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कल तक भंडाफोड़ पत्रकारिता के हीरो तरुण तेजपाल के नाम से घिन आ रही है आज

Tarun Tejpal,Tehelka sexual assault case

‘आप हिंसा किसे कहेंगे? क्या इसके लिए महिला का निर्वस्त्र सड़क पर फेंका जाना जरूरी है? उसके अंग और आंतें नष्ट होनी जरूरी हैं? क्या हम हत्या को दो भागों में बांटते हैं? सहन करने योग्य और सहने से परे? तो दुष्कर्म को अलग-अलग ग्रेड में क्यों रखा है?’ – तहलका की प्रबंध संपादक, शोमा चौधरी, दिल्ली दुष्कर्म के बाद लिखे कॉलम में।

‘आप तरुण जी को ‘रेपिस्ट’ नहीं कह सकते। उन्हें अपनी बात रखने का हक है। त्यागपत्र देकर उन्होंने हाई स्टैंडर्ड स्थापित किया है।’ – शोमा चौधरी, इस घटना के बाद
सत्ता के ऊंचे ओहदों पर बैठे लोग डरते थे तरुण तेजपाल से। तहलका मचा देंगे। राजनेता, अफसर, उद्योगपति सब घबराते। एक के बाद एक इस्तीफे होते जाते। युवा पत्रकारों को वे हीरो लगते। हम लोगों को लगता ‘स्टिंग ऑपरेशन’ की शुरुआत करने वाला यह संपादक भारतीय पत्रकारिता को नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। तहलका मचा रहा है।

घिन आ रही है आज उक्त बातों को याद कर। भारतीय पत्रकारिता तो हमेशा उजली, मर्यादित और गांभीर्य लिए रही है। ‘विश्वसनीयता’ उसका आभूषण रही है। इसलिए तरुण तेजपाल के दुष्कृत्य से पत्रकारिता को तो कोई ठेस नहीं पहुंची है – किंतु पत्रकारों को तो जैसे धक्का पहुंचा है। दैत्याकार धक्का। क्योंकि ‘संपादक’ पद -इंस्टीट्यूशन ऑफ एडिटर- का ऐसा पतन। किसी एक संपादक विशेष के यौन अपराध से।
अक्षम्य है। कितनी भी बड़ी हो उनकी पत्रकारिता, उनके दुष्कर्म को छुपा नहीं सकती। और गुनाह को कम भी नहीं कर सकती। आसाराम को कहीं बेहतर सिद्ध कर गए तेजपाल! क्योंकि एक संपादक ऐसा कर सकता है! एक ऐसा संपादक जो समाज में हो रहे सभी ‘अवैध, अवांछित और अनुचित’ से इतना उद्वेलित था कि एक के बाद एक ‘अवैध’ का भंडाफोड़ करता चला गया। एक ऐसे पत्रकारों का समूह बनाता चला गया जो हर $गलत काम से क्रुद्ध थे, उत्तेजित थे, ठीक करना चाहते थे। ऐसा संपादक, अपने ही साथ काम करने वाली युवा, उत्साही और ऊर्जा से भरी पत्रकार को बार-बार यौन प्रताडऩा देने का निकृष्ट कृत्य कर रहा था। जो दोस्त की बेटी थी और बेटी की दोस्त। सेक्सुअल हैरेसमेंट नहीं, सेक्सुअल अज़ॉल्ट। हर रिश्ते पर हमला।
तेजपाल ने समूची दुनिया में खूब प्रसिद्धि कमाई। वे अंग्रेजी के कुशलतम प्रयोग के लिए जाने जाते हैं। उनका अंग्रेजी लेखन इतना जटिल और बुना हुआ होता है कि पाठक ठगा सा रह जाता है। था। अब, जबकि उन्होंने अपने अपराध को कबूल करने में भारी-भरकम, लच्छेदार, ब्रितानी अंग्रेजी का चोला पहनाकर ई-मेल भेजा – तो फिर सब ठगे से रह गए। किंतु इस बार प्रशंसा के लिए नहीं, भयंकर आलोचना के लिए। एडिटर्स’ गिल्ड सहित तमाम मीडिया संस्थाओं ने जिस तरह तेजपाल पर कठोरतम शब्दों में प्रहार किए हैं – उससे फिर एक बार सिद्ध हुआ कि देश पूरी तरह जाग चुका है। कोई किसी तरह किसी अपराध को दबा नहीं सकता। तहलका भी नहीं। तहलका की ताकतवर मैनेजिंग एडिटर शोमा चौधरी भी नहीं। तीन दिन से ज्य़ादा नहीं।
शोमा के बारे में ट्विटर पर इतना कहा जा रहा है, हर टीवी चैनल पर इतना आ रहा है, कि उनकी $गलतियों के बारे में यहां दोहराने की ज़रूरत नहीं है। तरुण तेजपाल उनके ‘गॉडफादर’ हैं। इसलिए यह तो तय था कि वे कुछ कठोर का कर्रवाई करने से हिचकेंगी। पत्रकारिता में उनकी अत्यंत चमकदार पारी है। वे गंभीर और ईमानदार हैं। किंतु अपने ‘आदर्श’ के विरुद्ध इतनी गंभीर शिकायत का ई-मेल मिलने पर अपने उक्त गुणों का छोटा सा भी उदाहरण या प्रदर्शन उन्होंने नहीं किया। ‘मैं पुलिस को क्यों भेजूंगी? यह शिकायत करने वाले को चाहिए कि वो क्या करे। यह हमारा ‘अंदरूनी’ मामला है! इंडियन एक्सप्रेस से शोमा ने कहा : इस यौन प्रताडऩा से आपको क्या मतलब? आपको प्रश्न पूछने का क्या अधिकार है?’

विश्वास ही नहीं होता। एक जिम्मेदार और प्रतिष्ठित प्रबंध संपादक ऐसा कह सकती हैं। एक महिला संपादक! अपनी उभरती हुई महिला सहयोगी के साथ ‘ऐसा’ हो जाने पर। फस्र्टपोस्ट ने प्रभावी चित्रण किया है : कल तक वे टीवी चैनलों कीपरफेक्ट गेस्ट थीं। किंतु अब अलग ही। बचाव की मुद्रा में। क्र ोधित-झल्लाती हुईं। यहां तक कि अपमान करने पर आमादा। राजदीप सरदेसाई के आईबीएन में प्रश्नों को टालते-बचते वे बुरी तरह भड़क गईं : क्या मैं स्पेनिश भाषा बोलूं ताकि मेरी बात आप समझ सकें!

ये शोमा चौधरी वही है जिन्हें दो साल पहले ही प्रतिष्ठित अमेरिकी मैग्ज़ीन न्यूज़वीक ने दुनिया की उन 150 हस्तियों में शुमार किया था जो ‘दुनिया को हिला सकते हैं’। यह अलग बात है कि उधर न्यूज़वीक पहले बंद हुई, फिर बिक गई। इधर, शोमा ने अपनी सहयोगी की मदद न करते हुए अपने गॉडफादर के पाप पर पर्दा डालने की असफल कोशिश कर, दुनिया तो नहीं, अपने पत्रकारों, पाठकों, प्रशंसकों और ‘संपादक’ पद का सम्मान करने वालों को जरूर हिला दिया है।
संपादक के रूप में ‘प्रायश्चित’ करने की इच्छा जाहिर करते हुए तरुण तेजपाल ने स्वयं को ‘दण्ड’ दिया है! यही तो कहकर स्वयं को महिमामंडित किया है उन्होंने। वे ‘तपस्या’ करने जा रहे हैं। छह माह के लिए संपादक पद से त्यागपत्र।
कितना बड़ा छल। कितना बड़ा पाखंड। पहली बात तो ‘त्याग’ कैसा? भ्रष्ट यौन अपराध करने के बाद अपनी झूठी सज़ा $खुद ही तय करने में ‘त्याग’कैसा? भाजपा के अरुण जेटली और वामपंथी वृंदा करात शायद पहली बार ही एक जैसी भाषा बोले होंगे : तपस्या-प्रायश्चित ही करना है तो जेल में करो। दूसरी बात, छह माह के लिए ही क्यों? निश्चित ही कानून से बचते हुए, छुट्टी लेकर, अपनी नई किताब लिखने का समय निकाल रहे होंगे तेजपाल। ‘द अल्केमी ऑफ डिज़ायर’ और ‘द स्टोरी ऑफ माय असेसिन’ जैसी किताबों के लिखने पर ब्रिटेन और अमेरिका में तेजपाल को ख़ासा सम्मान मिल चुका है। द गार्डियन, लंदन ने उन्हें ‘टॉप 20 न्यू एलिट्स ऑफ इंडिया’ से नवाज़ा था। यह अलग बात है कि इसी गार्डियन से लेकर न्यूयार्क टाइम्स, वॉल स्ट्रीट जर्नल तक विश्व मीडिया मेें उनका यौन अपराध ख़ासी सुर्खियों में है। ‘इंडियन मीडिया एंगरी ओवर टॉप एडिटर्स सेक्सुअल अज़ॉल्ट केस’ ‘एडिटर सेक्सुअली अब्युज़ेज़ यंग कुलीग’, ‘मीडिया आउटे्रज : रेप केस अगेन्स्ट टॉप एडिटर’। ये हैं हेडलाइन्स। पाकिस्तानी अखबारों को तो, खैर, मौका मिलना ही था।
गोवा में, जहां तहलका का हाई-प्रोफाइल ‘थिंकफेस्ट’ हुआ था, वहां जोरदार विरोध प्रदर्शन हो रहा है। वहीं तेजपाल ने यह घिनौनी हरकत की। इंटरनेट पर इसे तेजपाल के मूल चरित्र से जोड़ कर देखा जा रहा है। यहीं, 2011 में, तेजपाल ने भाषण में कहा था : …अब, जबकि आप गोवा में हैं, जितना पी सकते हैं, पीजिए, खाइए और… स्लीप विद हूएवर यू थिंक ऑफ…।
निर्लज्ज। निकृष्ट।
नि:संदेह, एक आयकॉनिक एडिटर के मुंह से ऐसी बात सुनते ही… घिन आ जाती है। ‘एशियावीक’ ने उन्हें महाद्वीप के 50 सर्वाधिक प्रभावशाली कम्यूनिकेटर में शामिल किया था। ‘न्यूज़वीक’ ने उन्हें उन 50 दिग्गजों में गिना था जो दुनिया में ‘बदलाव’ ला सकते हैं। दुनिया में तो नहीं, संपादकों के प्रति बची छोटी सी श्रद्धा को भी खंडित करने की तेजपाली कोशिश कुछ न कुछ बदलाव तो निश्चित लाएगी। संभवत: हम संपादकों में। कैसे अपने सहयोगियों में भरोसा बढ़ाएं। कैसे अपने पाठकों में यह विश्वास जगाएं कि संपादक जो कह रहे हैं, वही कर भी रहे हैं।

महिलाओं के लिए पुरुषों का, ऐसे शक्तिशाली पुरुषों का रवैया बदले यह असंभव है। किंतु बदलना ही होगा। युवा उग्र हैं। जागरूक हैं। सत्ता, शक्ति, दौलत और शोहरत के मद में चूर कापुरुषों को भारतीय कानून दंड दे, न दे, किन्तु नई पीढ़ी बुरी तरह दण्डित करेगी। जो दिल्ली में हुआ, उससे राष्ट्रीय चेतना जगी थी। जो गोवा में हुआ, उससे राष्ट्रीय लपट उठ सकती है। चूंकि अब मामला सड़कों पर, अंधेरे में, बसों में छुपकर आए अनजान गुण्डों का नहीं है। काउबॉय हैट, कुर्ता और बरमूडा पहने, लंबी चोटी रखे गहरी-पैनी आंखों से ‘न जाने क्या-क्या तलाशते’ हाई-प्रोफाइल, ‘स्टिंकफेस्ट’ आयोजित करने वाले सर्वशक्तिमान संपादक का है। शिकार भी मेधावी सहयोगी है। रोड नहीं, वर्कप्लेस का मामला। यानी सबको सबकुछ पता है। ओपन-एंड-शट केस।
यदि देश के युवा ठान लें, दबाव बनाए रखें, तो पुलिस, कानून, कोर्ट सब कर सकते हैं तहलका।
कल्पेश याग्निक (लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)

Posted by on Nov 23 2013. Filed under खबर, मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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