानमंत्री ऐसा नहीं हुआ, जो इस राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता का ध्यान रखता रहा हो। भारत आजाद भी हो गया और आप प्रधानमंत्री भी बन गए, लेकिन रहे गुलाम के गुलाम ही। विदेशियों से स्वभाषा में व्यवहार करना तो बहुत दूर की बात है, हमारे प्रधानमंत्रियों को अपनी संसद में भी अंग्रेजी बोलते हुए कभी शर्म नहीं आई। सभी प्रधानमंत्री अपने अफसरों के अंग्रेजी में लिखे भाषणों को संसद में पढ़ते रहे। विदेशी अतिथि चाहे चीन का हो, रूस का हो, ईरान का हो, जर्मनी का हो या पाकिस्तान का ही क्यों न हो, हमारे नेता उससे अंग्रेजी में ही वार्तालाप करते रहे हैं। हर शीर्ष विदेशी मेहमान को हैदराबाद हाउस में राज-भोज दिया जाता है। मैं अब तक  दर्जनों राजभोजों में शामिल हुआ हूं। उस समय जो भाषण भारत की तरफ से दिया जाता है, मुझे याद नहीं पड़ता कि उनमें से कभी कोई हिंदी में दिया गया हो। इसके विपरीत, विदेशी शासनाध्यक्ष अपना राजभोज-भाषण और कूटनीतिक वार्तालाप अपनी राष्ट्रभाषा में ही करते हैं। उनका सद्य: अनुवाद कभी कभार हिंदी में हुआ है। वरना वे भी अपनी भाषा का अनुवाद हमारे पुराने मालिकों, अंग्रेजों की भाषा अंग्रेजी में करते हैं। जब हम खुद गर्व से कहते हैं कि हम अंग्रेजों के भाषायी गुलाम हैं तो दूसरों को हमें खुश रखने में क्या एतराज हो सकता है? ब्रिटिश राष्ट्रकुल के जो देश हमारी तरह अंग्रेजों के भूतपूर्व गुलाम हैं, उनमें से ज्यादातर की हालत हमारे जैसी ही है। श्रीलंका और पाकिस्तान हमारे जैसे हैं, लेकिन नेपाल और अफगानिस्तान का भाषायी आचरण स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्रों के जैसा है। यदि हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री विदेशी अतिथियों के साथ हिंदी में बात करें तो वे अपने साथ अंग्रेजी का अनुवादक क्यों लाएंगे? यदि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चीनी विदेश मंत्री से हिंदी में बात करेंगी तो वे अपने साथ चीनी-हिंदी अनुवादक को लाएंगे, लेकिन अगर सुषमाजी अंग्रेजी बोलने पर अड़ी रहीं तो चीनी विदेश मंत्री तब भी चीनी में ही बोलेगा, लेकिन अपने साथ अनुवादक अंग्रेजी का लाएगा।

 

सुषमा स्वराज अगर चाहें तो वे नया इतिहास बना सकती हैं। वे हिंदी आंदोलन में मेरे साथ बरसों पहले काम कर चुकी हैं। डॉ. लोहिया और मधु लिमये की भाषा-नीति को वे निष्ठापूर्वक मानती रही हैं। एक अंग्रेजी अखबार की यह खबर यदि सही है कि उन्होंने विदेशी अतिथियों से अपनी औपचारिक बातचीत भी अंग्रेजी में की है तो मेरे लिए यह दुख की बात है। मैं समझ नहीं पाता कि सुषमाजी जैसी विलक्षण प्रतिभा और वाग्शक्ति की स्वामिनी महिला भी अंग्रेजी के आतंक से ग्रस्त हो सकती हैं। अंग्रेजी का सहारा तो प्राय: वही लोग लेते हैं, जो प्रतिभा, परिश्रम और निष्ठा की अपनी कमी की भरपाई करना चाहते हैं। मोदी जैसा प्रधानमंत्री और सुषमा जैसी विदेश मंत्री! वाह, क्या जोड़ी है? यह जोड़ी चाहे तो हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में भी चलवा सकती है, लेकिन इसके पहले हमारे विदेश मंत्रालय से अंग्रेजी के विदेशी प्रभाव को घटाना होगा और राज-काज में स्वभाषाएं लानी होंगी। कूटनीति के क्षेत्र में स्वभाषा के प्रयोग की उपयोगिता स्वयंसिद्ध है।

 

सभी महाशक्तियां अंतरराष्ट्रीय संधियां और अपने कानूनी दस्तावेज अपनी भाषा में तैयार करने पर जोर देती हैं। हां, यदि कोई अत्यंत गोपनीय वार्ता करनी हो, जिसमें अनुवादक का रहना भी खतरनाक हो सकता है, वहां दो नेता अंग्रेजी क्या, किसी अफलातूनी भाषा में भी बात करें तो वह अनुचित नहीं है। वैसे सारा काम-काज स्वभाषा में हो तो गोपनीयता बनाए रखना ज्यादा आसान होता है। सुषमाजी को चाहिए कि वे हमारे विदेश मंत्रालय के अफसरों से हिंदी में ही बात करें और अपना अंदरूनी काम-काज वे यथासंभव हिंदी में ही करें। अंग्रेजी का पूर्ण बहिष्कार न करें, लेकिन उसका इस्तेमाल अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे पांच-छह अंग्रेजीभाषी देशों तक ही सीमित रखें। शेष महत्वपूर्ण देशों के साथ यदि हम उनकी भाषाओं में व्यवहार करेंगे तो हमारी कूटनीति में चार चांद लग जाएंगे। हमारी पकड़ उन देशों की आम जनता तक हो जाएगी। हमारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार चार गुना हो जाएगा। भारत को महाशक्ति बनाने का रास्ता आसान हो जाएगा। नरेंद्र मोदी के राज में भारत महाशक्ति नहीं बनेगा तो कब बनेगा?

 

वेदप्रताप वैदिक

भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष
[email protected]

Posted by on Jun 7 2014. Filed under खबर, मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

Leave a Reply

*

Recent Posts