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Pushpa Singh Chauhan women who provided free food to flood affected people in Uttarakhand : पुष्पा सिंह की मिसाल: दुखों के पहाड़ के बीच लोगों के पेट भरता रहा एक लंगर

Pushpa Singh Chauhan

Pushpa Singh Chauhan

पुष्पा सिंह चौहान देखने में स्वाभाविक तौर पर नेकदिल लगती हैं।

पर आपदा पीड़ित इलाके में उनकी कोशिश, रहमत और दृढ़ता इसलिए भी खास है कि जहां एक तरफ तीर्थयात्रियों को ठगने, उनसे ज्यादा पैसा वसूलने की खबरें आ रही थीं, वहां पुष्पा सिंह ने सेवा और परेशानहाल लोगों की मदद की इबारत लिखी है।
उत्तराखंड में बाढ़ और भूस्खलन से मची तबाही और बेशुमार मौतों के बीच इस तरह की शिकायतें आई थीं कि कुछ किरानेवाले, दुकानदार, होटल मालिक व अन्य कारोबारी तीर्थयात्रियों से ज्यादा पैसे ले रहे हैं। पर हकीकत में यहां ऐसे लोग भी हैं जो संकट के वक्त मददगार बने हुए हुए हैं। पुष्पा ऐसे ही लोगों में हैं।
39 वर्षीय पुष्पा गणेशपुर गांव में एक किराने की दुकान की मालकिन हैं। अपने इलाके में आई विपत्ति और तीर्थयात्रियों की त्रासद आपबीती से व्यथित होकर उन्होंने अपनी दो सहेलियों के साथ मदद का बीड़ा उठाया। मनेरी इलाके में उन्होंने आगे बढ़कर पीड़ितों की मदद की। इस इलाके में यह हाल था कि आगंतुक पैसा देकर भी सामान खरीदने की हालत में नहीं थे। स्थानीय होटलों औ ढाबों में सामान नहीं था कि लोगों का पेट भर सकें। जिला प्रशासन भी अभी तक यहां नहीं पहुंचा था।
ऐसे हालात देखकर पुष्पा और अन्य साथी महिलाओं ने गणेशपुर में अन्य लोगों को तैयार किया और गरमपानी नामक स्थान में लंगर चलाने का फैसला किया। यह क्षेत्र उत्तरकाशी की चढ़ाई के पहले ही पड़ता है। बाढ़ और तबाही में फंसे तीर्थयात्री वापसी में जब गरमपानी आए तो पेट भरने के लिए यह लंगर मौजूद था।
पुष्पा ने मंगलवार को इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि यह हमारे लंगर का आठवां दिन है। हमने रोज तकरीबन आठ सौ तीर्थयात्रियों को भोजन दिया। इस इलाके में भूस्खलन और बाढ़ ने गरमपानी को जाने वाले रास्तों को बंद कर दिया है। अब गंगोत्री के प्रवेशद्वार गंगोरी से चार किलोमीटर के ट्रैक के जरिए ही यहां पहुंचा जा सकता है।
पिछले सात दिनों की ही तरह मंगलवार सुबह पुष्पा  अपनी मोटरसाइकिल से उत्तरकाशी-गंगोत्री राजमार्ग में लगे इस लंगर तक पहुंची। पुष्पा और उनकी एक साथिन रसोई के लिए आलू की एक बोरी लेकर आई थी। उन्होंने एक तंबू में बने रसोईघर में उपलब्ध सामग्री का जायजा लिया और पता लगाया कि कितना गेहंू , चावल, सब्जी, तेल बचा है।

उनके दल में गणेशपुर के हर परिवार से एक महिला है। वे सभी लंगर की तैयारियों में जुटी हुई थीं। इनमें से बहुत महिलाएं दैवी आपदा की मार को समझती हैं। याद रहे, 1991 में उत्तरकाशी में  आए भूकंप से यहां काफी तबाही मची थी और 48 लोग मारे गए थे।
पुष्पा बताती हैं कि उस भूकंप के बाद हमने जाना कि खुले आसमान में बसर करना पीड़ादायी होता है। उन्होंने बताया कि गणेशपुर के हर परिवार ने इस लंगर के लिए मदद की है। तीर्थयात्रियों को खाना देने के अलावा पुष्पा तीर्थयात्रियों को इस बात के लिए आश्वस्त कर रही हैं कि यात्रा जारी रखने में उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं आने दी जाएगी। पुष्पा ने लोगों को यह भरोसा भी दिलाया कि सामान ले जाने वाले नेपाली कुली उनसे ज्यादा पैसा नहीं वसूल करेंगे। उन्होंने सभी तीर्थयात्रियों से फोन नंबर लिए और कहा कि कोई नेपाली मजूर उनसे ज्यादा वसूलें तो फोन पर बताएं।
इसी तरह पुष्पा ने इस बात का प्रयास किया कि टांसपोर्टर तीर्थयात्रियों से ज्यादा पैसा न वसूलें। उन्होंने बताया कि गरमपानी से तीन किलोमीटर दूर हीना में लोगों को लाने वाले वाहन चालक पंद्रह रुपए से ज्यादा नहीं ले रहे हैं। वाहन चालकों को चेतावनी दी गई है कि अगर उन्होंने ज्यादा पैसे वसूल किए तो इसकी शिकायत आरटीओ से की जाएगी। हालांकि ज्यादातर तीर्थयात्रियों ने भागीरथी घाटी को खाली कर दिया है। लेकिन पुष्पा का कहना है कि अभी लंगर जारी रहेगा, क्योंकि कुछ लोग अब भी यहां फंसे हो सकते हैं।
पुष्पा को अब स्थानीय दुकानदारों से उधार में लिए गए सामान के दाम चुकाने होंगे। उनका कहना है कि यह कोई मसला नहीं है। हम इस समस्या को आसानी से निपटा लेंगे।
Pushpa Singh Chauhan seems like a natural good samaritan. But her kindness, effort and persistence stand out as they form a stark contrast to reports of some shopkeepers, hotel owners and transporters fleecing pilgrims stranded in Uttarakhand after the flash floods.
A grocery shop owner in Ganeshpur village, Pushpa, 39, and two of her friends were struck by the plight of pilgrims stuck in the nearby Maneri area as the Bhagirathi was flooded. The visitors were running out of money and the local hotels and dhabas had no supplies to feed them. And the district administration was yet to reach them. Pushpa and her friends returned to Ganeshpur and mobilised other women and decided to open a “langar” or free community kitchen at a place called Garampani. The place is located at the beginning of the final climb to Uttarkashi town and pilgrims stranded in the flood-ravaged Bhagirathi valley reach Garampani on their way back. “This is the eighth day of our langar here. We have fed at least 800 pilgrims every day since June 18,” Pushpa told The Indian Express on Tuesday. The flooding and landslides have cut off road access to Garampani and it can be reached only after a 4-km trek from Gangotri, the entry point to Gangotri. Like she has been doing for the last seven days, Pushpa reached the langar on the Uttarkashi-Gangotri highway along the Bhagirathi on her motorbike Tuesday morning. She and a colleague were carrying a sack of potatoes for the kitchen. At the makeshift store, she checks the availability of wheat flour, rice, vegetables and edible oil. Her team, comprising of one woman from every family in Ganeshpur, is busy cooking. Many of them know what it feels like to be hit by a natural disaster. Ganeshpur was badly affected in the 1991 Uttarkashi earthquake and saw 48 people die.
Source : Indian Express , Sanjay Singh (Reporter , ganeshpur)
We salute her
Source : jansatta.com  allindiadaily.com

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=2378

Posted by on Jun 28 2013. Filed under आधी आबादी, खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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