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भारत का आपदा प्रबंधन खुद है बहुत बड़ी आपदा

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उत्तराखण्ड में आई बाढ़ ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल आपदा प्रबंधन को लेकर है। भारत में हर साल मानसून के दौरान बाढ़ आती है। सैंकड़ों लोग मारे जाते हैं और हजारों एकड़ में खड़ी फसलें तबाह हो जाती है। साथ ही करोड़ों रूपए की संपत्ति का नुकसान होता है। हर बार हम आपदा आने के बाद चेतते हैं लेकिन तब तक बहुत कुछ तबाह हो चुका होता है।

उत्तराखण्ड में भी यही हो रहा है। सवाल यह है कि देश में कोई सही आपदा प्रबंधन है भी या नहीं? क्या वजह है कि पिछले चार दिन से लोग फंसे हुए हैं और उन तक राहत और बचाव दल नहीं पहुंच पा रहा है। कैग ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विभाग की कार्यशैली को लेकर कई सवाल खड़े किए थे। न तो विभाग के पास पर्याप्त मानव संसाधन है और न ही वह पूरी तरह सुसçज्जत है। मौसम विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग के बीच कोई समन्वय नहीं है। पर्यावरण विशेषज्ञ तो आपदा प्रबंधन को ही बहुत बड़ी आपदा मानते हैं?

यह है भारत की स्थिति 

यूनिक जियो-क्लाइमेट कंडीशंस के कारण भारत बाढ़,सूखा,तूफान और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं का आसानी से शिकार होने वाला देश है। दुनिया भर में बाढ़ से मरने वालों में हर पांचवा भारतीय होता है। भारत के 35 राज्य और केन्द्र प्रशासित प्रदेशों पर प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना रहता है। भारत का 5 फीसदी भूभाग बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में आता है। हर साल औसतन 18.6 मिलियन हेक्टेयर भू भाग और 3.7 हेक्टेयर में खड़ी फसलें बाढ़ से प्रभावित होती हैं।

भारत का 60 फीसदी भूभाग भूकंप प्रभावित क्षेत्र में आता है। भारतीय उपमहाद्वीप के कुल भूभाग का 8 फीसदी तूफान प्रभावित क्षेत्र में है। 68 फीसदी इलाका सूखे को झेलता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक दशक में (2000 तक)प्राकृतिक आपदाओं के कारण औसतन 4,344 लोगों ने अपनी जान गंवाई जबकि 3 करोड़ लोग इनसे प्रभावित हुए। साथ ही करोड़ों रूपए की संपत्ति का नुकसान हुआ।

एनडीएमए-मौसम विभाग में तालमेल की कमी

हालिया मानसून के बारे में भविष्यवाणी सटीक साबित होने के बाद मौसम विभाग की साख बढ़ी है लेकिन उत्तराखण्ड के मामले में मौसम विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विभाग असफल साबित हुए हैं। दोनों विभागों के बीच तालमेल की कमी साफ नजर आती है। मौसम विभाग के अधिकारियों का कहना है कि हमने भारी बारिश की चेतावनी दी थी लेकिन वेदर सिस्टम के आंकड़ों का विश्लेषण और बारिश बताती है कि अतिवृष्टि की चेतावनी नहीं दी गई थी।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विभाग का कहना है कि उन्हें अतिवृष्टि की उम्मीद नहीं थी। अगर ऎसा अनुमान होता तो पहले ही लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया जाता। अधिकारियों के मुताबिक मौसम विभाग ने एनडीएमए को कोई पूर्वानुमान नहीं बताया था। हमारे पास सामान्य पूर्वानुमान की सूचना आई थी। वहीं मौसम विभाग के निदेशक डॉक्टर बीपी यादव का कहना है कि हमें भारी बारिश के बारे में पहले से पता था हमने चेताया भी था। एनडीएमए के अधिकारियों का कहना है कि केदारनाथ में बादल फटे जिससे तबाही हुई है। बादल फटने के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता।

भारी बारिश के बारे में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। वहीं मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉक्टर अजीत त्यागी का कहना है कि बादल नहीं फटे थे। बारिश ने हिमाचल और उत्तराखण्ड के बड़े इलाके को अपनी चपेट में लिया। 48 घंटे लगातार बारिश हुई। बादल फटने के कारण इतना बड़ा इलाका चपेट में नहीं आता। एनडीएम के अधिकारियों का कहना है कि हम तभी रिएक्ट करते हैं जब राज्य मदद मांगता है। समस्या यह है कि उत्तराखण्ड में आपदा राहत बल स्थापित ही नहीं हुआ है।

कैग ने दिखाया था एनडीएमए को आईना
हमारे देश में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता वाल आपदा प्रबंधन बोर्ड है। कैग की रिपोर्ट में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विभाग की खूब खिंचाई गई थी। रिपोर्ट कहती है कि शुरूआत से ही आपदा प्रबंधन बोर्ड की कोई योजना सफल नहीं हो पाई है। आपदाओं से निपटने की तैयारियों को लेकर एनडीएमए में गंभीर कमियां हैं। उसके पास न तो जानकारियां होती है और न ही आपदाओं से निपटने पर नियंत्रण है। स्थापना के 6 साल बाद भी न तो वह राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को अंतिम रूप दे पाया न ही वह प्रमुख प्रोजेक्टों को पूरा कर पाया।

ये हैं आपदा प्रबंधन की कमजोरियां

हिमालयन एनवायरमेंट स्टडीज एंड कंजरवेशन ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक अनिल जोशी का कहना है कि सवाल यह नहीं है कि कैग की रिपोर्ट क्या कहती है या बोर्ड की नीतियों को कौन लीड करता है? जोशी के मुताबिक इस तरह के बोर्ड के पास समुदाय का अनुभव होना चाहिए। जोशी के मुताबिक किसी ने उत्तराखण्ड की आपदा प्रबंधन शाखा पर ध्यान नहीं दिया है। यह न तो सुसज्जित है और न ही उसके पास आकस्मिक आपदाओं से निपटने के संसाधन हंै। सरकार तभी जागती है जब आपदा आ जाती है। उत्तराखण्ड में पहले की तीन आपदाओं से कोई सबक नहीं लिया गया। हमारे पास आपदा प्रबंधन की कोई नीति ही नहीं है। आपदा के बाद भी आपदा प्रबंधन असफल हुआ है।

गावों के प्रति नहीं है संवेदनशीलता 
जोशी के मुताबिक सरकार ग्रामीण इलाकों के प्रति असंवेदनशील है। जब दिल्ली में यमुना का जलस्तर बढ़ता है तब संसद तक हिल जाती है। गांवों में आने वाली आपदाओं के लिए न तो कोई नीति है और न ही कोई योजना।

2006 में हुई थी स्थापना

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विभाग की स्थापना 2006 में हुई थी। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है। उड़ीसा में चक्रवाती तूफान और गुजरात के कच्छ में भूकंप से हुई तबाही के बाद इसकी जरूरत महसूस हुई थी!

Source : patrika.com

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=2360

Posted by on Jun 20 2013. Filed under खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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