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न बोलती है, न सुनती है, फिर भी टेनिस में रचा था इतिहास

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महिला दिवस के अवसर पर बिहार की बहादूर महिलाओं के बारे में हम आपको बता रहे हैं। उसी कड़ी में पेश है शिल्पी जयसवाल के संघर्ष और सफलता की कहानी, जो आपको हैरान कर देगी।
पटना। यह एक ऐसी लड़की की कहानी है जो जन्म से कुछ नहीं सुन पाती थी। पैरेंट को पता चला तो उन्होंने निराश होने की जगह समय से टकराने की ठानी। पैरेंट के हौसले को देख नन्ही लड़की ने नहीं सुन पाने और ठीक से नहीं बोल पाने की कमजोरी को पैरेंट के अरमानों पर भारी नहीं पड़ने दिया। वह भी अपनी धुन में लगी रही। जहां भी हाथ आजमाया, अव्वल रही। रंग और कूची के सहारे पेंटिंग में नाम रोशन किया तो स्वीमिंग में सौ मीटर का रेस जीता। ब्रिटिश ओपन डेफ चैंपियनशिप का तमगा हासिला किया और देश की रोल मॉडल बनी। अब लॉन टेनिस की कोच है। यह लड़की है शिल्पी जायसवाल।
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पटना के न्यू पाटलिपुत्र में शिशिर जायसवाल और प्रीति जायसवाल का घर है। यह घर दूसरे बहुत सारे घरों की तरह ही है। लेकिन घर के अंदर हर कमरे में ढेर सारे शिल्ड और मेडल दूसरे बहुत सारे घरों से इसे अलग कर देता है। इन मेडल के बारे में बताते-बताते जायसवाल दंपति की आंखें भींग जाती हैं। यह लगन, मेहनत और परास्त नहीं होने की जिजीविषा की कहानी है।
सानिया मिर्जा के साथ चार बार कोर्ट में उतरने वाली शिल्पी जायसवाल की कहानी बेहद उतार-चढ़ाव भरी रही। अब वह कोच बन लड़कियों को टेनिस सीखा रही हैं। कुल 65 बच्चों को वे ट्रेंड कर रही हैं। इनमें 20 लड़कियां हैं। टेनिस के जरिए शिल्पी लड़कियों को इम्पावर कर रही हैं। कहती हैं: लड़कियों को खेल से मजबूत बनने का मौका मिलता है। मेरी कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा लड़कियों को कोर्ट में उतार सकूं और टेनिस के बारे में बता सकूं। शारीरिक कमजोरी के बावजूद शिल्पी की कामयाबी ने अनेक लड़कियों और उनके पैरेंट के सोचने का तरीका बदल दिया।
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छह दिसंबर 1989 को पैदा हुई शिल्पी थोड़ी बड़ी हुई तो उनके नाना को अहसास हुआ कि बच्ची आवाज सुनने में असमर्थ है। यह पता चलते ही जायसवाल दंपति पर आसमान गिर गया। लेकिन वे इससे हताश नहीं हुए। शिल्पी को पटना, मैसूर, इंदौर, दिल्ली के बड़े अस्पतालों में दिखाया गया। करीब दो साल तक अस्पतालों के चक्कर लगे। जब यकीन हो गया कि अब बहुत कुछ नहीं हो सकता तो पैरेंट ने शिल्पी को पेंटिंग की मुखातिब किया। शिशिर जायसवाल कहते हैं: कुछ दिनों बाद हमने देखा कि मेरी बेटी खुद को कमरे में बंद कर दिन भर पेंटिंग में लगी रहती थी। वह किसी से बात करने में संकोच करती थी, मुझसे भी। मुझे डर हुआ कि कहीं वह आइसोलेशन में न पड़ जाये। यह सोच मैंने उसे एक घंटे पेंटिंग और बाकी समय कमरे से बाहर रहने को कहा। पर शिल्पी का रूटीन नहीं बदला। एक दिन मुझे गुस्सा आया और पेंटिंग के सारे सामान तोड़ दिये। शिल्पी उस दिन बहुत रोयी थी।
पिता के सामने सभी दरवाजे बंद लग रहे थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने बेटी को स्वीमिंग की ओर मोड़ा। आठ साल की उम्र में उसने पहला मेडल स्वीमिंग में जीता। जायसवाल दंपति के अनुसार: उस समय भी बेटी का इलाज चल रहा था। उन्हीं दिनों चेक अप के लिए हम एम्स के डॉक्टर कक्कड़ के पास गये। स्वीमिंग की बात सुन वे हैरान रह गये। उनकी हिदायत थी कि लड़की स्वीमिंग करेगी तो सुनने की रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं बचेगी। डॉक्टर की यह हिदायत किसी बड़े झटके से कम नहीं थी। शिल्पी का स्वीमिंग से भी नाता टूट गया।
एक तो लड़की जात। ऊपर से सुनने-बोलने में असमर्थ। अब क्या होगा इसका? यह सवाल शिल्पी की जिंदगी से गहरे तक जुड़ा था। खुद टेनिस में स्टेट चैंपियन रहे शिशिर जायसवाल के दिमाग में यह बात आयी कि क्यों न बेटी को टेनिस में उतारा जाये। पर सवाल फिर भी बना हुआ था। टेनिस में आवाज की बड़ी अहमियत होती है। प्रतिद्वंद्वी के शॉट्स की आवाज से खिलाड़ी अपना मूव बनाते हैं। मगर शिल्पी इसे कैसे सुन पाएगी? शिशिर बताते हैं: उन्हीं दिनों कुणाल एकत्सर ने कोचिंग कैंप लगाया था। हम उनसे मिले। बेटी के बारे में बताया। कुणाल ने सात दिन की प्रैक्टिस के बाद यह तय करने को वह आगे खेल पाएगी या नहीं।
आठवें दिन शिशिर जब कुणाल से मिले तो चमत्कार हो गया। वह लम्हा आज भी याद है। शिशिर कहते हैं: कुणाल ने बताया कि शिल्पी उम्दा खेल सकती है। जायसवाल दंपति के लिए यह शब्द उम्मीदों के संसार से कम न था। इसके बाद शिल्पी का टेनिस और कोर्ट से गहरा जुड़ाव होता गया। ऐसा जुड़ाव जिसे वह जिंदगी भर निभाना चाहती है। वह यहीं रहकर बच्चियों को लॉन टेनिस के गुर बताना चाहती है।
शिल्पी के खाते ये रहीं उपलब्धियां
वर्ष 2000 में पटना जिला चैंपियनशिप का खिताब
वर्ष 2001 में ईस्ट जो अंडर 14 के सेमी फाइनल तक पहुंची
वर्ष 2002 में आईटीए का खिताब अपने नाम किया
वर्ष 2003 में अंडर 18 का खिताब जीता
वर्ष 2004 आईटीएफ इंडिया की ओर से प्रतिनिधित्व किया
वर्ष 2005 में इंडिया की ओर से महिला वर्ग में प्रतिनिधित्व किया
वर्ष 2006 में इंग्लैंड के नॉटिंघम में ब्रिटिश ओपन डेफ चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम किया
वर्ष 2007 में देश की रोल मॉडल का अवार्ड तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अŽदुल कलाम के हाथों प्राप्त किया।
वर्ष 2010 में चंडीगढ़ से टेनिस कोच की डिग्री हासिल की।

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=1869

Posted by on Apr 10 2013. Filed under आधी आबादी. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

1 Comment for “न बोलती है, न सुनती है, फिर भी टेनिस में रचा था इतिहास”

  1. Rahul Chatterjee

    Hello Shilpi, i am Rahul from your home town, Patna (Bihar). I don’t met you at yet but i am great fan of your’s sporting sprit as well as of your sacrifice for this game and your hard-work, simplicity and beauty. I am very upset to know your trazdy that you not really not speaking and hearing. I know god is great but god always make some mistakes as mistakes with you. I went to patliputra to see your match but there is not enough time for me to stay there.You are belonging from a Punjabi Family and I am belonging from Bengali Family.
    Therefore, i am sending you freind request. Would you be my freind. I am belonging from a middle class family. I am also suffered from my life in every field from my birth till yet. I am specially thanking your Father & Mother from taking you granted. Also they sacrifice for you but now you have achieve their dreams as well as your dream. My father , mother also sacrifice for me. My mother suffers from diabeties and spondlities. Me and my father and Elder brother taking care of her.
    Specially i am trying to say you i like you very much. I am not much educated but i am apply for government jobs. I just getting this job. Kindly reply me to my email address [email protected]
    Kindly help me to reach this mail/ massage to Shilpi Jaiswal.

    Thanks Shilpi & your Family.

    Your’s Freind,

    Rahul.

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