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संघ और राजनीति

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चुनाव आते ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चर्चित हो जाता है। संघ के सिद्धांत और संगठन पर सवाल उठने लगते हैं। सवाल गंभीर लगता है और पूछने वाले भी गंभीर दिखते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय राजनीति एक गहन वैचारिक चिंतन, मंथन और विमर्श के दौर से गुजर रही है। पर इस बौद्धिक उपक्रम का प्रवेश द्वार और निकास द्वार इतना सन्निकट होता है कि यह पता ही नहीं चलता कि विमर्श कब शुरू होकर कब खत्म हो गया और उन विमर्शों से हासिल क्या हुआ? यह सिलसिला 1952 से चल रहा है। इसलिए 2013-14 में जो संघ केंद्रित बहस शुरू हुई है उसमें कोई नयापन नहीं है।

 

 

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के मुखपत्र ‘पीपुल्स डेमोक्रेसी’ के 17 नवंबर 2013 के अंक के संपादकीय में संघ समर्थित राजनीति पर सवाल खड़ा किया गया है। क्योंकि उससे ‘असहिष्णु फासीवादी हिंदू राष्ट्र’ कायम होने का खतरा है। हालांकि 1977 में जनता पार्टी और 1989 में वीपी सिंह के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा की सरकार को माकपा का समर्थन प्राप्त था। दोनों ही सरकारों में जनसंघ/भाजपा की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। तब माकपा को ‘असहिष्णु हिंदू राष्ट्र’ का डरावना सपना नहीं आया था। 1967 में संविद सरकारों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय जनसंघ दोनों की सहज उपस्थिति थी। भाकपा ने कहा था कि राजनीति में छुआछूत का कोई स्थान नहीं है। तब यह माकपा को रास नहीं आया था। इसके नेता बीटी रणदिवे ने ‘पीपुल्स डेमोक्रेसी’ में 2 जून 1968 को ‘एलायंस विद जनसंघ’ लेख में भाकपा पर प्रहार करते हुए लिखा कि ‘संशोधनवादियों ने जनसंघ से समझौता कर मार्क्सवाद के सभी बुनियादी सिद्धांतों और सम्मान को बेच दिया है।’

1977 और 1989 में भाकपा की बारी थी। भाकपा के नेता भूपेश गुप्त ने माकपा पर ‘प्रतिक्रियावादी’ जनसंघ को गले लगाने का आरोप मढ़ दिया। दोनों ही अवसरों पर माकपा ने 1967 को ही आधार बना कर अपना बचाव किया। इएमएस नम्बूदरीपाद ने 5 फरवरी 1978 को ‘पीपुल्स डेमोक्रेसी’ में लिखा कि ‘क्या भूपेश गुप्त सोचते हैं कि पाठकों की याददाश्त इतनी कमजोर है कि वे भूल गए हैं उनकी पार्टी जनसंघ के नेतृत्व और प्रभुत्व वाली बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों में शामिल हुई थी?’ इस आरोप-प्रत्यारोप को सिर्फ नमूने के रूप में देखा जा सकता है। ‘प्रतिक्रियावाद’ और ‘प्रगतिशीलता’ की अदला-बदली वैचारिक अवसरवाद का एक जीवंत प्रतीक है।

सन 1977 में जब जनता पार्टी में सोशलिस्ट और जनसंघ दोनों का विलय हुआ था, इसके पीछे करीब एक दशक से दो विचारधाराओं के बीच चल रहे संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्ष में परस्पर सहयोग की पृष्ठभूमि थी जिसे आपातकाल के दौरान और भी मजबूती मिली थी।

जनता पार्टी ऐतिहासिक कारणों से उपजी थी। वह राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और जनतंत्र से जुड़े अनेक प्रश्नों का समाधान कर सकती थी जो देश को औपनिवेशिक शासकों और कांग्रेस से विरासत के रूप में मिले थे। मगर अवसरवादी राजनीति ने विचार-विकास की प्रक्रिया पर पानी फेरने का काम किया। 1979-80 में जनता पार्टी में विलीन जनसंघ के सदस्यों के आरएसएस से लगाव पर आपत्ति उठाई जाने लगी। यह शुद्ध अवसरवाद था। जब कृष्णकांत ने संघ का मुद्दा 1977 में उठाया था तब कर्पूरी ठाकुर और राजनारायण ने इसे अनावश्यक माना। बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने कहा था कि आरएसएस भूमि सुधार और भूमि वितरण में सक्रिय सहयोग कर रहा है। पर जब सत्ता-समीकरण बदला और जनसंघ घटक रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में हुआ तो ठाकुर की नजर में रातोंरात संघ ‘प्रतिक्रियावादी’ और ‘सांप्रदायिक’ बन गया।

इस संदर्भ में जनता पार्टी की कार्यसमिति की 26-27 फरवरी 1980 की बैठक की रिपोर्ट से अनेक बातों से परदा उठता है। लालकृष्ण आडवाणी ने कार्यसमिति में कहा था कि जब तक जगजीवन राम को पार्टी में रहना था तब तक संघ परेशानी का कारण नहीं था लेकिन जब उन्होंने पार्टी छोड़ने का मन बना लिया तब कारण संघ बन गया। यही बात पार्टी तोड़ने वाले प्राय: सभी लोगों ने की। मेहताब ने जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता के विवाद पर रोचक टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘यह ऐसा ही है जैसे दो-तीन बच्चों के जन्म के बाद पत्नी की जाति पूछना।’

देश में समाजवादियों का एक बड़ा धड़ा रहा है जो संघ के साथ संवाद और सहयोग में कहीं भी फासीवाद के आधिपत्य का डर नहीं महसूस करता था। इनमें राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्द्धन, अशोक मेहता, हरेकृष्ण मेहताब आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। राजनीति अवधारणाओं और पूर्वग्रहों पर नहीं चलती।

सकारात्मक और रचनात्मक संवाद को परिणाममूलक बनाने में समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया और जनसंघ के सर्वाधिक मान्य सिद्धांतकार दीनदयाल उपाध्याय का सबसे अधिक योगदान था। दोनों ही सत्तावादी नहीं थे। इसलिए सहयोग के पीछे राजनीति और वैचारिक आंदोलनों को जातीय खांचा बनने से रोकने की सुदृढ़ इच्छाशक्ति थी। किसी भी वैचारिक संवाद या संघर्ष का लक्ष्य जनोपयोगी राजनीति और राष्ट्र-हित होना चाहिए।

वे संघ की क्षमता और वैचारिक आग्रह से परिचित थे और उसमें परिवर्तन की जमीन तलाश रहे थे। इस संदर्भ में जेपी का पटना के संघ शिक्षा वर्ग में 3 नवंबर, 1977 का भाषण गौरतलब है। उन्होंने कहा था कि ‘संघ

को इस बात का चिंतन करना चाहिए कि देश में व्यापक आर्थिक बदलाव कैसे लाया जाए?’ वे जानते थे कि संघ का सामाजिक आधार मूलत: निम्न और मध्यवर्गीय है जिसमें व्यवस्था परिवर्तन की आकांक्षा और क्षमता दोनों होती हैं। प्रश्न उठता है कि जेपी का संघ से प्रत्यक्ष संवाद क्या उनके व्यक्तित्व में गिरावट का प्रतीक था, या बड़े फलक पर भारतीय राजनीति को देखने और समझने की उनकी चेष्टा थी?

संघ पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर पिछले कई दशकों से चल रहा है। लेकिन वह सैद्धांतिक बहस नहीं बन पा रहा है। राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी भारतीय संदर्भ को आधार बना कर या पूरी तरह से निरपेक्ष या स्वायत्त होकर संघ की भूमिका का विश्लेषण नहीं करते बल्कि बाहरी विचार या सत्ता की विवशता से प्रेरित होकर आलोचना या प्रत्यालोचना का दौर चलता है। वर्तमान में भी संघ पर विमर्श इसी आधार पर हो रहा है। क्या संघ और भाजपा या जनसंघ के संबंधों पर किसी ताजा बहस की जरूरत है?

वर्ष 1948 तक संघ का राजनीति से कोई वास्ता नहीं था। गांधी की हत्या का जुर्म इस पर आरोपित हुआ और संघ ने राजसत्ता से संघर्ष स्वतंत्र चिंतकों, दलीय नेताओं और बुद्धिजीवियों की मदद से किया। प्रतिबंध हटने के बाद संघ के भीतर राजनीति को लेकर लंबी बहस संघ के ‘पांचजन्य’ और ‘ऑर्गनाइजर’ में चली थी। संघ के पास चार विकल्प थे। एक तो स्वयं को राजनीतिक दल में तब्दील कर देना। दूसरा, राजनीति से पूरी तरह दूर रहना। दोनों ही बातों के समर्थक अल्पमत में थे। तीसरा, कांग्रेस या हिंदू महासभा के साथ सहयोग करना। और चौथा, नई पार्टी का गठन करना।

कांग्रेस के पटेल-टंडन-पंत धड़े की इच्छा थी कि संघ कांग्रेस में सम्मिलित होकर राजनीति में सहयोग करे। संघ से प्रतिबंध हटने के तुरंत बाद कांग्रेस की कार्यसमिति ने 7 अक्तूबर, 1949 को प्रस्ताव पारित कर संघ को कांग्रेस में आने का निमंत्रण दिया। तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर ने तो इस प्रस्ताव पर टिप्पणी करना भी मुनासिब नहीं समझा। हिंदू महासभा और संघ के बीच के संबंध को लेकर जो धारणा बनी हुई है वह यथार्थ से परे है।

संघ और महासभा के बीच दूरी 1932 से ही बढ़ती चली गई। महासभा पर बिड़ला और अन्य बड़े घरानों का प्रभाव तो था ही, बहुसंख्यकवादी और सत्तावादी राजनीति इसका आधार थी। संघ इसके दर्शन और राजनीतिक संस्कृति दोनों के प्रति असहमति प्रकट करता रहा।

संघ की वैचारिक, संगठनात्मक और नेतृत्व की स्वायत्तता महासभा के बड़े और प्रभावी तबके को पसंद नहीं थी। इसी क्रम में 1932 में नाथूराम गोडसे और तीन अन्य महासभा नेताओं ने वीर सावरकर को संयुक्त पत्र लिख कर संघ की कटु आलोचना की थी। गोडसे का मानना था कि संघ द्वारा ‘हिंदू’ की व्याख्या महासभा के आदर्शों के अनुकूल तो नहीं ही है। इसकी सादगी और व्यवहार उसे समाजवाद के निकट ले जाते हैं।

संघ को कांग्रेस के सेवादल की तरह अपना स्वयंसेवी संगठन बनाने की मंशा पर पानी फिरने के बाद महासभा ने ‘राम सेना’ और ‘हिंदू मिलिशिया’ का गठन किया था। कटुता इतनी बढ़ गई कि महासभा के एक विचारक म.गो. अधिकारी ने महासभा के पत्र में संघ के विरुद्ध बारह लेखों की शृंखला लिखी।

एक पत्र का सार था कि ‘डॉ हेडगेवार को इतिहास कूड़ेदान में फेंक देगा।’ इन मतभेदों के बावजूद आलोचक संघ और महासभा को एक ही तराजू से तौलते रहे। राजनीतिक भाषणों में तो इस तरह की बात समझ में आती है, पर समाज विज्ञान की पुस्तकों में भी इसी धारणा को यथार्थ माना गया है। समाज विज्ञान का काम तो शोध के द्वारा बारीकियों को उजागर करना होता है। लेकिन ऐसा नहीं होना भी एक सवाल है।

अंतिम विकल्प के रूप में जनसंघ की स्थापना की गई। विचारधारा की प्रमुखता ही जनसंघ और भाजपा दोनों को संघ परिवार का घटक बनाती है। संघ का राजनीति में प्रभाव अपनी उस ताकत के कारण है जिसका सृजन विचारधारा के प्रवाह से होता है। क्या आदिवासी, मजदूर, दलित आदि क्षेत्रों में संघ दशकों से राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के सीमित उद््देश्य से काम कर रहा है? राजनीति इसके लिए संकल्प नहीं होकर एक नैतिक जिम्मेदारी है। यह समझने की भी जरूरत है कि राजनीतिक चेतना के अधीन सांस्कृतिक आंदोलन हो या राजनीति, उस पर लोकशक्ति का अंकुश हो।

संघ और भाजपा का संबंध इस बात पर आधारित है कि राजनीति पर लोकशक्ति का अंकुश रहना चाहिए। गोलवलकर ने 25 जून, 1956 को ‘ऑर्गनाइजर’ में स्पष्ट कर दिया था कि ‘संघ कभी भी किसी राजनीतिक दल का स्वयंसेवी संगठन नहीं बनेगा और जनसंघ एवं संघ के बीच निकट का संबंध है। हम दोनों कोई बड़ा निर्णय परामर्श के बिना नहीं करते। पर इस बात का ध्यान रखते हैं कि हम दोनों की स्वायत्तता बनी रहे।’ लोकतंत्र में प्रत्यक्ष राजनीति के पीछे सांस्कृतिक संगठन का शुभाशीष और अंकुश दोनों रहना अगर राजनीति है तो ऐसी राजनीति लोकतंत्र के हित में है। दुर्भाग्य से संघ विमर्श में विचारों का स्थान नारेबाजी ने ले लिया है।

लेखक : राकेश सिन्हा

Posted by on Nov 27 2013. Filed under सच, हिन्दुत्व. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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