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उनके दरबार की कहानी

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सोनिया गांधी में कौन-सी ऐसी चीज है कि उनसे हम जैसे दिलेर, बहादुर पत्रकार भी डरते हैं? इस देश की क्यों वही एक ऐसी राजनेता हैं, जिनके बारे में अगर हम थोड़ी-सी भी आलोचना करते हैं, तो दबी जुबान से ही करते हैं। कुछ दिनों से मुझे ये सवाल इसलिए सता रहे हैं, क्योंकि पिछले महीने मेरी नई किताब दरबार के प्रकाशित होने के बाद से मैं जब भी कहीं इसके बारे में बात करने जाती हूं, तो मुझसे सोनिया जी के बारे में पूछा जाता है।

इस किताब को लिखने का मकसद था यह दिखाना कि किस तरह इस देश के राजनीतिकों ने लोकतंत्र को तोड़ मरोड़ कर एक किस्म की राजशाही कायम कर ली है। जाहिर है कि वंशवाद की इस कथा में जिक्र तो करना ही पड़ा राजीव गांधी का, जो भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्हें एक राजनीतिक दल विरासत में मिला था। उनकी राजनीतिक विरासत मिली उनकी पत्नी सोनिया को, बावजूद इसके कि वह न तो राजनीतिक थीं उस समय और न ही भारतीय मूल की।तो किताब में सोनिया की भूमिका है जरूर, लेकिन मुख्य भूमिका बिल्कुल नहीं। लेकिन मैं पिछले दिनों दरबार के बारे में चर्चा करने जहां भी गई, मुझसे पूछे गए ज्यादातर सवाल सिर्फ सोनिया जी से जुड़े हुए थे। पत्रकार दोस्तों से जब मैंने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सोनिया गांधी का दर्जा भारतीय राजनीति में तकरीबन वही माना जाता है, जो कभी समाज सेवा के क्षेत्र में मदर टेरेसा का हुआ करता था।जब मैं पूछती हूं कि उन्हें इतना ऊंचा दर्जा क्यों दिया गया है, तो मेरे पत्रकार दोस्त मुझे समझाते हैं कि कारण है उनका ‘त्याग’। इस देश में ऐसे बहुत कम राजनीतिक हैं, जो प्रधानमंत्री के पद को ठुकराने का साहस रखते हैं। यह करने के बाद मेरे पत्रकार दोस्त अक्सर कहते हैं, ‘अरे भाई तुम तो हो ही सोनिया गांधी के खिलाफ शुरू से, तो तुम्हें कहां दिखेगा उनका महान त्याग।’

ऐसी बातें सुनकर मुझे आश्चर्य होता है, क्योंकि मेरी नजरों में तो सोनिया जी ने अपनी ‘अति चतुर अंतरात्मा’ की आवाज सुनकर अगर कोई चीज त्यागी थी 2004 के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद, तो सिर्फ जवाबदेही। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में सब जानते हैं कि भारत की सबसे ताकतवर नेता हैं सोनिया और नंबर दो पर हैं उनके पुत्र राहुल। तो उन्होंने त्याग क्या किया? दोबारा 2009 में चुनाव जीतने के बाद उन्होंने बार-बार साबित किया है कि मंत्रिमंडल से ज्यादा शक्तिशाली है उनकी राष्ट्रीय सलाहकार समिति।

कई बार उन्होंने प्रधानमंत्री के आदेशों का खुद उल्लंघन किया है। मिसाल के तौर पर जब जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्रालय के जरिये एक नए किस्म का लाइसेंस राज कायम किया था, प्रधानमंत्री ने फटकार लगाई थी उनको यह स्पष्ट करने के लिए पर्यावरण के बहाने विकास नहीं रोका जा सकता। अगले ही दिन या सोनिया जी की तरफ से उल्टा बयान।

उनके पुत्र ने अपनी माता जी का डटकर साथ दिया। ओडिशा पहुंचे राहुल ने और वेदांता कंपनी को नियमगिरि पहाड़ियों से बाक्साइट निकालने से रोका। यूट्यूब पर आज भी मौजूद है उनका भाषण। नतीजा यह हुआ कि भारत के इस अति गरीब, अति पिछड़े इलाके में एल्यूमिनियम उत्पादन केंद्र निर्मित करने का प्रयास नाकाम हो गया। प्रधानमंत्री विकास के पक्ष में थे, लेकिन कुछ न कर सके।

सो सोनिया गांधी ने जवाबदेही ऐसी त्यागी है भारत सरकार की सबसे ताकतवर नेता होने के बावजूद वह पत्रकारों से तभी मिलती हैं, जब उनकी मर्जी हो। जवाबदेही को त्यागना अगर त्याग है, तो वास्तव में सोनिया जी ने बहुत त्याग दिखाया है। सवाल यह है कि अगर इस तरह का त्याग अन्य नेता भी दिखाना शुरू कर देते हैं, तो क्या लोकतंत्र बेमतलब नहीं हो जाएगा?
लोकतंत्र का बुनियादी सिद्धांत है कि जनता जिन लोगों को चुनकर भेजती है संसद में, उनसे जवाबदेही मांगने का जनता को पूरा अधिकार है।

जहां जवाबदेही नहीं रहती है राजनीतिकों की, वहां लोकतंत्र धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है, और नेता अपने आप को राजा-महाराजा समझने लग जाते हैं। क्या भारत में ऐसा ही नहीं हो रहा है? क्या गांधी परिवार को ऐसा ही दर्जा हमने नहीं दे दिया है? इसके बारे में आप सोचेंगे, तो शायद आपको भी दिख जाएगा कि कितना महंगा पड़ा है सोनिया जी का वह त्याग। सच पूछिए, तो बेहतर होता अगर उन्होंने ऐसा त्याग न दिखाया होता। प्रधानमंत्री बन गई होतीं, तो पिछले दो वर्षों के घोटालों की जिम्मेदारी उनकी होती और जिस आर्थिक मंदी के दौर से देश गुजर रहा है उसकी जिम्मेदारी भी उनकी होती।

 

लेखिका  : तवलीन सिंह

Source : amarujala

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=3060

Posted by on Sep 17 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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