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नरेन्द्रमेव जयते!

नरेन्द्र भाई जीत गये. सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गुजरात दंगों की जांच के लिए जो विशेष समिति गठित की थी उसकी फरवरी में दी गई क्लोजर रिपोर्ट के आधार पर मजिस्ट्रेट ने कह दिया कि नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कोई सबूत एसआईटी को नहीं मिला है. क्लोजर रिपोर्ट में जांच के लिए गठित विशेष समिति एसआईटी को नरेन्द्र मोदी या फिर उनके उन 57 लोगों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला जिन पर आरोप था कि गुजरात दंगों की साजिश सीएम हाउस का समर्थन हासिल था. जिस गुलबर्गा सोसायटी हत्याकांड में जीवित बची जाकिया जाफरी की फरियाद पर सुप्रीम कोर्ट ने विशेष जांच टीम गठित की थी उनके लिए अब दीन दुनिया में मामला खत्म. इसलिए फैसला आने के बाद जाकिया जाफरी ने कहा कि उन्हें ऊपरवाले पर पूरा भरोसा है कि उन्हें न्याय मिलेगा.

जब पहली दफा मार्च 2010 में एसआईटी ने नरेन्द्र मोदी को सम्मन जारी किया था तो मीडिया में बड़ा हो हल्ला मचा था. सम्मन को फैसला बताते हुए मीडिया ने नरेन्द्र मोदी को दोषी मान लिया था. लेकिन उस वक्त भी हमारा मानना था कि इस पूरे प्रकरण से नरेन्द्र मोदी और मजबूत होकर उभरेंगे. वही हुआ. नरेन्द्र मोदी के दामन पर गुजरात दंगों का दाग तकनीकि तौर पर अब धुल जाएगा क्योंकि गुलबर्गा सोसायटी में हुआ हत्याकांड ही ऐसा मामला था जिसमें जाकिया जाफरी पूरी शिद्दत से न्याय की पैरवी कर रही थीं. अब उनकी आंखें दूसरी दुनिया की ओर ऊपर उठ गई हैं.

लेकिन एहसान जाफरी के बेटे तनवरी जाफरी अभी अल्लाह से न्याय मांगने तक नहीं पहुंचे हैं. तनवीर जाफरी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि यह एसआईटी की रिपोर्ट है जिसे क्लोजर रिपोर्ट बनाने की तैयारी है. लेकिन अभी मजिस्ट्रेट ने अपना फैसला नहीं दिया है. तनवीर कहते हैं कि वे अपनी लड़ाई जारी रखेंगे. तनवीर या उनकी मां जाकिया की लड़ाई क्या है?

जाकिया जाफरी कांग्रेस से सांसद रहे एहसान जाफरी की पत्नी हैं और 2002  में गुजरात में हुए दंगों में उन्होंने अपने पति को खो दिया था. गुलबर्गा सोसायटी में जो 69  लोग मारे गये थे उसमें एहसान जाफरी भी थे. 2002 गोधरा ट्रेनकाण्ड में निर्ममता से 58 नागरिक मार दिये गये थे. मारे गये इन नागरिकों का बदला लेने के लिए पूरे गुजरात में दंगे भड़क गये थे जिसमें अधिकृत रूप से 1200 लोगों के मारे जाने की बात कही जा चुकी है. इन दंगों के कारण गुजरात को बहुत हानि उठानी पड़ी थी. यह भी महज संयोग ही है शायद कि गुजरात दंगों का एक दशक इसी मार्च में पूरा हुआ है.

इतना तो साफ दिखता है कि गुजरात दंगों के एक दशक बाद भी मोदी के दामन पर दंगों का दाग अभी भी लगा हुआ है और वह किसी भी एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट से कभी धुलेगा भी नहीं. तकनीकि तौर भले ही नरेन्द्र मोदी के खिलाफ सबूत न मिलने की बात कहकर पीछा छुड़ा लिया जाए लेकिन जिन नरेन्द्र मोदी को उनकी ही पार्टी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी दंगों के दोषी मानकर उनका इस्तीफा चाहते थे उन नरेन्द्र मोदी को गुजरात के पाप से कभी मुक्ति नहीं मिल सकेगी. एक दशक बीत जाने के बाद नरेन्द्र मोदी ने सद्भावना उपवासों का एक सिलसिला भी चलाया लेकिन उनकी सद्भावना का संदेश यही था कि भूले से भी कोई मुस्लिम टोपी उनके सिर नहीं चढ़ पाई.

भारतीय जनता पार्टी के लिए नरेन्द्र भाई की यह “जीत” कितनी बड़ी राहत है कि भाजपाई मदमत्त होकर “गर्वोक्ति” कर रहे हैं कि विरोधी कम से कम अब नरेन्द्र मोदी को “बदनाम” करना बंद कर दें. विरोधियों को निश्चित रूप से अब नरेन्द्र मोदी को बदनाम करना बंद कर देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि  दोष नरेन्द्र मोदी का नहीं है. दोष तो उस बदले हुए समाज का है जहां सांप्रदायिक कट्टरता हमारे जीवन का सबसे अहम मुद्दा बन गया है. मोदी तो सिर्फ उस हिन्दूवादी उफान पर सवार नाविक हैं जो पूरे गुजरात में हिलोरे मार रही है. गोधरा से लेकर गुजरात के दंगों तक क्या सब कुछ अपने आप हो गया या फिर जानबूझकर किया गया यह अबूझ पहेली अबूझ ही बनी रहेगी. लेकिन जहां तक नरेन्द्र मोदी नाम का सवाल है तो गांधी के गुजरात की सच्चाई यही है कि सत्यमेव जयते को गुजरात ने अपनी सुविधा के अनुसार अब नरेन्द्रमेव जयते कर लिया है. कोई माने या फिर न माने तब तक सच्चाई यही यही बनी रहेगी जब तक खुद गुजरात की पांच करोड़ जनता इसे अस्वीकार नहीं कर देती.

Source : http://visfot.com/home/index.php/permalink/6182.html

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Posted by on Jul 28 2012. Filed under खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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