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जानिए प्रधानमंत्री की सिक्यॉरिटी और बाकी इंतजाम के बारे में

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नरेंद्र मोदी देश के नए प्रधानमंत्री हैं। उनके शपथ ग्रहण समारोह के दौरान सुरक्षा इंतजाम से लेकर लाव-लश्कर तक पर, सबकी नजरें रहीं। ऐसे में किसी के भी मन में यह सवाल उठ सकता है कि प्रधानमंत्री का रहन-सहन, सिक्यॉरिटी या दूसरे ताम-झाम कैसे होते हैं, इनका जिम्मा किसका होता है, इन पर क्या खर्च आता है आदि-आदि। इन तमाम सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश कर रहे हैं विवेक शुक्ला :

पीएमओ: देश का पावर हाउस
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब पहली बार साउथ ब्लॉक स्थित प्रधानमंत्री दफ्तर (पीएमओ) के अपने भव्य कमरे से झांक कर बाहर देखा होगा, तो उन्हें राष्ट्रपति भवन का विहंगम नजारा दिखा होगा। हरबर्ट बेकर द्वारा डिजाइन किए साउथ ब्लॉक में अपने कमरे की तरफ बढ़ते हुए वह जरूर सोच रहे होंगे कि यही है पावर हाउस।

– कहते हैं कि देश पीएमओ से चलता है। वाकई यहां से सब मंत्रालयों पर नजर रखी जाती है। पीएमओ साउथ ब्लॉक में है, जहां उसके हिस्से कुल 20 कमरे हैं। ये तमाम आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं। पीएमओ में देश के प्रधानमंत्री के दो सबसे अहम ऑफिसर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रिंसिपल सेक्रटरी के अलावा, तमाम दूसरे ऑफिसर होते हैं। नरेंद्र मोदी ने अजीत डोभाल को अपना राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया है। आमतौर पर इस पद पर प्रधानमंत्री अपने बेहद खासमखास शख्स को रखते हैं। एक ऐसा शख्स, जिसे सुरक्षा संबंधी मामलों की गहरी समझ हो। दूसरी ओर, प्रिंसिपल सेक्रटरी खांटी ब्यूरोक्रेट होता है, जिसे ब्यूरोक्रेसी का लंबा अनुभव होता है। वह सभी मंत्रालयों के काम-काज की जानकारी प्रधानमंत्री को देता है। उसके साथ खासा स्टाफ रहता है।


– पीएमओ में प्रधानमंत्री के प्राइवेट सेक्रटरी, मीडिया अडवाइज़र समेत बड़ी संख्या में स्टाफ होते हैं। आप पीएमओ को प्रधानमंत्री का सचिवालय भी कह सकते हैं। पीएमओ में भ्रष्टाचार निरोधक इकाई भी काम करती है। यहां पर जनता के मसलों को सुनने के लिए एक अलग से विभाग है। वास्तव में प्रधानमंत्री अपने इसी दफ्तर के जरिए अपनी सरकार के तमाम मंत्रालयों और गवर्नरों के काम-काज पर नजर रखते हैं।

– जिन विभागों को प्रधानमंत्री देख रहे होते हैं, उनसे संबंधित संसद में पूछे जाने वाले सवालों के जवाब भी पीएमओ में ही तैयार होते हैं। इन्हें उस विभाग के राज्य मंत्री के सहयोग से पीएमओ में तैयार किया जाता है। जिन सवालों के जवाब संसद में प्रधानमंत्री को देने होते हैं, उन्हें वह खुद पीएमओ में पहले देखते भी हैं। इसके अलावा, पीएमओ से ही प्रधानमंत्री राहत कोष और राष्ट्रीय सुरक्षा कोष भी चलता है। यानी देश पीएमओ के हिसाब से ही चलता है।

– हैरानी की बात यह है कि इस जमाने में भी पीएमओ को रोजाना करीब दो हजार खत आते हैं। इनमें से 75 प्रतिशत पोस्ट कार्ड होते हैं। पहले प्रधानमंत्री के पास आने वाले सारे पत्र निर्माण भवन के डाकघर में आते थे,लेकिन अब पीएमओ में एक डाकघर भी काम करने लगा है।

– चूंकि पीएमओ के ऊपर काफी व्यापक जिम्मेदारियां होती हैं, इसलिए देश के आम बजट में इसके लिए अलग से रकम तय की जाती है। 2013-14 के आम बजट में पीएमओ के लिए 32.22 करोड़ रुपए रखे गए। महाराष्ट्र कैडर के पूर्व आईएएस ऑफिसर जफर इकबाल कहते हैं कि पीएमओ के पास तमाम तरह के काम होते हैं। ऐसे में यह रकम कोई बहुत नहीं मानी जा सकती।

पीएम सबसे महफूज
माना जा सकता है कि भारत के प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था दुनिया के किसी भी दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष से कम नहीं होती। देश ने बीते दौर में एक प्रधानमंत्री और एक पूर्व प्रधानमंत्री को आतंकवाद का शिकार होते देखा है। जाहिर है, अब शिखर नेताओं की सुरक्षा पर ज्यादा फोकस किया जा रहा है। प्रधानमंत्री की जमीन से लेकर आसमान तक की सुरक्षा चाक-चौबंद रखी जाती है। वह जहां से गुजरते हैं, उसके चप्पे-चप्पे पर एसपीजी के अचूक निशानेबाज तैनात होते हैं। ये किसी आतंकी को पलक झपकते ही धूल चटाने की क्षमता रखते हैं। एसपीजी में करीब 3000 जवान हैं। इन पर प्रधानमंत्री और पूर्व प्रधानमंत्रियों के अलावा उनके परिजनों की सुरक्षा की भी जिम्मेदारी रहती है। इसके जवानों को अमेरिका की सीक्रिट सर्विस की तर्ज पर ट्रेनिंग मिलती है। एसपीजी पर प्रधानमंत्री की चौबीस घंटे की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है।

– प्रधानमंत्री की सुरक्षा में एसपीजी के अलावा दिल्ली पुलिस की भी अहम भूमिका होती है। मसलन, अगर प्रधानमंत्री को विज्ञान भवन में किसी सम्मेलन को संबोधित करना है, तो सारे इलाके की छानबीन दिल्ली पुलिस की सिक्यॉरिटी ब्रांच एक दिन पहले कर लेगी। जिस दिन प्रोग्राम है, उस दिन विज्ञान भवन को एसपीजी के कमांडो घेर लेंगे। प्रधानमंत्री के लोकल प्रोग्राम्स में एसपीजी के प्रमुख आमतौर पर खुद रहते हैं। अगर प्रमुख किसी वजह से नहीं हैं, तो कोई आला अधिकारी सारे इंतजाम देखता है। इसी तरह अगर प्रधानमंत्री मोदी अपने सरकारी आवास से विज्ञान भवन की तरफ निकले, तो पूरे रूट को 10 मिनट पहले सड़क के एक तरफ से आने वाले ट्रैफिक के लिए रोक दिया जाएगा। इस बीच, दिल्ली पुलिस की दो गाड़ियां सारे रूट पर सायरन बजाती घूमेंगी। इस कवायद को करने के पीछे मोटे तौर पर यह तय करना होता है कि जिस रूट से पीएम को गुजरना है, वह पूरी तरह से साफ है।

– फिर आता है दनदनाता हुआ प्रधानमंत्री का काफिला। सबसे आगे सायरन बजाती एक गाड़ी। यह दिल्ली पुलिस के सिक्यॉरिटी स्टाफ की होती है। उसके बाद एसपीजी की गाड़ी। उसके बाद दो और गाड़ियां। फिर लेफ्ट और राइट साइड में दो गाड़ियां, उनके बीच में प्रधानमंत्री की कार। उसके ठीक पीछे फिर लेफ्ट और राइट साइड में दो गाड़ियां। उसके बाद दो गाड़ियां और… रुकिए, अभी काफिला खत्म नहीं हुआ है। अब जैमर से लैस गाड़ी। इसके ऊपर बहुत-से ऐंटेना फिट रहते हैं। ये सड़क के दोनों तरफ 100 मीटर की दूरी पर रखे विस्फोटकों को डिफ्यूज़ कर सकते हैं। उसके बाद नंबर आता है ऐम्बुलेंस का। उसके बाद दो कारें और रहती हैं। सब गाड़ियों में एनएसजी के अचूक निशाने वाले कमांडो होते हैं। यानी सिक्यॉरिटी देखने के लिए प्रधानमंत्री के साथ करीब 100 लोगों की टीम चल रही होती है। जब पीएम पैदल चलते हैं, तो भी उनके आस-पास और आगे-पीछे वर्दी और सादे कपड़ों में एनएसजी के कमांडो चलते हैं।

कमांडो के हथियार
सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ और राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा बताते हैं कि एसपीजी कमांडो के पास बेल्जियम से इम्पोर्ट की गईं 3.5 किलो की राइफलें रहती हैं। ये एक मिनट में 850 राउंड फायर करने की क्षमता रखती हैं। इनकी रेंज 500 मीटर होती है। कुछ कमांडो के पास सेमी-ऑटोमैटिक पिस्टल भी रहती है। कमांडो हल्की बुलेट-प्रूफ जैकेट पहने रहते हैं। ये 2.2 किलो के होते हैं। घुटने और कुहनी के लिए पैड होते हैं। एसपीजी पर सालाना 300 करोड़ रुपए का खर्चा आता है। बेशक, देश के प्रधानमंत्री पर बुरी नजर रखने वालों से बचाने के लिए यह छोटी-सी रकम है। पीएम को बिल्कुल करीब से घेरे रखने वाले सिक्यॉरिटी गार्ड्स काले चश्मे लगाए रखते हैं। क्या ये ऐसा फैशन में करते हैं? कतई नहीं। सुरक्षा मामलों के जानकार कहते हैं कि गॉगल्स लगाने के पीछे वजह यह होती है कि अगर कोई प्रधानमंत्री पर हमला बोलना चाहता है, तो उसे मालूम न चले कि उस पर गार्ड्स की नजर है। काले चश्मे लगाने से संदिग्ध शख्स को पता नहीं चल पाता कि उस पर कोई पैनी नजर रखे हुए है।

और विमान से रवाना हुए पीएम
जब प्रधानमंत्री देश के किसी दूसरे शहर या विदेशी दौरे पर जा रहे होते हैं, तो उनकी हवाई यात्रा की सारी जिम्मेदारी एयरफोर्स की होती है। हवाई यात्रा के लिए प्रधानमंत्री सीधे एयरपोर्ट के टेक्निकल एरिया में दाखिल होते हैं। यह इलाका द्वारका के पास है। इंदिरा गांधी इंटरनैशनल एयरपोर्ट के एक आला अधिकारी ने बताया कि प्रधानमंत्री के एयरपोर्ट पहुंचने से पहले वहां एयर फोर्स के दो बोइंग विमान तैयार खड़े होते हैं। अगर एक में अंतिम समय में गड़बड़ हो, तो स्टैंडबाई के लिए खड़े विमान से प्रधानमंत्री अपनी यात्रा पर निकल जाएं। यही इंतजाम राष्ट्रपति के लिए भी होता है। प्रधानमंत्री का विमान जब उड़ान भरता है, तो उससे कुछ मिनट पहले सारे इलाके को नो फ्लाइंग जोन में तब्दील कर दिया जाता है। उस दौरान कोई फ्लाइट न उतर सकती है, न उड़ सकती है। उनके विमान में भी उनका अपना स्टाफ और एनएसजी के गार्ड्स रहते हैं। विमान में एक बेडरूम और छोटा कॉन्फ्रेंस रूम भी होता है। प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर कभी-कभार अपने साथ अपने शेफ भी ले जाते हैं। कहते हैं, अटल बिहारी वाजपेयी देश के चोटी के शेफ हेमंत ओबराय को कई बार अपनी विदेश यात्राओं पर साथ ले गए थे।

कितना महंगा पीएम हाउस
पीएम हाउस का अड्रेस 7, रेसकोर्स है, लेकिन यह सिर्फ एक बंगला नहीं है। यह 5 बंगलों 1, 3, 5, 7, और 9 को मिलाकर बना बंगलों का कॉम्प्लेक्स है। इस पूरे कॉम्प्लेक्स को 7 आरसीआर इसलिए कहा जाता है, क्योंकि बंगला नंबर 7 में प्रधानमंत्री काम-काज देखते हैं और कैबिनेट की बैठकें लेते हैं। उन्होंने रहने के लिए चुना है 5 नंबर बंगला। मनमोहन सिंह के टाइम में इस बंगले का इस्तेमाल मेहमानों को ठहराने के लिए किया जाता रहा है। हालांकि राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी इसे रहने के लिए इस्तेमाल कर चुके हैं। मनमोहन सिंह बंगला नंबर 3 में रहते थे। बाकी बंगलों में मेहमानों की मेजबानी और ठहरने से लेकर नैशनल सिक्यॉरिटी गार्ड के दफ्तर चलते हैं। इधर ही हेलिपैड भी है। 7, रेस कोर्स में सिक्यॉरिटी, प्राइवेट स्टाफ, किचन और दूसरे काम-काज से जुड़े कम-से-कम 200 लोग हमेशा मौजूद होते हैं।

7, रेस कोर्स की बाहर से सिक्यॉरिटी करने वाला स्टाफ अलग हैं। तीन मूर्ति भवन के उलट अब प्रधानमंत्री आवास में शायद ही उनका कोई स्टाफ रहता है। तीन मूर्ति भवन में प्रधानमंत्री का निजी स्टाफ भी रहता था, तो राष्ट्रपति भवन में भी स्टाफ के लिए बहुत-से कमरे हैं। वैसे, लुटियंस जोन बेशकीमती है। कनॉट प्लेस की पहली गगनचुंबी इमारत ‘हिमालय हाउस’ बनाने वाली कंपनी कैलाशनाथ प्रॉजेक्ट्स के डायरेक्टर संजय खन्ना कहते है कि लुटियंस दिल्ली में पृथ्वीराज रोड, तुगलक लेन, औरंगजेब रोड पर ही निजी बंगले हैं। उनकी मौजूदा कीमत के लिहाज से देखा जाए तो यहां एक एकड़ के बंगले की कीमत 500 करोड़ रुपए से कम नहीं है। प्रधानमंत्री आवास 5 बंगलों से मिलकर बना है। यह करीब 6 एकड़ में फैला है। तो अब आपने खुद ही हिसाब लगा लिया होगा कि इसकी बाजार कीमत 12 हजार करोड़ रुपए के आस-पास बैठेगी।

Source : navbharattimes.indiatimes.com

Posted by on Jun 1 2014. Filed under खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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