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राजस्थानी लोककथा लेखक विजयदान देथा का निधन

राजस्थानी भाषा के जानेमाने साहित्यकार विजयदान देथा का निधन हो गया है. वे 87 साल के थे।

विजयदान देथा (१ सितम्बर १९२६ – १० नवम्बर २०१३) जिन्हें बिज्जी के नाम से भी जाना था राजस्थान के विख्यात लेखक और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति थे। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार और साहित्य चुड़ामणी पुरस्कार जैसे विभिन्न अन्य पुरस्कारों से भी समानित किया जा चुका था। १० नवम्बर २०१३ को ८७ वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

बिज्जी के नाम से मशहूर विजयदान देथा अपनी कहानियों के लिए देश-विदेश में मशहूर थे।

राजस्थान के बोरुंदा  के रहने वाले विजयदान देथा ने राजस्थानी में करीब 800 छोटी-बड़ी कहानियां लिखीं. जिनका कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है।vijaydan-detha

उनकी कहानियों में राजस्थानी लोक संस्कृति, आम जीवन की झलक मिलती है। विजयदान देथा को साहित्य अकादमी और पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

फिल्मकारों की पसंद
उनकी कहानियों और उपन्यासों पर कई नाटक और फ़िल्में बनी हैं, जिनमें श्याम बेनेगल की फ़िल्म और हबीब तनवीर का नाटक चरणदास चोर, प्रकाश झा की परिणीति और उनकी कहानी ‘दुविधा’ पर इसी नाम से बनी मणि कौल की फ़िल्म और अमोल पालेकर की ‘पहेली’ शामिल हैं।

विजयदान देथा ने बच्चों के लिए भी कहानियां लिखी थीं।

बने बनाए सांचों को तोड़ने वाले देथा ने कहानी सुनाने की राजस्थान की समृद्ध परंपरा से अपनी शैली का तालमेल किया।

चतुर गड़ेरियों, मूर्ख राजाओं, चालाक भूतों और समझदार राजकुमारियों की ज़ुबानी देथा ने जो कहानियां बुनीं उन्होंने देथा के शब्दों को जीवंत कर दिया।

गहरा असर
उनकी कहानियों की गूंज भाषाओं, संस्कृतियों और समय के पार पहुंचती है।

हिंदी के जाने माने साहित्यकार अशोक वाजपेयी कहते हैं, “उन्होंने एक अद्भुत काम किया जो आधुनिक हिंदी साहित्य में अनूठा है। उन्होंने राजस्थान की बहुत सारी लोक कथाओं का पुनर्विष्कार किया. ऐसे लोग हैं जिन्होंने लोक कथाओं का उपयोग किया है लेकिन इतनी कल्पनाशीलता के साथ किसी ने नहीं किया।”

विज्जी ने राजस्थान को नहीं छोड़ा, उन्होंने सिर्फ़ राजस्थानी में ही रचनाएं की।

वाजपेयी कहते हैं, “रेणु की तरह ही उन्होंने दिल्ली से दूर रहकर काम किया. उन्होंने तो अपना गांव भी नहीं छोड़ा. देथा ने कोमल कोठारी के साथ मिलकर रूपायन में काफ़ी अच्छा काम किया. राजस्थान के लोक संगीत को संरक्षित और एक तरह से पुनर्जीवित किया।”

वाजपेयी आगे कहते हैं, “वो सिर्फ़ इसलिए नहीं जाने जाएंगे कि उनकी कहानियों पर फिल्में बनीं, बल्कि वो कठिन परिस्थितियों में जिजीविषा की विजय के लेखक थे।”

 

कार्य

हिन्दी

अपनी मातृ भाषा राजस्थानी के के समादर के लिए ‘बिज्जी’ ने कभी अन्य किसी भाषा में नहीं लिखा, उनका अधिकतर कार्य उनके एक पुत्र कैलाश कबीर द्वारा हिन्दी में अनुवादित किया।

  • उषा, १९४६, कविताएँ
  • बापु के तीन हत्यारे, १९४८, आलोचना
  • ज्वाला साप्ताहिक में स्तम्भ, १९४९–१९५२
  • साहित्य और समाज, १९६०, निबन्ध
  • अनोखा पेड़, सचित्र बच्चों की कहानियाँ, १९६८
  • फूलवारी, कैलाश कबीर द्वारा हिन्दी अनुवादित, १९९२
  • चौधरायन की चतुराई, लघु कथाएँ, १९९६
  • अन्तराल, १९९७, लघु कथाएँ
  • सपन प्रिया, १९९७, लघु कथाएँ
  • मेरो दर्द ना जाणे कोय, १९९७, निबन्ध
  • अतिरिक्ता, १९९७, आलोचना
  • महामिलन, उपन्यास, १९९८
  • प्रिया मृणाल, लघु कथाएँ, १९९८

राजस्थानी

  • बाताँ री फुलवारी, भाग १-१४, १९६०-१९७५, लोक लोरियाँ
  • प्रेरणा कोमल कोठारी द्वारा सह-सम्पादित, १९५३
  • सोरठा, १९५६–१९५८

परम्परा, इसमें तीन विशेष चीजें सम्पादित हैं – लोक संगीत, गोरा हातजा, जेथवा रा * राजस्थानी लोक गीत, राजस्थान के लोक गीत, छः भाग, १९५८

  • टिडो राव, राजस्थानी की प्रथम जेब में रखने लायक पुस्तक, १९६५
  • उलझन,१९८४, उपन्यास
  • अलेखुन हिटलर, १९८४, लघु कथाएँ
  • रूँख, १९८७
  • कबू रानी, १९८९, बच्चों की कहानियाँ

देथा को निम्नलिखित कार्यों के सम्पादन के लिए भी आकलित किया जाता है

  • साहित्य अकादमी के लिए गणेशी लाल व्यास का कार्य पूर्ण किया।
  • राजस्थानी-हिन्दी कहावत कोष।

पुरस्कार और सम्मान

  • राजस्थानी के लिए १९७४ का साहित्य अकादमी पुरस्कार
  • १९९२ में भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार
  • १९९५ का मरुधारा पुरस्कार
  • २००२ का बिहारी पुरस्कार
  • २००६ का साहित्य चूड़ामणि पुरस्कार
  • २००७ में पद्मश्री 
  • मेहरानगढ़ संग्राहलय ट्रस्ट द्वारा २०११ में राव सिंह पुरस्कार

 

News Source : amarujala.com & wikipedia.org

Posted by on Nov 10 2013. Filed under खबर, राजस्थान. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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