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केजरीवाल का राज संन्यास

Resignation Of Arvind Kejriwal

Resignation Of Arvind Kejriwal

 

केजरीवाल व्यवस्था को कोसते हुए बाहर हो गए। उसी व्यवस्था का इस्तेमाल करके श्रीधरन दिल्ली में मेट्रो चलाकर दिखाते हैं, लेकिन उन्हें लोकप्रियता नहीं मिलती। यह मानसिकता का फर्क है। सत्ता छोड़कर अरविंद केजरीवाल फिर लोकप्रियता की लहर पर सवार हो गए हैं। दिसंबर में उन्होंने लोगों से पूछकर सरकार बनाने का अनोखा प्रयोग किया था। रामलीला मैदान पर शपथविधि समारोह हुआ। खर्च हुआ 70-72 लाख रुपए। शीला दीक्षित के शपथ-समारोह में बमुश्किल 10 लाख रुपए खर्च हुए थे। जनता ने नहीं माना कि केजरीवाल ने फिजुलखर्ची की। यह आदमी ईमानदार है, फैसलों में हमें शामिल करता है, यही सोचकर जनता खुश थी। किंतु यह खुशी केजरीवाल के सत्ता में आने के बाद कम होने लगी।
संसद के सामने धरने का नाटक हुआ। कुछ सयानों ने समझाया कि भाई मुख्यमंत्री का यह काम नहीं है, लेकिन केजरीवाल जानते थे कि भारतीय जनता को नाटकबाजी बहुत पसंद है। वे और उनके चाणक्य योगेंद्र यादव को पता था कि सड़क पर सोने से समस्याएं नहीं सुलझेंगी पर लोगों के मन में सहानुभूति जरूर पैदा होगी। फिर भी लगा कि लोकसभा चुनाव तक ‘आप’ की हवा टिकेगी नहीं इसलिए सत्ता छोडऩे का ब्रह्मास्र चलाया और लोकप्रियता फिर हासिल हो गई।

इतिहास देखें तो केजरीवाल व योगेंद्र यादव दोनों आरएसएस की विचारधारा और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के प्रखर विरोधी रहे हैं। केजरीवाल के पूंजीवाद विरोध और सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की राय में काफी समानता है।मनमोहन सिंह, चिदंबरम और अहलुवालिया को रोकने वाले कांग्रेस के वाम प्रवाह से केजरीवाल व यादव का वैचारिक नाता है। भारत में ऐसा एक बड़ा वर्ग है, जिसकी आस्था कांग्रेस की विचारधारा से तो है, लेकिन कांग्रेस से उसे नफरत है। ‘आप’ की लोकप्रियता का एक कारण यह भी है।
लोकप्रियता का दूसरा कारण भारतीय मानसिकता में छिपा है। किसी भी तरह का त्याग करके संन्यास लेने वाले लोग हमें बहुत प्रिय हैं। दृढ़ता से पैर जमाकर, संस्था निर्माण कर उन्हें सफलतापूर्वक चलाने वाले लोगों को जनता का प्रतिसाद नहीं मिलता। सत्ता त्याग करने वालों की तुलना में सत्ता चलाने वालों को हीन भाव से देखा जाता है।

केजरीवाल इस व्यवस्था को कोसते, गरियाते बाहर हो गए, लेकिन उसी व्यवस्था का उपयोग कर श्रीधरन दिल्ली में मेट्रो चलाकर दिखाते हैं पर उन्हें लोकप्रियता नसीब नहीं होती। व्यवस्था वही है, एक उसे धिक्कारता है, दूसरा उसका सकारात्मक उपयोग करता है। दुनिया बदलने के लिए नहीं, छोडऩे के लिए जीना है, यह दृष्टिकोण भारतीय विचारधारा में गहराई से बसा है। इसलिए धिक्कारने वाला यहां लोकप्रिय होता है। अमेरिका में उद्योगपति ऑयकन बनते हैं तो भारत में साधु-संन्यासियों को असंख्य भक्त मिल जाते हैं। यह दो मानसिकताओं का फर्क है।
हालांकि, व्यवस्था चलाने वाले नेता व उद्योगपतियों ने आज तक इतनी लूट मचाई है कि केजरीवाल की सादगी और साफगोई लोगों को मोह लेती है। किंतु इसी तरीके से उन्होंने दिल्ली में सत्ता चलाई होती तो जनता को कई गुना ज्यादा फायदा पहुंचता। इसे केजरीवाल भी भूल रहे हैं और जनता भी।
प्रशांत दीक्षित

लेखक दिव्य मराठी, महाराष्ट्र के संपादक हैं

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भारत -एक हिन्दू राष्ट्र

अंकिता सिंह

Web Title : Resignation Of Arvind Kejriwal

Keyword : AAP, Arvind Kejriwal, Congress, Delhi Assembly, Lieutenant Governor, Najeeb Jung, Pranab Mukherjee, President, President’s Rule, Shiromani Akali Dal, Union Cabinet

Posted by on Feb 19 2014. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

1 Comment for “केजरीवाल का राज संन्यास”

  1. Akhilendra

    Bilkul sach kaha bhartiya janta noutanki pasand hai aur kejriwal yah bahut acche se samjhta hai.

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