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क्या दो-तीन बार महिलाओं के टुकड़े कर तंदूर में जलाने के बाद ‘रेअरेस्ट ऑफ रेअर’ माना जाएगा?

Tandoor kand

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नृशंसतम हत्यारों के प्रति दया के शर्मनाक दौर से देश हैरान

‘मृत्युदंड सर्वाधिक सफल और कारगर दंड है। जिस भी हत्यारे को मृत्युदंड दे दिया, वह उसके बाद फिर कभी किसी की हत्या नहीं कर पाया है।’

– बिल मेहर, प्रसिद्ध अमेरिकी व्यंगकार व टीवी अभिनेता

यदि भयानक हत्यारे रंगा-बिल्ला या एक के बाद एक सिलसिलेवार हत्याएं करने वाला ऑटो शंकर आज तक अपना केस चलवाने में सफल हो गया होता – तो कोई बड़ी बात नहीं कि बच सकता था।

जो आधार सुप्रीम कोर्ट ने देश को थर्रा देने वाले नैना साहनी तंदूर कांड के पैशाचिक हत्यारे सुशील शर्मा की फांसी माफ करने में दिए हैं – वे चौंका देने वाले हैं। ‘सिर्फ क्रूरता’ फांसी का कारण नहीं बन सकती। यानी क्रूरता अब ‘सिर्फ’ है।?! युवा कांग्रेस का उस समय नेता रहा शर्मा सुप्रीम कोर्ट की निगाहों में ‘समाज के लिए खतरा नहीं है!’ क्यों? क्योंकि यह उसका ‘पहला’ अपराध था।

यानी जब तक शर्मा तीन-चार महिलाओं को गोलियों से न उड़ा दे, उनके टुकड़े-टुकड़े न कर दे और फिर उन्हें कई किलो मक्खन के साथ तंदूर में न जला डाले – उसे फांसी नहीं हो सकती!

‘पहली बार अपराध’ करने वाले के प्रति क्या अदालत, क्या सरकार, सभी न जाने क्यों कुछ अधिक ही नरम हैं। सरकार तो मानों मेहरबान ही है। दिल्ली नृशंसता कांड के बाद जस्टिस वर्मा आयोग की सिफारिशों पर सरकार ने कानून बदला। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर। कहा, अत्यंत कठोर कानून बनाया है। कुछ भी कठोर नहीं था उसमें। बल्कि अपराधियों के पक्ष में खड़ी हो गई थी सरकार। ‘असंभव के विरूद्ध’ में तब हमने विस्तार से सारे तथ्य रखे थे। तब भी यह प्रश्न पूछा था कि इस नए कानून में ‘पहली’ बार किसी युवती पर तेÊाब फेंकने, ‘पहली’ बार छेड़ने, पीछा करने पर कानून की नरमी क्यों हैं? कितनी बार तेÊाब डालें? कि कानून जगे? सÊा मिले?

किंतु तब यह संदेह नहीं था कि पहले कोई अपराध न करने वाले को तंदूर कांड जैसे अकल्पनीय, अमानुष और अमिट अपराध करने पर भी फांसी नहीं होगी।

एक और ख़तरनाक टिप्पणी। इस फैसले में। ‘सुशील शर्मा को अपने किए पर पछतावा है!’ रंगा-बिल्ला भी यही कह देते। मोहम्मद अजमल कसाब को पछतावा तो नहीं था। किं तु, हां, यदि सुप्रीम कोर्ट के ही एक अन्य ऑÊार्वेशन को लिया जाए तो कसाब की भी फांसी टल सकती थी। और वह ऑÊार्वेशन भी सीमा पार से ट्रेनिंग लेकर आए कई मासूम लोगों की हत्या करने वाले आतंकियों की फांसी माफ को लेकर ही की गई थी। 1993 मुंबई आतंकी हमले के आतंकियों में सिर्फ एक को छोड़कर बाकी सभी की फ ांसी माफ करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था : वे ग़रीब और गुमराह थे। यानी इसलिए दया के पात्र थे। इनमें ऐसा आतंकी भी शामिल था जिसमें बाकायदा कई दौरे कर, यह जांचा था कि बम ऐसी ख़ास जगह लगाया जाए कि कई लोग मारे जाएं। फिर उसने बच्चों से भरी स्कूल बस की जगह तय की थी। ग़रीब और गुमराह जो था। मासूम बच्चे। सब नष्ट हो गया। तो कसाब का वह बयान याद आया। ‘मुझे गुमराह किया गया था।’

संयोग ही है कि न्याय, कसाब के मामले में, गुमराह नहीं हुआ। नहीं तो क्या पता..।

फांसी ‘रेअरेस्ट ऑफ रेयर’ मामले में ही दी जाएगी। जब से सुप्रीम कोर्ट ने यह आधार बनाया है, तब से हत्यारों को ग़Êाब का फायदा मिलता जा रहा है। इसमें कोर्ट का कुछ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट तो न्याय एक तयशुदा सिस्टम के अंतर्गत ही करता है। मन से कुछ नहीं। सुबूत, गवाह। तथ्य। तर्क। जो कुछ अभियोजन पक्ष पेश करेगा, उसी पर अदालतें चलेंगी। जो कुछ वकील दलीलों से सिद्ध करेंगे, अदालतें वैसे ही मामले को देखेंगी।

भावनाओं से, देश के थर्रा जाने से, दिलों के दहल जाने से, नौजवानों के राष्ट्रीय आक्रोश से, सिविल सोसायटी के सड़कों पर आंदोलनरत रहने से कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट के फैसले प्रभावित नहीं होते।

यही बचपन से सुना है। सच भी यही है।

यह भी कि कानून ऊंच-नीच नहीं समझता। कोई बड़ा है, रसूखदार है तो कोर्ट को इससे फ़र्क नहीं पड़ता। किसी के सामाजिक स्तर का उसके अपराध से कोई संबंध नहीं है। यही बचपन से सुना है। हम सभी ने।

किंतु तंदूर कांड के सरगना पर दया दिखलाते समय सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के समय अपराधी का ‘सामाजिक स्तर और पृष्ठभूमि’ भी देखने की बात कही है।

यानी नृशंस हत्या करने के बाद यदि अपराधी का ‘सामाजिक स्तर ऊंचा है’ तो फ ांसी नहीं होगी। नहीं होगी?

उम्र देखते ही थे। बालिग होने में कुछ दिन कम हों तो समूचे भारतवर्ष को झकझोर देने वाला, नारी गरिमा पर आततायी हमला व हत्या करने वाले को भी ‘सुधार गृह’ में संगीत सुनने, खेलने, व्यायाम करने व सत्संग में भाग लेने का उदारवादी आदेश मिलता ही है। या कि निवेदन?

अब सामाजिक स्तर भी देखा जाएगा! अर्थात् बड़े रईस, ऊंचे ओहदे वाले या कि प्रसिद्ध व्यक्तियों को फांसी नहीं होगी? क्योंकि सामाजिक स्तर तो इन्हीं का होता है।

संभवत: यह एक संपादक की आशंका है। एक छटपटाहट। जो अपराधियों को लगातार छूटते देखकर हर आम भारतीय के मन में भी उपज रही है। संभवत: यह मात्र आशंका ही हो। सच न हो। किन्तु बन रही है ऐसी धारणा। बढ़ रही है ऐसी आशंकाएं।

क्योंकि अचानक अपराधियों के प्रति कई तरह की दया उमड़ आई है। पत्रकार आयशा अरविंद ने इसी सप्ताह एक रिपोर्ट में कोर्ट का एक नया ट्रेंड बताया है : छोटे अपराध पर सÊा नहीं, समाज सेवा का फैसला सुना रही हैं अदालतें। उस रिपोर्ट का स्वर तो सकारात्मक है, यानी अदालत की तारीफ है। सुधरने का मौका देने के लिए। किंतु प्रश्न यह है कि एक इंजीनियरिंग छात्रा को बुरी तरह यौन प्रताड़ना देने वाले को साल भर एक ग़ैर-सरकारी संगठन के सथ समाज सेवा क्या न्याय है? बीएमडल्यू हिट-एंड-रन मामले के दोषी संजीव नंदा को भी दो साल की समाज सेवा मिली है। क्या यह न्याय है?

प्रश्न अपराधियों के सुधार का कतई नहीं है। प्रश्न तो अपराध में न्याय का है। जिसे प्रताड़ित किया, उसे न्याय कहां मिला? जो मारे गए, उनके परिवार को न्याय कहां मिला? और कौन सुधरता है ‘समाज सेवा’ से?

हर अपराधी को सÊा मिले, यह असंभव है। किंतु मिलनी ही चाहिए। हर जघन्य हत्यारे को फांसी मिले, यह असंभव है। किंतु देनी ही होगी। यह भ्रष्ट कुतर्क है कि सÊा तभी हो जब वह डेटरेंट का काम करे। यानी आगे वैसे अपराधों को रोक सके। यह हत्यारों के पक्ष में, भ्रमित करने वाली बात है। सÊा, एक अपराध विशेष के लिए दी जानी चाहिए। ताकि उस अपराध पर न्याय हो सके। वरना ऐसे तर्क से तो नाथूराम गोडसे को भी फांसी ग़लत थी – क्योंकि उसके बाद हत्याएं तो रुकी नहीं।

‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ ही होता है। डेटरेंट जैसी कोई रुकावट कहीं नहीं थी। न है। न होनी चाहिए।

और इन बातों को समझने के लिए हमें किसी सामाजिक स्तर का होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

कल्पेश याग्निक

(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=3496

Posted by on Oct 12 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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