Donation (non-profit website maintenance)

Live Indian Tv Channels

मोदी से पंगा मत ले यार

नरेंद्र मोदी के दोस्त और दुश्मन, दोनों अच्छी तरह जानते हैं कि अहं की लड़ाई वह पूरी शिद्दत से लड़ते हैं और हर हाल में अपनी नाक ऊपर रखते हैं। एक ऐसी ही लड़ाई वह अपने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी और अपने मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी करीब पिछले एक साल से लड़ रहे थे। इस बार टकराव की वजह थी, गडकरी के करीबी और नागपुर के दोस्त संजय जोशी की छह साल बाद बीजेपी में वापसी। मोदी और जोशी बीजेपी में करीब-करीब समकालीन हैं, दोनों गुजरात में संघ के प्रचारक रहे और पार्टी के लिए गुजरात में संगठन का काम किया। इसी दौरान जोशी तब के दिग्गज नेता केशुभाई के ज्यादा करीबी हो गए और दोनों ने मिलकर गुजरात की राजनीति से मोदी की विदाई करा दी। यहीं से मोदी और जोशी की अदावत शुरू हुई। मोदी ने जोशी की राष्ट्रीय राजनीति से छुट्टी करवा कर इसे सूद के साथ लौटाने भर की कोशिश की है।

Narendra-Modi

Narendra-Modi

मोदी जो बात दिल पर ले लेते हैं, उसका हिसाब चुकाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसे एक दशक पुरानी घटना से भी समझा जा सकता है। 2002 में गुजरात दंगे के दौरान इंडस्ट्री के दिग्गजों ने मोदी की जमकर आलोचना की थी। उसी साल हुए विधानसभा चुनाव में मोदी भारी बहुमत से जीते और इसके बाद फरवरी 2003 में उद्योगपतियों के संगठन सीआईआई ने दिल्ली के अपने हॉल में ‘नरेंद्र मोदी से मिलिए’ कार्यक्रम रखा। मंच पर मोदी के साथ-साथ जमशेद गोदरेज, राहुल बजाज और सीआईआई के डायरेक्टर जनरल तरुण दास थे। इस कार्यक्रम में भी गोदरेज और बजाज ने मोदी को काफी भला-बुरा कहा था। उस समय मोदी ने अपनी आलोचनाओं का माकूल जवाब दिया था लेकिन वह इसे भूले नहीं। इस घटना के कुछ ही दिनों बाद गुजरात के बड़े उद्योगपतियों ने मोदी के अपमान को मुद्दा बनाते हुए सीआईआई से नाता तोड़ने का ऐलान कर दिया था। इस विद्रोह के बाद सीआईआई को लगा कि पश्चिम भारत में उद्योग संगठन ही खत्म हो जाएगा। तत्कालीन डायरेक्टर जनरल तरुण दास ने मोदी से करीब-करीब माफी मांग कर किसी तरह मामले को रफा-दफा किया था।

इसका जिक्र यहां मैंने इसलिए किया क्योंकि इसके बिना मोदी की शख्सियत को नहीं समझा जा सकता है। वह हिसाब-किताब बराबर करने में विश्वास रखते हैं। और, इसकी सीख उन्हें कहीं और से नहीं अपनी पार्टी की ‘परंपरा’ और शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी से ही मिली है। सामूहिक नेतृत्व का दंभ भरने वाली बीजेपी भले ही हर मौके पर कांग्रेस के अंदर व्यक्ति पूजा पर निशाना साधती रही हो, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब जरूरत पड़ी तो खुद बीजेपी भी एक व्यक्ति के आगे घुटनों के बल खड़ी हो गई। पार्टी और संघ की अघोषित नीति रही है कि राजनीतिक तौर पर लोकिप्रय नेताओं के लिए रास्ता साफ करना ही पड़ता है।

मोदी ने संजय जोशी को निपटाने के लिए वही तौर-तरीका अपनाया, जिससे अटल बिहारी वाजपेयी एक जमाने के ताकतवर संगठन महामंत्री गोविंदाचार्य को निपटा चुके थे। सूत्रों का कहना है कि मोदी ने अपने दूत पुरुषोत्तम रुपाला के जरिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी से पहले संघ और नितिन गडकरी के पास संदेश पहुंचा दिया था कि जब अटल बिहारी वाजपेयी के लिए गोविंदाचार्य को बीजेपी से बाहर बैठाया जा सकता है, तो नरेंद्र मोदी के लिए संजय जोशी को बीजेपी से बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखाया जा सकता? बताया जा रहा है कि मोदी के इस संदेश के बाद गडकरी ने तुरंत संघ प्रमुख मोहन राव भागवत से बात की और उन्होंने भी 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले सभी कील-कांटे दुरुस्त करने के लिए इसे हरी झंडी दे दी।

अटल बिहारी वाजपेयी ही क्यों? शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे सिंधिया भी पार्टी में अपने विरोधियों को इसी तरह हाशिये पर पहुंचाने की कोशिश कर चुके हैं। गडकरी की अथक कोशिश से जब उमा भारती की बीजेपी में वापसी हुई तो चौहान ने उनके मध्य प्रदेश में राजनीतिक गतिविधि पर रोक की शर्त पर मंजूरी ले ली थी। वसुंधरा ने भी हाल ही में इसी दबाव की राजनीति के जरिए गुलाब चंद कटारिया की सूबे में यात्रा रुकवा दी थी। (बाएं देखें मोदी का पुराना फोटो)

मोदी ने अपनी तुलना पार्टी के शिखर पुरुष वाजपेयी से करके महत्वाकांक्षा साफ कर दी है। संघ पहले ही कह चुका है कि 2014 के लिए वही नेता अगुवाई करेगा, जिसे जनता पसंद करेगी। यानी हर नेता को चुनावी मैदान में तो उतरना ही होगा। और, संघ के इस संकेत के बाद मोदी का यह कदम अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और गडकरी समेत पीएम बनने का सपना देख रहे पार्टी के सभी नेताओं को यह बताने के लिए काफी है कि आगे काफी दुश्वारियां आएंगी।

लेखक :  प्रभाष झा
soruce : http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/darbhangatodilli/entry/narendra-modi-believe-in-vengeance

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=1206

Posted by on May 25 2012. Filed under सच, हिन्दुत्व. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

1 Comment for “मोदी से पंगा मत ले यार”

  1. Rutvij Master

    well intresting story, but we all know that when Govindacharya had left the BJP, what happened to the Party.
    Mr. Nitin Gadkari is no where what Mr. Govindacharya was.
    BJP has no vision now, and so true for Mr. Narendra Modi.
    dont mind but i am from Gujarat and i knew what going on in Gujarat and BJP.
    BJP is most disciplined party in 90’s but now ?
    what was happend in K’tak , it show that they have no control over a person like Yeddurappa who is corrupt, and a clean man like Gowda has to resign.
    Is this the practice BJP wants to adopt?
    Even Modi is not Cleaned

Leave a Reply

*

Recent Posts

Photo Gallery